ब्लॉग छत्तीसगढ़

28 October, 2007

हममें होकर गुजरता है वक्त, बेवक्त : यादें सुब्रत बसु

अशोक सिंघई जी द्वारा सुब्रत दा को अर्पित श्रद्धासुमन

अखबार ज़िन्दगी की बड़ी जरूरी और गैरजरूरी ज़रूरत है। खबरें अच्छी हों या बुरी, एक ही पन्ने पर सजकर आती हैं। अखबार से ही जाना कि जाने में आना हो या न हो पर आने पर जाना ही होता है। अमूमन मुझे सुबह अच्छी नहीं लगती। वह सुबह, शायद २८ सितम्बर की, तो खास तौर पर नाकाबिले-बरदाश्त लग रही थी। सूरज भी आँखें चुरा था। मुझे क्या पता था कि यह सुबह एक सूरज के अस्त होने की खबर से शुरू हो रही है। गरम चाय कब ठंडी हो गई, भनक ही नहीं लगी। सुबह की ताज़ी हवा, चिड़ियों की चहचहाहट, काम पर जाने की तिश्नगी - सब का स्वाद जाता रहा। अखबारों ने बताया कि सुब्रत बोस ज़िन्दगी के रंगमंच को अलविदा कह गये हैं और मैं सोचता रहा अब क्या गुनगुनायेंगे कि, 'बम्बई से आया मेरा दोस्त.........।`


आठवें दशक में भारत के नये तीर्थ भिलाई में दाना-पानी के लिये यह पंछी भी हज़ारों की तरह जोशखऱोश से बलबलाता उतरा। छत्तीसगढ़ के त्रिवेणी संगम, राजिम की संस्कृति साथ थी, साहित्य और संस्कृति के आकर्षण में पहले ही मुब्तिला था। वैसे ही साथियों को ढूँढती आँखों को एक बड़ी बिरादरी नज़र आई। साहित्य के दरीचों से संगीत की लहरों के साथ रंगमंच की भव्यता से साक्षात्कार हुआ। कई कद्दावर व्यक्तित्व भिलाई की सांस्कृतिक सक्रियता के सूत्रधार नज़र आये। सुकवि केशव पाण्डे, दानेश्वर शर्मा, विमल पाठक, मोहन भारतीय, रवि श्रीवास्तव, प्रसन्न जैन, परदेशीराम वर्मा, मुकुन्द कौसल मोहन सिंह चन्देल, विमलेन्दु सिंह, संतोष झांझी और भी न जाने कितने, गिनती ही खत्म नहीं होती। इस हुजूम में हम जैसे कुछ ऐसे नौजवान भी थे, जिनके खुशनुमा चेहरों की मसें भींग रहीं थीं, तो ऐसे भी लोग थे, जो उम्र का एक पड़ाव पार कर रहे थे, जिनके चेहरों पर समय के थपेड़ों और अनुभवों ने गंभीरता की तहें रखनी शुरू कर दी थी।


कवि-गोष्ठियों की लहरों पर सवार नये-नये साहित्यानुरागी को सितारों से जगमगाता एक नया ही आकाश मिला। नेहरू सांस्कृतिक सदन में नाटकों की गतिविधियों की अलग ही दस्तकें थीं। एक लम्बा-चौड़ा, साँवला सा शख्स प्रसन्न जैन के साथ वैसे ही दिखता था जैसे सिक्के का दूसरा पहलु। सिक्केबंद दमदार आवाज़। ग्रीक-नायकों जैसे तीखे नाक-नक्श। स्वाभिमान से दमकता व्यक्तित्व। बौद्धिकता के तेज से दमकती बड़ी-बड़ी आँखें। वह एक अशांत सागर था, किसी किनारों में न बँधने और अँटने को व्याकुल। वह शख्स था सुब्रत बोस। इतनी अधिक मुलाकातें हुईं कि पहली बार कब, कहाँ मिले, याद ही नहीं। अब लगता है कि कितनी कम बार मिले, साथ-साथ बैठे। सागर रीत गया और रह गई सिर्फ अपार रेत। यादों के बवण्डर से मन की आँखों में किरकिराती रेत। मरीचिका सा विभ्रम, न कुछ दिखता है साफ-साफ और न ही कुछ देखने देता है साफ-साफ, समय की धुँध में। कुछ भूले-बिसरे चित्र उभरते हैं, दिल की अँगुलियों से टटोलता हूँ उन्हें, आँखों में तो उतर गया है, वह अशांत सागर।


सेक्टर-६ के 'ए` मार्केट की चाय की गुमटीनुमा दुकान, सेक्टर-६ के 'बी` मार्केट का तिवारी पान का ठेला जहाँ खड़े-बैठे गुजरती रहती थी रात, बहस-मुबाहसों से गर्म, कविताओं के पोस्टमार्टम, गोष्ठियों की विवेचनायें, छींटाकसी, और इन सबके बीच प्रसन्न जैन का अधैर्यता से लम्बे-लम्बे कश लगाना, एक खत्म हुई नहीं कि दूसरी सिगरेट का सुलग जाना। प्रसन्न की तमतमाहट और सुब्रत की खिलखिलाहट - अँधेरे में जैसे कौंधती बिजली दिख जाती है, वैसे ही कुछ-कुछ साफ-साफ सा दिखने लगता है, मानों कल की ही बात हो। सुब्रत का नाटक हो, और प्रसन्न की कविता, गीत न हो, कैसे हो सकता है कि हॉफ चाय हो और सामूहिक कशों से धुँकती चारमीनार न हो। सुब्रत भाई बड़े ही फक्र से बताते थे कि, कोक ओवन्स में हैं हम दोनों, वो भी कोल-केमिकल्स में। प्रेम साईमन भी जिक्र में हुआ करते थे। देश में तब रंगकर्म की जो भी गत रही हो, पर भिलाई में तो इस विधा की धूम थी। रंगकर्म के अखाड़े में एक से एक पहलवान तब भी थे और आज भी हैं। इस लिहाज़ से सुब्रत की नस्ल कमजोर नहीं हुई। फिर भी उन दिनों संयंत्र पर उनका स्टील बैले एक अनूठा और न दोहराया गया प्रयोग साबित हुआ। पारम्परिक और अधुनातन नाट्य प्रयोगधर्मिता के उस दौर में लोकनाट्य भी नये कलेवर में सांस्कृतिक रंगमंच पर तूफान ढा रहा था।


सुब्रत बोस एक जुऩूनी व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी क्रियेटिव्हिटी का उफ़ान उनको अशांत और असंतुष्ट बनाये रखता था। वे कुछ खा़स कर गुजरना चाहते थे। अपने किये-धरे पर उन्हें रत्ती भर भी संतोष नहीं था। उनके कलाकार-पाखी को यह आसमान जाना-पहचाना, टटोला हुआ और छोटा लगने लगा था, उसका दम घुटने लगा था। शायद उन्हें इस तथ्य का भास हो गया था कि यदि अविस्मरणीय बनना है तो शान्ति नहीं मिलेगी और यदि अमर होना है, तो इसी जीवन में कई-कई बार मरना होगा। शायद इसीलिये रंगकर्म के बाद जिसे वे सबसे ज्यादह चाहते थे, भिलाई और अपने परिवार, यार-दोस्त, नौकरी - सब कुछ छोड़कर, मायानगरी चले गये। यह सब कुछ अनायास ही नहीं घटा। बहुत सोच-समझकर उन्होंने यह फैसला लिया था। यह सिद्धार्थ का पलायन नहीं था। पत्नी, श्रीमती दीपशिखा बोस को सब कुछ पूर्व-ज्ञात था। उनके समर्थन और सहयोग के बिना सुब्रत शून्य थे। सुब्रत की शून्यता को अर्थवान बनाने के लिये पीछे-पीछे वे भी बम्बई चली गईं। परिवार के आर्थिक आधार और सुब्रत को मानसिक आधार देने के लिये दीपशिखा ने अपना स्थानान्तरण बीएसपी के बम्बई ऑफिस करवा लिया था। दीपशिखा उनकी प्रिया थीं, फिर पत्नी हुईं और फिर शक्ति। दोनों रंगकर्मियों की जीवन भर की तपस्या का फल सामने आया अनुराग बासु के रूप में। अनुराग की सफलताओं में सुब्रत का ब्रत पूरा हुआ।

सुब्रत फिर-फिर भिलाई आते रहे। बम्बई की सारी व्यस्तताओं के बावजूद। वे सबसे जतन कर मिलते और गर्व से अपने संघर्षों, अपनी टुकड़े-टुकड़े सफलताओं की दास्तानें सुनाते। मेरे अनुरोध पर उन्होंने इस्पातनगरी के दर्शकों के लिये संयंत्र की वीडियो समाचार पत्रिका 'भिलाई रेफ्क्लेशन्स्` के लिये इंटरव्यू देना स्वीकार किया था। यह इंटरव्यू उनके प्रिय यश ओबेरॉए के घर में रिकार्ड किया गया था। यश के साथ एकबार वे मेरे घर भी आये और एक लम्बी अड्डेबाज़ी हुई। उनका उत्साह, उनका जोश, उनकी योजनायें देख-सुनकर लगता था कि सुब्रत ने उम्र को पछाड़ दिया है। उनके मन और सोच का युवापन उनके दिमाग में मानों ठहर गया था। मुझे उनसे मिलकर एक नई ऊर्जा का अहसास होता था।


उन्हें भिलाई से बेइंतहा प्यार था। 'हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते; मगर जी नहीं सकते, तुम्हारे बिना।` कुछ यही अफ़साना है उनका। सुब्रत बम्बई तो गये, पर शायद अपनी आत्मा इस इस्पातनगरी में छोड़ गये थे जहाँ धड़कते हुये उनके कई दिल थे, कई यादें थीं, कई खट्टे-मीठे अनुभव थे। हमारी ज़ानिब, 'एक मुद्दत से तेरी याद भी न आई हमें, और हम भूल गये हों तुझे, ऐसा भी नहीं।` वे सच्चे मायनों में यारबाश थे। मुझे नहीं लगता कि वे पूरी तरह कहीं बहुत दूर, पकड़ से बाहर चले गये हैं। उनकी आत्मा यहीं कहीं होगी, नेहरू हाउस के ईद-गिर्द। सितारा बनने गये सुब्रत बोस अब चोला छोड़कर आकाश का सितारा बन गये हैं। मुझे लगता है कि मानों अपनी उसी सिक्केबंद खनकदार आवाज में वे ज़नाब अहमद नदीम कासिम का यह शेर गुनगुना रहे हों,

''कौन कहता है, मौत आयेगी तो मर जाऊँगा,
मैं तो दरया हूँ, समंदर में उतर जाऊँगा।
तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊँगा,
घर में घिर जाऊँगा, सहरा में बिखर जाऊँगा।``

बस अब तमन्ना यही है कि हममें घेरने की और गंध को समेटने की कूबत बनी रहे! आमीन!!

5 comments:

  1. सुव्रत दा के बारे में जानकर अच्छा लगा!

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  2. सुब्रत बसु के बारे में आपने कितनी खूबसूरती से बयान किया है पढ़्कर एक बार तो लगा कि हम मिल चुके है उनसे...आपका लेखन वाकई काबिले तारीफ़ है...बहुत दुख की बात है सुब्रत बसु नही रहे मगर हमारी आपकी एसे ही न जाने कितने लोगो की यादो में वो हमेशा जिन्दा रहेंगे...

    सुनीता(शानू)

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  3. छत्तीसगढ़ के रंगमंच की जब कभी चर्चा होगी तो सुब्रत जी ज़रुर याद किए जाएंगे!

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  4. एक बार फिर से रोचक जानकारी देने के लिये आभार। आपका ब्लाग तो राज्य की शान और पहचान बन चुका है। बधाई।

    ReplyDelete
  5. सुब्रद दा के विषय में इस प्रस्तुति के लिये आपका आभार.

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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28 October, 2007

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आठवें दशक में भारत के नये तीर्थ भिलाई में दाना-पानी के लिये यह पंछी भी हज़ारों की तरह जोशखऱोश से बलबलाता उतरा। छत्तीसगढ़ के त्रिवेणी संगम, राजिम की संस्कृति साथ थी, साहित्य और संस्कृति के आकर्षण में पहले ही मुब्तिला था। वैसे ही साथियों को ढूँढती आँखों को एक बड़ी बिरादरी नज़र आई। साहित्य के दरीचों से संगीत की लहरों के साथ रंगमंच की भव्यता से साक्षात्कार हुआ। कई कद्दावर व्यक्तित्व भिलाई की सांस्कृतिक सक्रियता के सूत्रधार नज़र आये। सुकवि केशव पाण्डे, दानेश्वर शर्मा, विमल पाठक, मोहन भारतीय, रवि श्रीवास्तव, प्रसन्न जैन, परदेशीराम वर्मा, मुकुन्द कौसल मोहन सिंह चन्देल, विमलेन्दु सिंह, संतोष झांझी और भी न जाने कितने, गिनती ही खत्म नहीं होती। इस हुजूम में हम जैसे कुछ ऐसे नौजवान भी थे, जिनके खुशनुमा चेहरों की मसें भींग रहीं थीं, तो ऐसे भी लोग थे, जो उम्र का एक पड़ाव पार कर रहे थे, जिनके चेहरों पर समय के थपेड़ों और अनुभवों ने गंभीरता की तहें रखनी शुरू कर दी थी।


कवि-गोष्ठियों की लहरों पर सवार नये-नये साहित्यानुरागी को सितारों से जगमगाता एक नया ही आकाश मिला। नेहरू सांस्कृतिक सदन में नाटकों की गतिविधियों की अलग ही दस्तकें थीं। एक लम्बा-चौड़ा, साँवला सा शख्स प्रसन्न जैन के साथ वैसे ही दिखता था जैसे सिक्के का दूसरा पहलु। सिक्केबंद दमदार आवाज़। ग्रीक-नायकों जैसे तीखे नाक-नक्श। स्वाभिमान से दमकता व्यक्तित्व। बौद्धिकता के तेज से दमकती बड़ी-बड़ी आँखें। वह एक अशांत सागर था, किसी किनारों में न बँधने और अँटने को व्याकुल। वह शख्स था सुब्रत बोस। इतनी अधिक मुलाकातें हुईं कि पहली बार कब, कहाँ मिले, याद ही नहीं। अब लगता है कि कितनी कम बार मिले, साथ-साथ बैठे। सागर रीत गया और रह गई सिर्फ अपार रेत। यादों के बवण्डर से मन की आँखों में किरकिराती रेत। मरीचिका सा विभ्रम, न कुछ दिखता है साफ-साफ और न ही कुछ देखने देता है साफ-साफ, समय की धुँध में। कुछ भूले-बिसरे चित्र उभरते हैं, दिल की अँगुलियों से टटोलता हूँ उन्हें, आँखों में तो उतर गया है, वह अशांत सागर।


सेक्टर-६ के 'ए` मार्केट की चाय की गुमटीनुमा दुकान, सेक्टर-६ के 'बी` मार्केट का तिवारी पान का ठेला जहाँ खड़े-बैठे गुजरती रहती थी रात, बहस-मुबाहसों से गर्म, कविताओं के पोस्टमार्टम, गोष्ठियों की विवेचनायें, छींटाकसी, और इन सबके बीच प्रसन्न जैन का अधैर्यता से लम्बे-लम्बे कश लगाना, एक खत्म हुई नहीं कि दूसरी सिगरेट का सुलग जाना। प्रसन्न की तमतमाहट और सुब्रत की खिलखिलाहट - अँधेरे में जैसे कौंधती बिजली दिख जाती है, वैसे ही कुछ-कुछ साफ-साफ सा दिखने लगता है, मानों कल की ही बात हो। सुब्रत का नाटक हो, और प्रसन्न की कविता, गीत न हो, कैसे हो सकता है कि हॉफ चाय हो और सामूहिक कशों से धुँकती चारमीनार न हो। सुब्रत भाई बड़े ही फक्र से बताते थे कि, कोक ओवन्स में हैं हम दोनों, वो भी कोल-केमिकल्स में। प्रेम साईमन भी जिक्र में हुआ करते थे। देश में तब रंगकर्म की जो भी गत रही हो, पर भिलाई में तो इस विधा की धूम थी। रंगकर्म के अखाड़े में एक से एक पहलवान तब भी थे और आज भी हैं। इस लिहाज़ से सुब्रत की नस्ल कमजोर नहीं हुई। फिर भी उन दिनों संयंत्र पर उनका स्टील बैले एक अनूठा और न दोहराया गया प्रयोग साबित हुआ। पारम्परिक और अधुनातन नाट्य प्रयोगधर्मिता के उस दौर में लोकनाट्य भी नये कलेवर में सांस्कृतिक रंगमंच पर तूफान ढा रहा था।


सुब्रत बोस एक जुऩूनी व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी क्रियेटिव्हिटी का उफ़ान उनको अशांत और असंतुष्ट बनाये रखता था। वे कुछ खा़स कर गुजरना चाहते थे। अपने किये-धरे पर उन्हें रत्ती भर भी संतोष नहीं था। उनके कलाकार-पाखी को यह आसमान जाना-पहचाना, टटोला हुआ और छोटा लगने लगा था, उसका दम घुटने लगा था। शायद उन्हें इस तथ्य का भास हो गया था कि यदि अविस्मरणीय बनना है तो शान्ति नहीं मिलेगी और यदि अमर होना है, तो इसी जीवन में कई-कई बार मरना होगा। शायद इसीलिये रंगकर्म के बाद जिसे वे सबसे ज्यादह चाहते थे, भिलाई और अपने परिवार, यार-दोस्त, नौकरी - सब कुछ छोड़कर, मायानगरी चले गये। यह सब कुछ अनायास ही नहीं घटा। बहुत सोच-समझकर उन्होंने यह फैसला लिया था। यह सिद्धार्थ का पलायन नहीं था। पत्नी, श्रीमती दीपशिखा बोस को सब कुछ पूर्व-ज्ञात था। उनके समर्थन और सहयोग के बिना सुब्रत शून्य थे। सुब्रत की शून्यता को अर्थवान बनाने के लिये पीछे-पीछे वे भी बम्बई चली गईं। परिवार के आर्थिक आधार और सुब्रत को मानसिक आधार देने के लिये दीपशिखा ने अपना स्थानान्तरण बीएसपी के बम्बई ऑफिस करवा लिया था। दीपशिखा उनकी प्रिया थीं, फिर पत्नी हुईं और फिर शक्ति। दोनों रंगकर्मियों की जीवन भर की तपस्या का फल सामने आया अनुराग बासु के रूप में। अनुराग की सफलताओं में सुब्रत का ब्रत पूरा हुआ।

सुब्रत फिर-फिर भिलाई आते रहे। बम्बई की सारी व्यस्तताओं के बावजूद। वे सबसे जतन कर मिलते और गर्व से अपने संघर्षों, अपनी टुकड़े-टुकड़े सफलताओं की दास्तानें सुनाते। मेरे अनुरोध पर उन्होंने इस्पातनगरी के दर्शकों के लिये संयंत्र की वीडियो समाचार पत्रिका 'भिलाई रेफ्क्लेशन्स्` के लिये इंटरव्यू देना स्वीकार किया था। यह इंटरव्यू उनके प्रिय यश ओबेरॉए के घर में रिकार्ड किया गया था। यश के साथ एकबार वे मेरे घर भी आये और एक लम्बी अड्डेबाज़ी हुई। उनका उत्साह, उनका जोश, उनकी योजनायें देख-सुनकर लगता था कि सुब्रत ने उम्र को पछाड़ दिया है। उनके मन और सोच का युवापन उनके दिमाग में मानों ठहर गया था। मुझे उनसे मिलकर एक नई ऊर्जा का अहसास होता था।


उन्हें भिलाई से बेइंतहा प्यार था। 'हमें तुमसे प्यार कितना, ये हम नहीं जानते; मगर जी नहीं सकते, तुम्हारे बिना।` कुछ यही अफ़साना है उनका। सुब्रत बम्बई तो गये, पर शायद अपनी आत्मा इस इस्पातनगरी में छोड़ गये थे जहाँ धड़कते हुये उनके कई दिल थे, कई यादें थीं, कई खट्टे-मीठे अनुभव थे। हमारी ज़ानिब, 'एक मुद्दत से तेरी याद भी न आई हमें, और हम भूल गये हों तुझे, ऐसा भी नहीं।` वे सच्चे मायनों में यारबाश थे। मुझे नहीं लगता कि वे पूरी तरह कहीं बहुत दूर, पकड़ से बाहर चले गये हैं। उनकी आत्मा यहीं कहीं होगी, नेहरू हाउस के ईद-गिर्द। सितारा बनने गये सुब्रत बोस अब चोला छोड़कर आकाश का सितारा बन गये हैं। मुझे लगता है कि मानों अपनी उसी सिक्केबंद खनकदार आवाज में वे ज़नाब अहमद नदीम कासिम का यह शेर गुनगुना रहे हों,

''कौन कहता है, मौत आयेगी तो मर जाऊँगा,
मैं तो दरया हूँ, समंदर में उतर जाऊँगा।
तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊँगा,
घर में घिर जाऊँगा, सहरा में बिखर जाऊँगा।``

बस अब तमन्ना यही है कि हममें घेरने की और गंध को समेटने की कूबत बनी रहे! आमीन!!
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