ब्लॉग छत्तीसगढ़

29 April, 2008

जे बहु गणा गता सो पंथा : अजीत जोगी (Ajit Jogi)


छत्तीसगढ में किसी छत्तीसगढिया का पहला नाम सम्मान से मेरे जहन में कौंधता है तो वह पहला नाम है, अजीत प्रमोद कुमार जोगी । हॉं, अजीत जोगी एक व्यक्ति नहीं एक संस्था, एक विचार । हमारी अस्मिता को नई उंचाईयॉं प्रदान करने वाले पेंड्रा के सुविधविहीन छोटे से गांव में जन्म लेकर एस पी, कलेक्टर फिर सांसद व छत्तीसगढ के प्रथम मुख्य मंत्री बनने के गौरव के बावजूद छत्तीसगढिया सहज सरल व्यक्तित्व के धनी, अजीत प्रमोद कुमार जोगी ।

छत्तीसगढ के जनजातीय इतिहास को यदि हम खंगालें तो हमें परिगणित समुदाय की सत्ता का विस्तृत रूप नजर आता है, सत्ता व प्रतिभा का यह आग बरसों से राख में दबा गौरेला के गांव में पडा था जो छत्तीसगढ की सत्ता का असल हकदार था ।

खडखडिया सायकल से मोहन, शंकर व राजू के साथ आठ किलोमीटर सायकल ओंटते हुए स्कूल जाकर पढाई करने, मलेनियां नदी के बहाव को घंटों निहारने के साथ ही ठाकुर गुलाब सिंह के सिखाये संस्कृत श्लोंकों को आज तक हृदय में बसाये अजीत जोगी जी नें खाक से ताज तक की यात्रा अपनी मेहनत व अपनी असामान्य प्रतिभा के सहारे तय की है ।

मौलाना अबुल कलाम आजाद अभियांत्रिकी महाविद्यालय, भोपाल से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद से ख्यात प्रशासक आर पी व्ही टी नरोन्हा के प्रसंसक अजीत जोगी जी नें पहले 1967 में भारतीय पुलिस सेवा फिर 1970 में भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा बिना आरक्षण का लाभ लिये उत्तीर्ण किया यही नहीं उन्होंनें भारतीय प्रशासनिक सेवा में भारत के प्रथम दस सफल उम्मीदवारों में अपना नाम दर्ज कराया ।

सीधी, शहडोल, उमरिया, रायपुर व इंदौर में कलेक्टर के रूप में इनका कार्यकाल यादगार रहा है । कुशल प्रशासक के सवोच्च गुणों से सम्पन्न अजीत जोगी जी के कलेक्टरी के किस्से आज भी कर्मचारी बतलाते हैं । रायपुर में जब ये कलेक्टर थे तब जनता सेवा की इनकी प्रतिबद्धता को हमारे एक परिचित बतलाते हैं कि जब वे अचानक किसी गांव का दौरा करते थे एवं ग्रामीण कोई जायज शिकायत करते थे तब कागज-डायरी-फाईलों के आडंबर से दूर सिगरेट के खाली डिब्बे के पीछे मातहत कर्मचारियों के लिये आदेश लिखते थे तब कामचोर अधिकारी कर्मचारी मुत भरते थे । आज भी कई आफिसों में ऐसे पुर्जे आदेश के रूप में सुरक्षित हैं ।

कालांतर में जनता सेवा के इसी जजबे नें उन्हें राजनिति में स्थापित कर दिया । पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी नें छत्तीसगढ के जंगल के इस अनमोल हीरे को पहचाना, कहते हैं कि जब – जब पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी जी छत्तीसगढ के दौरे पर होती विमान चालक के रूप में राजीव गांधी जी भी छत्तीसगढ आते थे उस समय जोगी जी रायपुर के कलेक्टर थे और इनकी राजीव गांधी जी से मेल मुलाकात होती रहती थी । इसी समय से जोगी जी की प्रतिभा को तदसमय के भावी प्रधानमंत्री नें पहचान लिया था । तेरह वर्ष के रिकार्ड कलेक्टरी करने लेने के पश्च्यात सन् 1986 में इन्हें राज्य सभा के लिये चुन लिया गया, पार्टी के बेहतर सेवा के फलस्वरूप इन्हें 1992 में दुबारा राज्य सभा के लिए चुन लिया गया । इस समय तक तेज तर्रार अजीत जोगी जी भारत की राजनिति में अपनी प्रतिभा का परचम चहूं ओर फहरा चुके थे । 995 में इन्होंनें संयुक्त राष्ट्र संघ के पचासवीं वर्षगांठ पर संपूर्ण विश्व के प्रतिनिधियों को संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा में संबोधित कर पूरे विश्व को अपनी क्षमता व प्रतिभा का कायल बना दिया ।

दो कार्यकाल तक राज्य सभा से चुने जाने के बाद सन् 1998 में रायगढ लोकसभा से इन्हें चुनकर छत्तीसगढ की जनता नें इस असल छत्तीसगढिया का सम्मान किया । 1 नवम्‍बर 2000 से इस छत्तीसगढिया नें छत्तीसगढ के प्रथम मुख्यमंत्री के पद को विकास की गंगा बहाते हुए अपनी गरिमामय प्रशासन व जन सेवा से पूरे कार्यकाल तक र्निविघ्न नवाजा । सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में एक गंभीर दुर्घटना के बावजूद वे रिकार्ड मतो से विजयी हुए । इस दुर्घटना नें उनकी सक्रियता को बांधने का प्रयास किया किन्तु अदम्य इच्छाशक्ति एवं सुदृढ वैचारिक प्रतिभा के धनी अजीत जोगी नें इससे उबरना सीख लिया है और वे अब धीरे धीरे स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रहे हैं ।

बचपन में ‘जे बहु गणा गता सो पंथा’ के सहारे जंगल में भटकने के बावजूद रास्ता पा जाने वाले अजीत जोगी जी नें इस संस्कृत के इस पद के विपरीत लोगों के पदचिन्हों के पीछे चलने के बजाए स्वयं अपना रास्ता बनाया है । आज 29 अप्रैल को इनके जन्म दिवस पर मैं उन्हें शुभकामनायें देता हूं एवं कामना करता हूं कि ईश्वर उन्हें आरोग्य प्रदान करें , छत्तीसगढ को उनसे अभी बहुत कुछ पाना है ।

संजीव तिवारी

(मैं राजनितिज्ञ नहीं हूं, न ही मुझे सत्ता या राजनीति से किंचित भी लगाव है । भावनात्मक रूप से मैं भारतीय जनता पार्टी को अपने ज्यादा करीब पाता हूं । कुछ वर्षों तक दिवंगत समाजवादी चिंतक, विद्वान पूर्व विधायक, छ.ग. लोकलेखा समिति के पूर्व अध्यक्ष एवं छत्तीसगढ के उपनेता प्रतिपक्ष स्व. महेश तिवारी के वैचारिक सहयोगी के रूप में कार्य करते हुए मैं तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी जी की प्रतिभा से रूबरू हुआ था, फिर एक जनता के रूप में उनका एक राज्य प्रमुख और प्रशासक के व्‍यक्तित्‍व का आंकलन करता रहा जिसके बाद ही इसे शब्‍द दे पाया । अजीत जोगी जी की कृतियां, लेख संग्रह ‘दृष्टिकोण’ व ‘सदी के मोड पर’ व कहानी संग्रह ‘फूलकुंअर’ एवं अंगेजी में ‘द रोल आफ डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर’ व ‘एडमिनिस्‍ट्रेशन आफ पेरिफेरल एरियाज’ व इन पर प्रकाशित ढेरों लेखों के बावजूद कुछ भी समय पर उपलब्ध नहीं हो पाया, इसके साथ ही मेरे भ्रमण पर होने के कारण व्यक्तिगत रूप से संदर्भ सामाग्री भी उपलब्ध नहीं हो पाया। भविष्य में इन्हें पढने के बाद गैर राजनीतिक रूप से वैचारिक पहलुओं पर एक बेहतर आलेख प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा )

12 comments:

  1. क्षमा करें, अजित जोगी की इमेज तो हमारे मन में ऐसी नहीं। शायद हमारा आकलन गलत हो।

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  2. मेरी तरफ़ से भी गुदडी के लाल ,यशस्वी ,तेजस्वी एवं आदरणीय जोगी जी को जन्म दिन कि हार्दीक बधाई !

    तिवारी जी राजनिती मे भागीदारी भी जरूरी है ,नही तो गधे खीर खाते रह जायेंगे और घोडो को दाना नसीब नही होगा !इसिलिये इस दिशा मे भी सोचा करे !

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  3. जोगी जी की मेधा और वक्तृत्व कला का कायल तो मैं भी हूं भले ही उनके राजनैतिक दांव पेंच का नही हूं!!

    मुझे लगता है वह बतौर एक आई ए एस जितने ज्यादा अच्छे थे उतने अच्छे राजनेता नही!

    छत्तीसगढ़ बनने के बाद मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल का गहन विश्लेषण करने के बाद ही यह राय सामने आती है!!


    जन्मदिन की बधाई व शुभकामनाएं उन्हें!

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  4. ऐसा है क्या?? फिर से पढ़ता हूँ शाम को इसे.

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  5. तिवारी जी, नि:संदेह जोगी जी छ.ग. के बडे एव्म सम्मानिय नेता है ;) किन्तु आपने उनके और उनके बेटे के तानाशाह शासन का वर्णन नही किया जो छ. ग. मे काग्रेस के हार का कारण था. और जिसने छ.ग. मे जातिवाद का जहर घोल दिया. आप लोग ज्यादा करीबी से जानते होगें. मै तो उनके बारे कुछ और हि सुन रखा है जैसे कि...विधायको को रिश्वत...जग्गी हत्याकांड...विधायको को तोडने हेतु पत्र देना...और भी बहुत कुछ...ऐसे तिवारी जी मैने पढा है कि रावण भी काफ़ी विद्वान थे और काफ़ी तपस्या के पश्चात शक्ति पाया था.

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  6. नमस्कार संजीव जी,
    अत्यंत उत्तम चिटठा लिखा है आपने.......
    साधुवाद........
    लोकेश जी ने कुछ टिप्पणियाँ की है जिनका उत्तर देना चाहूँगा ......
    मैं आपने चिट्ठे (विदुर नीति ब्लागस्पाट) मैं भी इस विषय को वृहद रूप में लिखना चाहता हूँ जल्द लिखूंगा कृपया थोडा इंतज़ार करें. आभी सिर्फ यह कहना चाहता हूँ की सोंचे.........
    जब अजित जी मुख्य मंत्री बने तो कितने विधायक उनके थे सी जी में किस राजनेता का एक छात्र राज था वे कितने ताकतवर थे समाचार जगत में कोंसे लोग ताकत वर थे और वो किसके प्रति निष्ठा रखते थे .......
    वे किसको मुख्य मंत्री देखना चाहते थे,
    अगर आपका उत्तर किसी स्थापित वृद्ध नेता है तो कृपया सोंचे क्या वह व्यक्ति......
    झूठा प्रचार आपने लाभ के लिए नहीं करवा सकता था........
    झूठा प्रचार और मिथ्या बातें १०० लोगों को बरगला सकती हैं पूरे छत्तीसगढ़ को नहीं.......
    आप ही आंकलन करें अगर अजित जी ऐसे व्यक्ति होते तो क्या महासमुन्द की जनता उन्हें १२५००० मतों से जीतती वो भी ७ बार के परखे हुए घर के आदमी के खिलाफ ......
    मतभेद मनभेद मनुष्य को शोभा देतें हैं घ्रणा दानवों का काम है......

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  8. अवस्थी जी, आपके आलेख का इंतजार रहेगा. जहां तक मुख्य मंत्री बनने का प्रश्न है... कांग्रेस मे बहुमत के अनुसार से नही व्यक्ति विशेष (high common) के चाहत से बनते हैं. चाहे पं. नेहरू का कांग्रेस का अध्य़क्ष चयन होना( या फ़िर कहे मनोनित होना) या श्री जोगी जी का मनोनित होना. भारत मे चुनाव पप्पु यादव, सुरजन सिंह, रघुराज प्रताप सिंह, अंसारी, शाह्बुद्दीन, गावरी जैसे लोग भी जीते हैं. ऐसे मै राजनीति से नही हु और किसी से घ्रणा भी नहीं.

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  9. संजीवजी
    अजीत जोगी को लकर मेरे मन में बहुत ही खराब राय है। इसमें संदेह नहीं कि जोगी ने गांव से निकलकर बहुत बड़ा मुकाम हासिल किया है। लेकिन, सिर्फ इस बिना पर अजीत जोगी को महान नेताओं में शामिल करना ठीक नहीं होगा। भ्रष्टाचार, अपराध बाप-बेटे के रोज के कामों में शामिल लगता है। हो, सकता है मेरी राय गलत बनी हो। आप नजदीक से देख रहे हैं।

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  10. संजीवजी,
    आप माननीय 'श्री अजीत जोगीजी' के बारे में लिखे आपके इस लेख के लिए निश्चय ही साधुवाद के पात्र हैं... आपने निश्चय ही गहन अध्ययन-विश्लेषण करने के बाद ही इस लेख को लिखा है। आपका यह कहना कि "भावनात्मक रूप से मैं भारतीय जनता पार्टी को अपने ज्यादा करीब पाता हूं।" और उसके बावजूद श्री जोगीजी के बारे में इतना गह्नात्मक लेख लिखना आपके सकारात्मक और दार्शनिक सोच को दर्शाता है।
    अत्यन्त ही उत्तम लेख है... श्री जोगीजी के एक छोटे से गांव से छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री बनने तक के सफर को तो सभी जानते हैं लेकिन आपने सहज तरीके से जो आपने यह समझाया कि किस तरह से और कितनी मेहनत से उन्होने इस मुकाम को हासिल किया, यह निश्चित रूप से काबिल-ए-तारीफ है...

    प्रिय हर्षवर्धन जी,
    श्री जोगीजी सिर्फ इसलिए महान नहीं हो जाते क्योंकि उन्होने एक छोटे से गांव से निकलकर इस मुकाम को हासिल किया. बचपन से ही असामान्य प्रतिभा के धनि एवं सहज, सरल ब्यक्तित्व श्री जोगीजी ने हमें एक सपना दिखाया, आगे बढ़ने का. उन्होने हमें यह सिखाया की कम से कम श्रोतों में किस तरह तरक्की की जाती है. उन्होने हमें एक हौसला दिया. उन्होने अपने सिर्फ तीन साल के कार्यकाल में हमें यह जताया की एक छोटे से नवगठित राज्य को किस तरह विश्व के नक्शे में स्थापित किया जाता है, एक विकसित राज्य के रूप में. जिस व्यक्ति कि सोच ही कुछ निराली है, जो सोचता है कि अपनी जनता और अपने राज्य के लिए कुछ करूं, जो यह चाहता है कि अपने राज्य का हर नागरिक चैन से रहते हुए उन्नति के सपने देखते हुए प्रगति की राह पर चले, जिसका सपना है कि अपने राज्य का हर विद्यार्थी अपने राज्य में ही उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा ग्रहण करे, जिसका मानना है कि अपने राज्य का हर किसान खुशहाल ज़िंदगी जीते हुए प्रगति करे, जो यह कहता है कि हमारा राज्य पूरे देश में हर क्षेत्र में अग्रणी हो, जो एक सपना देखता है एक विकसित राज्य का, जो सोचता है कि औद्योगीकरण की नीति अपनाकर राज्य में विकास की एक धारा बहाई जाये, जिसकी सोच में एक सपना है... ये सब बाते उन्हें महान नेताओं की श्रेणी में ला खडा करती हैं.
    हमारे जैसे कई लोग सिर्फ उन्हीं बातों को सच मान लेते हैं जो हम पढ़ते और सुनते है... जो अखबारों में लिखा होता है और जो विरोधियों द्वारा बरगलाये जाते हैं. लेकिन हम उन बातों में छुपी सच्चाई को जानने की कोशिश नहीं करते और ना ही उसकी तह तक जाने की कोशिश करते हैं. बल्कि हम भी उन्ही की राह पर, चार बातें और जोड़कर लोगों को सुनाने लग जाते हैं.
    आरोप-प्रत्यारोप तो राजनीती के हमसफ़र हैं. इसका मतलब यह नहीं की बिना किसी गूढ़ प्रमाण के हम किसी भी राजनेता को आरोपी घोषित कर दें. अगर ऐसा है तो फिर हमें न्यायपालिका की जरुरत क्यों? अगर मैं थाने में जाकर यह रिपोर्ट दर्ज करा दूँ की आपने मुझे जान से मरने की धमकी दी है, इसका मतलब यह तो नहीं की आप आरोपी सिद्ध हो गए? आरोपी साबित करना तो न्यायपालिका का काम है ना, वह भी सबूतों के आधार पर!
    यह हमारा सौभाग्य है की हमें श्री जोगीजी जैसा कुशल एवं प्रतिभावान नेतृत्व मिला है जो हमें एक सही राह दिखा सकता है. श्री अमित जोगीजी के बारे में भी मेरी यही राय है!
    (टिपण्णी: ये सब मेरी ब्वाक्तिगत राय हैं और किसी भी तरह से राजनीती से प्रेरित नहीं हैं.)

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  11. dharmantaran karva kar chhattisgarhiya sanskriti se dur jana aur videshi pampara ko apnane wale vyakti ko main chhattisgarh ka saput nahi maan sakta......jaroor main unke jiwan ki safalta par unko shubkamnaye deta hun!!!

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  12. इस पोस्ट और निचे लिखे "नोट" को पढ़कर आदरणीय संजीव जी की विस्तृत सोच और विशाल ह्रदय का पता चलता है
    भारतीय जनता पार्टी को स्वयं के करीब पाने वाले तिवारी जी ने अगर जोगी जी की अच्छाइयों का वर्णन किया है तो यह मेरी नजर में अनुकर्णीय और अद्भुत है|
    इस पोस्ट तथा इसमें सुधीजनों द्वारा की गयी टिपण्णी को पढने के बाद चार पंक्ति जरुर कहना चाहूँगा :-
    बुरा जो देखन मै चला,
    बुरा न मिलया कोय.
    जो मन देखा आपना,
    मुझसा बुरा न कोय.

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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