ब्लॉग छत्तीसगढ़

01 July, 2010

पंडवानी के नायक भीम और महाभारत के नायक अर्जुन

यह सर्वविदित तथ्य है कि छत्तीसगढ़ की लोकगाथा पंडवानी महाभारत कथाओं का लोक स्वरूप है। वैदिक महाभारत के नायक अर्जुन रहे हैं जबकि पंडवानी के नायक भीम हैं। पिछले पोस्ट में पंडवानी की तथाकथित शाखा और शैली के संबंध में हमने बतलाया था। जिसके निष्कर्ष स्वरूप आप यह न समझ बैंठें कि वेदमति शाखा के नायक अर्जुन और कापालिक शाखा के नायक भीम हैं। उपलब्ध जानकारियों के अनुसार छत्तीसगढ़ में प्रचलित दोनों शाखाओं के नायक भीम ही रहे हैं। इसे आप जनरंजन के रूप में भी स्वीकार सकते हैं। इसके मूल में क्या कारण रहे हैं इस संबंध में रामहृदय तिवारी जी नें अपने एक आलेख में लिखा है-
महाभारत के इतने विविध चरित्रों में पंडवानी गायकों नें भीम को ही इतनी प्रमुखता और महत्ता क्यों दी इसके अपने सूक्ष्‍म मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। यह एक रोचक तथ्य है कि पंडवानी गायन परंपरा में संलग्न लगभग सभी कलाकार द्विजेतर जातियों के हैं। सदियों से उपेक्षित, तिरस्कृत और दबे कुचले इन जातियों के लोग अपने दमित आक्रोश की अभिव्यक्ति और संतुष्टि भीम के चरित्र में पाते हैं। भीम की अतुल शौर्यगाथा गाकर ये कलाकार अपने भीतर छुपे प्रतिशोध की चिरजीवी साध को संतुष्ट करते हैं, साथ ही अपने बीच भी किसी महान पराक्रमी भीम के अवतरण की मंशा संजोए कथा में डूबते उतराते रहते हैं। भीम के कथा प्रसंग को जिस तन्मयता और गौरव के साथ ये सिद्धस्थ कलाकार गाते हैं, उसमें उनकी जातिगत मौलिकता और आदिम लोक तत्व की उर्जा विद्यमान रहती है।
तिवारी जी के इस कथन से भीम को नायक के रूप में स्वीकार करने की धुंध कुछ छटती है। इस संबंध में आदिवासी लोक कला परिषद भोपाल व अन्यान्य देशों के आदिवासियों पर शोध कर रहे मनीषियों को शोध में सहायता करने वाले आदिवासी इन्साईक्लोपीडिया निरंजन महावर जी भी तिवारी जी के इन कथनों की हामी भरते हैं।

पंडवानी के रोचक तथ्य :- पंडवानी के प्रथम ज्ञात लोक गायक झाडूराम देवांगन थे। प्रथम महिला पंडवानी गायिका श्रीमती सुखिया बाई को माना जाता है। पंडवानी के आरंभिक काल में पंडवानी को पुरूषों की परंपरा मानने के कारण श्रीमती सुखिया बाई पुरूषों के वेश में मंचासीन होकर पंडवानी गाती थी। पारंपरिक रूढि़ को तोड़ते हुए महिला के वास्तविक रूप में श्रीमती लक्ष्मी बाई नें पहली बार पंडवानी गाना आरंभ किया। श्रीमती तीजन बाई को पंडवानी के रूप में लोक कला में अप्रतिम योगदान के लिए पद्मभूषण प्रदान किया गया। पद्मभूषण श्रीमती तीजन बाई द्वारा पंडवानी की प्रस्तुति लगभग संपूर्ण विश्व में दी जा चुकी है।
पंडवानी के ज्ञात लोक गायक/ गायिका :- झाडूराम देवांगन, पुनाराम निषाद, चेतन देवांगन, रावन झीपन वाले मांमा-भांजा, श्रीमती सुखिया बाई, श्रीमति लक्ष्मी बाई, पद्मभूषण श्रीमती तीजन बाई, श्रीमती शांतिबाई चेलक, श्रीमती मीना साहू, श्रीमती प्रमिला बाई, श्रीमती उषा बारले, श्रीमती सोमेशास्त्री , श्रीमती टोमिन बाई निषाद, श्रीमती रितु वर्मा, खूबलाल यादव, रामाधार सिन्हा, फूल सिंह साहू, श्रीमती प्रभा यादव, श्रीमती पुनिया बाई, श्रीमती जेना बाई.
पंडवानी का इतिहास :-
नायकों पर चर्चा करते हुए किंचित पंडवानी की शुरूआत पर कुछ नजर डाली जाए। निरंजन महावर जी परंपरा के इतिहास को खंगालते हुए पंडवानी गाने वाले पारंपरिक लोक की व्याख्या करते हुए जो कहते हैं उसे शव्दश: रामहृदय तिवारी जी स्वीकार करते हैं यथा – ‘छत्तीसगढ में गोडों की एक उपजाति परधान के नाम से जानी जाती है और दूसरी घुमन्तु जाति होती है – देवार । शोधकर्ता कहते हैं कि पंडवानी मूलत: इन्हीं दोनों जातियों की वंशानुगत गायन परंपरा है जो पंडवानी नाम धरकर समयानुसार विकसित होते होते वर्तमान स्वरूप तक पहुंची है।
एक आलेख में निरंजन महावर जी स्पष्ट। रूप से इंगिंत करते है कि आंध्र प्रदेश के बुर्रा कथा से पंडवानी का उद्भव हुआ है। आंध्र के बुर्रा कथा का प्रभाव छत्तीसगढ़ तक कैसे आया इस पर वे कहते हैं कि आंध्र प्रदेश के वैष्णव मथुरा-वृंदावन की धार्मिक यात्रा करते थे, छत्तीसगढ़ इस यात्रा पथ में आता है। वे आगे बुर्रा शव्द को तंबूरे से जोड़ते हुए कहते हैं कि कालांतर में ‘तं’ शव्द का लोप हुआ और बुरा कथा बुर्रा कथा हो गया। आंध्र के बुर्रा कथा में भी महाभारत की कहानियों को तम्बूरे के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
महावर जी के इस कथन को ध्यान में रखते हुए हम प्राचीन लेखकों में इतिहासकार प्यारेलाल गुप्ता जी की पं.रविशंकर शुक्ल विद्यालय द्वारा प्रकाशित कृति ‘हमर छत्तीसगढ़’ को संदर्भित करना चाहते हैं जिसमें प्यारेलाल जी लोक कथाओं के विकास के काल को विभाजित करते हुए लिखते हैं कि छत्तीसगढ़ के पारंपरिक आदि गाथाओं का काल सन् 1100 से 1500 (आदि काल) तक रहा है (इसे हीरालाल शुक्‍ल, डॉ.दयाशंकर शुक्‍ल, डॉ.हनुमंत नायडू भी स्‍वीकारते हैं) जिसमें पंडवानी लोक गाथा गायन का भी विकास हुआ है। इस समय आंध्र के बुर्रा कथा की क्या स्थिति रही यह अध्ययन का विषय है। आदि पंडवानी लोक गायक सन् 1927 में जन्‍मे बासिन दुर्ग वाले झाडूराम देवांगन जी कहते थे कि वेदमति शाखा का आरंभ मेरे से ही हुआ है इस पर महावर जी का कहना है कि पंडवानी के वेदमति शैली का प्रारंभ बीसवी शताब्दि के आरंभिक काल से है। यदि पंडवानी के वेदमति शाखा को ही पंडवानी की शुरूआत के रूप में स्वीकार किया जाता है तो निरंजन महावर जी के कथनानुसार पंडवानी का आरंभ बीसवीं सदी के आरंभ में हुआ। प्यारेलाल जी और महावर जी के तथ्य विरोधाभाषी हैं। इस पर भी अध्‍ययन की आवश्यकता है।

संजीव तिवारी

इस आलेख के साथ अली सैयद भईया के ब्‍लॉग उम्मतें में अवश्‍य पढें - महाकाव्य की अंचल यात्रा : पंडवानी के नायक भीम कैसे ना होते ?

10 comments:

  1. वाह संजीव भाई वाह! अभी होगे आधा रात अब होही काली बात भ इया जय जोहार। व इ से बने पंड्वानी के इतिहास ल जनवावत हस मैं हा जरूर पढ़थौं। बढ़िया। बधाई। अ उ शुक्रिया घलो। अब जाथन सोबो हमू।

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  2. कमाल का काम कर रहे हैं आप ..दुर्लभ ! शुभकामनायें

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  3. इसमें कोई आश्चर्य नहीं की महाभारत की वृहत परम्परा
    छत्तीसगढ़ में स्थानीयता की विशिष्ट गाथा के रूप में उभरी है ! देखिये कोशिश करते हैं कि शाम तक आपको पुरौनी भाग दो दे पायें :)

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  4. बड़ी रोचक जानकारी दी है आपने... मैंने इलाहाबाद में एक बार तीजन बाई का पंडवानी गायन सुना था. मुझे तभी से इस विधा में रूचि उत्पन्न हो गयी थी... पंडवानी के नायक भीम हैं, इसका स्पष्टीकरण भी बहुत अच्छा लगा.

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  5. isi liye to lagatar gatimaan ho. top 40 mey aa gaye, dekh kar achchha laga. shubhkamanaye. isi tarah aage barho..

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  6. Its A no no THE report.
    Dr Atul Kr

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  7. भाई सतीश सक्सेना जी की बात से सहमत हूं। वाकई ऐतिहासिक काम कर रहे हो संजीव भाई।

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  8. durlabh aitihaasik jaankari dekar aap mahan kaarya kar rahe hai.....subhakaamnaaye.

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  9. पिछली बार की तरह ही रोचक व ज्ञानवर्धक ।

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  10. महाभारत तो वैदिक साहित्य के बहुत बाद का है -फिर वेदमति महाभारत का मतलब क्या ?
    हजार हाथियों का शारीरिक बल लिए भीम पोषण वंचित लोकमं के लिए आराध्य क्यूं न हों ? :)

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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01 July, 2010

पंडवानी के नायक भीम और महाभारत के नायक अर्जुन

यह सर्वविदित तथ्य है कि छत्तीसगढ़ की लोकगाथा पंडवानी महाभारत कथाओं का लोक स्वरूप है। वैदिक महाभारत के नायक अर्जुन रहे हैं जबकि पंडवानी के नायक भीम हैं। पिछले पोस्ट में पंडवानी की तथाकथित शाखा और शैली के संबंध में हमने बतलाया था। जिसके निष्कर्ष स्वरूप आप यह न समझ बैंठें कि वेदमति शाखा के नायक अर्जुन और कापालिक शाखा के नायक भीम हैं। उपलब्ध जानकारियों के अनुसार छत्तीसगढ़ में प्रचलित दोनों शाखाओं के नायक भीम ही रहे हैं। इसे आप जनरंजन के रूप में भी स्वीकार सकते हैं। इसके मूल में क्या कारण रहे हैं इस संबंध में रामहृदय तिवारी जी नें अपने एक आलेख में लिखा है-
महाभारत के इतने विविध चरित्रों में पंडवानी गायकों नें भीम को ही इतनी प्रमुखता और महत्ता क्यों दी इसके अपने सूक्ष्‍म मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। यह एक रोचक तथ्य है कि पंडवानी गायन परंपरा में संलग्न लगभग सभी कलाकार द्विजेतर जातियों के हैं। सदियों से उपेक्षित, तिरस्कृत और दबे कुचले इन जातियों के लोग अपने दमित आक्रोश की अभिव्यक्ति और संतुष्टि भीम के चरित्र में पाते हैं। भीम की अतुल शौर्यगाथा गाकर ये कलाकार अपने भीतर छुपे प्रतिशोध की चिरजीवी साध को संतुष्ट करते हैं, साथ ही अपने बीच भी किसी महान पराक्रमी भीम के अवतरण की मंशा संजोए कथा में डूबते उतराते रहते हैं। भीम के कथा प्रसंग को जिस तन्मयता और गौरव के साथ ये सिद्धस्थ कलाकार गाते हैं, उसमें उनकी जातिगत मौलिकता और आदिम लोक तत्व की उर्जा विद्यमान रहती है।
तिवारी जी के इस कथन से भीम को नायक के रूप में स्वीकार करने की धुंध कुछ छटती है। इस संबंध में आदिवासी लोक कला परिषद भोपाल व अन्यान्य देशों के आदिवासियों पर शोध कर रहे मनीषियों को शोध में सहायता करने वाले आदिवासी इन्साईक्लोपीडिया निरंजन महावर जी भी तिवारी जी के इन कथनों की हामी भरते हैं।

पंडवानी के रोचक तथ्य :- पंडवानी के प्रथम ज्ञात लोक गायक झाडूराम देवांगन थे। प्रथम महिला पंडवानी गायिका श्रीमती सुखिया बाई को माना जाता है। पंडवानी के आरंभिक काल में पंडवानी को पुरूषों की परंपरा मानने के कारण श्रीमती सुखिया बाई पुरूषों के वेश में मंचासीन होकर पंडवानी गाती थी। पारंपरिक रूढि़ को तोड़ते हुए महिला के वास्तविक रूप में श्रीमती लक्ष्मी बाई नें पहली बार पंडवानी गाना आरंभ किया। श्रीमती तीजन बाई को पंडवानी के रूप में लोक कला में अप्रतिम योगदान के लिए पद्मभूषण प्रदान किया गया। पद्मभूषण श्रीमती तीजन बाई द्वारा पंडवानी की प्रस्तुति लगभग संपूर्ण विश्व में दी जा चुकी है।
पंडवानी के ज्ञात लोक गायक/ गायिका :- झाडूराम देवांगन, पुनाराम निषाद, चेतन देवांगन, रावन झीपन वाले मांमा-भांजा, श्रीमती सुखिया बाई, श्रीमति लक्ष्मी बाई, पद्मभूषण श्रीमती तीजन बाई, श्रीमती शांतिबाई चेलक, श्रीमती मीना साहू, श्रीमती प्रमिला बाई, श्रीमती उषा बारले, श्रीमती सोमेशास्त्री , श्रीमती टोमिन बाई निषाद, श्रीमती रितु वर्मा, खूबलाल यादव, रामाधार सिन्हा, फूल सिंह साहू, श्रीमती प्रभा यादव, श्रीमती पुनिया बाई, श्रीमती जेना बाई.
पंडवानी का इतिहास :-
नायकों पर चर्चा करते हुए किंचित पंडवानी की शुरूआत पर कुछ नजर डाली जाए। निरंजन महावर जी परंपरा के इतिहास को खंगालते हुए पंडवानी गाने वाले पारंपरिक लोक की व्याख्या करते हुए जो कहते हैं उसे शव्दश: रामहृदय तिवारी जी स्वीकार करते हैं यथा – ‘छत्तीसगढ में गोडों की एक उपजाति परधान के नाम से जानी जाती है और दूसरी घुमन्तु जाति होती है – देवार । शोधकर्ता कहते हैं कि पंडवानी मूलत: इन्हीं दोनों जातियों की वंशानुगत गायन परंपरा है जो पंडवानी नाम धरकर समयानुसार विकसित होते होते वर्तमान स्वरूप तक पहुंची है।
एक आलेख में निरंजन महावर जी स्पष्ट। रूप से इंगिंत करते है कि आंध्र प्रदेश के बुर्रा कथा से पंडवानी का उद्भव हुआ है। आंध्र के बुर्रा कथा का प्रभाव छत्तीसगढ़ तक कैसे आया इस पर वे कहते हैं कि आंध्र प्रदेश के वैष्णव मथुरा-वृंदावन की धार्मिक यात्रा करते थे, छत्तीसगढ़ इस यात्रा पथ में आता है। वे आगे बुर्रा शव्द को तंबूरे से जोड़ते हुए कहते हैं कि कालांतर में ‘तं’ शव्द का लोप हुआ और बुरा कथा बुर्रा कथा हो गया। आंध्र के बुर्रा कथा में भी महाभारत की कहानियों को तम्बूरे के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
महावर जी के इस कथन को ध्यान में रखते हुए हम प्राचीन लेखकों में इतिहासकार प्यारेलाल गुप्ता जी की पं.रविशंकर शुक्ल विद्यालय द्वारा प्रकाशित कृति ‘हमर छत्तीसगढ़’ को संदर्भित करना चाहते हैं जिसमें प्यारेलाल जी लोक कथाओं के विकास के काल को विभाजित करते हुए लिखते हैं कि छत्तीसगढ़ के पारंपरिक आदि गाथाओं का काल सन् 1100 से 1500 (आदि काल) तक रहा है (इसे हीरालाल शुक्‍ल, डॉ.दयाशंकर शुक्‍ल, डॉ.हनुमंत नायडू भी स्‍वीकारते हैं) जिसमें पंडवानी लोक गाथा गायन का भी विकास हुआ है। इस समय आंध्र के बुर्रा कथा की क्या स्थिति रही यह अध्ययन का विषय है। आदि पंडवानी लोक गायक सन् 1927 में जन्‍मे बासिन दुर्ग वाले झाडूराम देवांगन जी कहते थे कि वेदमति शाखा का आरंभ मेरे से ही हुआ है इस पर महावर जी का कहना है कि पंडवानी के वेदमति शैली का प्रारंभ बीसवी शताब्दि के आरंभिक काल से है। यदि पंडवानी के वेदमति शाखा को ही पंडवानी की शुरूआत के रूप में स्वीकार किया जाता है तो निरंजन महावर जी के कथनानुसार पंडवानी का आरंभ बीसवीं सदी के आरंभ में हुआ। प्यारेलाल जी और महावर जी के तथ्य विरोधाभाषी हैं। इस पर भी अध्‍ययन की आवश्यकता है।

संजीव तिवारी

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