गांव की महकती और खनकती आवाज़ है - ममता चंद्राकर
विनोद साव

अपनी खनकती आवाज़ से छत्तीसगढ़ी के लोक-गीतों को मोहक आंचलिकता से भर देने वाली यशस्वी गायिका ममता चंद्राकर को पद्मश्री से नवाजा जाएगा. लोक गायन में मुखरित होने की कला ममता जी को विरासत में मिली है. वे दुर्ग के लोक कला मर्मज्ञ दाऊ महासिंग चंद्राकर की बेटी हैं जिन्होंने अपने निर्देशन में 'सोनहा बिहान' जैसे लोकमंच को प्रस्तुत किया था. संप्रति ममता जी रायपुर आकाशवाणी केन्द्र में उप निदेशक है. वे छत्तीसगढ़ी फिल्मों के निर्देशक प्रेम चंद्राकर की जीवन-संगिनी हैं.

ममता चंद्राकर ने छत्तीसगढ़ी लोक गीतों की मंचीय प्रस्तुति को आधुनिक तामझाम से बखूबी जोड़ा है. इस तामझाम में मंच में प्रस्तुत करने की यांत्रिक कला है. ऐसी प्रस्तुति आज दुनिया की हर भाषा में लिखे गीत के लिए अब अनिवार्यता बन गई है. जिसमें एक भव्य मंच रोशनी से चकाचौंध होता है और तेज झनकता संगीत स्वर होता है. इसमें ज्यादातर नृत्य एक बड़े समूह के द्वारा किये जाते हैं. इस समूह की मुख्य गायिका नृत्य नहीं करती बल्कि ‘नेरटर’ यानी सूत्रधार के रूप में मंच पर पारंपरिक पहनावे के साथ खड़ी होती है और अपनी भाव-भंगिमाएं बिखेरती रहती हैं. इस तरह वह बड़े आकर्षक कलेवर में अपने गीतों को मस्ती में गाते हुए समां बांध लेती है

छत्तीसगढ़ में इस तरह की मोहक प्रस्तुतियों में जिन कलाकारों ने अपने को स्थापित कर लिया उनमें हैं ममता चंद्राकर और अलका चंद्राकर. यद्यपि इन दोनों कलाकारों में न केवल पीढ़ी का अंतर है बल्कि दोनों के गीत रूपों में भी अंतर है. अलका चंद्राकर छत्तीसगढ़ी में जहां सुगम संगीत में पिरोये अपने गीतों को फडकते अंदाज़ में पेश करने में माहिर हैं वहीं ममता चंद्राकर छत्तीसगढी के पारंपरिक लोक-गीतों को अपने गायन में मधुर स्वर देती हैं. यद्यपि लोकगीतों को गाने में प्रसिद्धि अनेक गायकों को मिली है पर आंचलिकता से पगी हुई आवाज जैसे पुरुष स्वर में हम लक्ष्मण मस्तुरिहा में पाते हैं वैसे ही नारी स्वर में आंचलिकता से लबरेज यह स्वर ममता के गाए गीतों में स्पष्ट झंकृत होता है. विशेषकर जब बिहाव गीतों के उनके श्रृंखलाबद्ध गीतों को सुना जाए तो वह वही स्वर है जो छत्तीसगढ़ की माटी में उपजी स्त्री के निपट गांव का गंवई स्वर होता है. इन स्वरों को गीतों के हिसाब से भिन्न रूप ममता अपनी गायकी से दे लेती हैं. इनमें दुल्हन के श्रृंगार के समय की रोमानी दुनिया होती है, तो तेलचघी, टिकावन, बरात निकासी, मऊर भडौनी गीतों के समय की प्रसन्नता मिश्रित चहकन भरी आवाज़ होती है तो भांवर और बिदाई के समय का आत्मिक रूदन भरा ह्रदय को झकझोरने वाला स्वर गूंजता है - यह सब ग्राम्यबोध से भरे श्रोताओं के सीधे अंतःस्थल को छू लेता है, सुनने वाले को बरबस ही भाव विभोर कर लेता है.

छत्तीसगढ़ राज्य बनते ही जो छत्तीसगढ़ी में फ़िल्में बनाने का उत्साह दिखा उनमें सतीश जैन की तरह ममता के पति प्रेम चंद्राकर भी एक कुशल फिल्म निर्देशक के रूप में सामने आए. प्रेम अपनी युवावस्था से ही विडियो शूटिंग व टेलीफिल्म निर्माण से जुड़े हुए थे. वे गंभीर किस्म के कला साधक रहे हैं. उनके खामोश चेहरे के भीतर कला और सोच के जो द्वन्द थे वे उनकी फिल्मों की कथाओं और निर्देशन के माध्यम से मुखरित हुए. प्रेम और ममता की संगति और उनकी कलात्मक जुगलबंदी ने छत्तीसगढ़ी फिल्मों, लोक गीतों, नृत्यों को अनेक आयाम दिए. यहाँ भी प्रेम की चुप्पी साधना ने ममता की गायन कला को सिनेमेटिक सौंदर्य से भर दिया. प्रेम चंद्राकर निर्देशित फिल्मों में गायिका ममता पर वैसा ही स्वाभाविक फिल्मांकन किया जिस तरह वे मंचों पर अपनी प्रस्तुतियाँ देती हैं. फिल्म के दृश्य में उपस्थित होकर जैसे ही ममता अपने गीत के बोल बोलती हैं ‘तोर मन कइसे लागे राजा ..’ वैसे ही सिनेमाहाल उमंग उल्लास से भरे दर्शकों की तालियों की गडगडाहट और सीटियों की सनसनाती फूंक से गूँज जाते हैं और फिल्मों की पार्श्व गायिका ममता फिल्मों की एक वायवी दुनियां की किरदार हो जाती हैं. टेलीफिल्म ‘लोरिक चंदा’ में पार्श्व गायन से शुरू हुई उनकी यह यात्रा आज फीचर फिल्मों तक जा पहुंची है और व्यावसायिक फिल्मों की वे अब जानी मानी गायिका हो गई हैं. उन्होंने छत्तीसगढ़ के लोकगीत - सुआ, गौरा गौरी, बिहाव, ददरिया को नई पहचान दी है. आज उनके गानों के सी.डी. गांव गांव में जमकर बिक रहे हैं. इन्टरनेट यूज़र उनके गीतों को अपने कंप्यूटर और मोबाइल में सुन रहे हैं. किन्हीं मायनों में ममता चंद्राकर आज नयी पीढ़ी की छत्तीसगढ़िया गायिकाओं की सबसे बड़ी ‘आइकन’ हो गयी हैं. ‘रंझाझर भौजी के डूमर माला’ जैसे गीत से शुरुवात करने वालीं ममता आज भी रंझाझर मता रही हैं. तब ऐसे में उन्हें पद्मश्री अलंकरण क्यों न मिले. वे सर्वथा योग्य हैं.

आकाशवाणी में पदस्थ होने से पहले ममता के कितने ही गीत तब रेडियो में बजा करते थे. इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय-खैरागढ़ से ‘कंठ संगीत’ यानी व्होकल म्यूजिक में एम.ए. और डाक्टरेट करने वाली ममता ने आकाशवाणी में अपने कंठ का जादू कुछ इस कदर बिखेरा कि आज वे रायपुर आकाशवाणी केन्द्र में उप निदेशक जैसे उच्च पद पर आसीन हैं. ममता चंद्राकर की इस अनवरत विकास यात्रा और पद्मश्री अलंकरण पाने के इस अवसर पर हम सबकी ओर से उन्हें ढेर सारी बधाइयां और शुभ-कामनाएं.
लेखक सम्पर्क eks- 9009884014

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निराला का गद्य यथार्थवादी साहित्य है

सरला शर्मा का उद्बोधन

जिला हिंदी साहित्य समिति के द्वारा संस्कृति विभाग के सहयोग से वसंत पंचमी के उपलक्ष्‍य में एक दिवसीय संगोष्‍ठी का आयोजन किया गया। दुर्ग के होटल अल्‍का के सभागार में आयोजित यह कार्यक्रम तीन सत्रों में था। जिसमें पहला सत्र महाकवि निराला के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित था। इस सत्र को संबोधित करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं व्यंग्‍यकार रवि श्रीवास्तव ने निराला के चर्चित रचनाओं एवं उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि महाकवि निराला की कविताओं को गोष्ठियों में पढ़ देने से उनकी रचनाओं का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता। उन्‍होंनें कहा कि निराला का साहित्यिक अवदान प्रेमचंद से कम नहीं है इसी कारण उन्‍हें महाकवि कहा गया। निराला की मातृभाषा बांग्ला थी किंतु वे हिंदी के बड़े कवि हुए, उन्होंने तत्‍कालीन सामंतों एवं सामंती व्‍यवस्‍था के प्रति अपने प्रतिरोध को अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया। ब्रज जैसे लोक भाषा में जो बात व्यापक रुप से नहीं कही जा सकती उसे उन्होंने खड़ी बोली हिंदी में कहा और उसे स्थापित किया। निराला के गद्य साहित्य पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ लेखिका सरला शर्मा ने कहा कि निराला का असल विद्रोही स्‍वरूप उनकी गद्य रचनाओं में ही दिखता है। उन्होंने वर्तमान समय के साथ निराला की रचनाओं को व्याख्यायित करते हुए कहा कि आज भी निराला की रचनाओं की प्रासंगिकता है, निराला नें युगानुरूप सृजन किया, छायावाद और प्रगतिवाद के संधि स्थल से निराला के रचना की शुरुआत होती है। निराला को नए युग का स्वागत करने वाले रचनाकार के रुप में माना जाता है, उनका गद्य यथार्थवादी साहित्य है। उन्होंने उनकी गद्य रचनाओं, निबंधों, कहानियों आदि पर चर्चा करते हुए कहा कि निराला सामाजिक सरोकारों का व्यापक चित्रण करते थे और अपनी अभिव्यक्ति को व्यंग्‍य के माध्यम से तीव्र प्रहारक बनाते थे। निराला साहित्यिक विसंगतियों के शिकार थे इसलिए उनके गद्य का समय पर उचित मूल्यांकन नहीं हो पाया। पाठ्यक्रमों में उनके गद्य साहित्य को स्थान दिया जाना चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे राजभाषा विभाग के पूर्व अध्‍यक्ष पं. दानेश्वर शर्मा ने बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा का उल्लेख करते हुए निराला के अनछुए प्रसंगों पर चर्चा की। 

कार्यक्रम के द्वितीय सत्र का विषय था दुर्ग जिले का इतिहास। इस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए इतिहासकार एवं जामगांव महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ के के अग्रवाल ने वाचिक परंपरा से लेकर ज्ञात उपलब्‍ध साक्ष्‍य व अविभाजित दुर्ग जिला के विभिन्न पुरातत्व स्थलों का उल्लेख करते हुए, जिले के इतिहास को समय बद्ध किया। कार्यक्रम के अगले वक्ता इतिहासकार व दुर्ग साईंस कालेज के प्राध्‍यापक डॉ. ए के पांडेय ने दुर्ग जिले के सफरनामा को तिथियों व आंकड़ों में विभाजित करते हुए बताया। उन्‍होंनें दुर्ग के ऐतिहासिक महत्व के कालखण्‍डों का उल्लेख करते हुए क्रमबद्ध रुप से दुर्ग नगर के इतिहास की जानकारी दी। सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्‍ठ साहित्‍यकार गुलबीर सिंह भाटिया जी ने दुर्ग के इतिहास से संबंधित खालसा शब्द को परिभाषित किया। कार्यक्रम में दुर्ग नगर के पुरातत्व एवं इतिहास से संबंधित चित्रों की प्रदर्शनी भी लगाई गई थी। जिसके चित्रों को अरुण गुप्ता नें विश्‍लेषित किया। इस सत्र में मुक्तकंठ साहित्य समिति के द्वारा प्रकाशित मासिक बुलेटिन का विमोचन अतिथियों एवं मुक्त कंठ साहित्य समिति के अध्यक्ष सतीश कुमार चौहान एवं डॉ नौशद सिद्धिकी, ओमप्रकाश शर्मा के द्वारा किया गया व उपस्थित साहित्‍यकारों को बुलेटिन की प्रति बांटी गई।

कार्यक्रम के अंतिम सत्र में सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता रायपुर से पधारे वरिष्ठ शायर गौहर जमाली ने किया। इस गोष्ठी में रायपुर दुर्ग एवं भिलाई से आए हुए कवियों ने अपनी कविताएं पढ़ी। जिसमें मुकुन्‍द कौशल, मुत्‍थुस्वामी, विद्या गुप्ता, नीता काम्‍बोज, अनीता श्रीवास्तव, नीलम जायसवाल, सबा खान, एमएल वैद्य, राधेश्‍याम सिंदूरिया, सिद्ध, अरुण कसार, अलकरहा, नवीन तिवारी, ओम प्रकाश जायसवाल, अरुण निगम, निजाम दुर्गवी, हाजी सुल्तानपुरी, नौशाद सिद्धिकी, प्रदीप पाण्‍डेय, युसूफ मछली आदि नें अपनी कविताओं का पाठ किया। इस एक दिवसीय कार्यक्रम में तुंगभद्र सिंह राठौर, जगदीश राय गुमानी, प्रदीप वर्मा, रतनलाल सिन्हा, प्रशांत कानस्कर, संतोष झांझी, रौनक जमाल, रमाकांत बराड़या, गजराज दास महंत, उमेश दीक्षित, त्रयंबक राव, शैलेंद्र तिवारी, जीवन सिंह राजपूत, गोविंद पाल आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन समिति के सचिव संजीव तिवारी नें किया एवं स्‍वागत भाषण समिति के अध्‍यक्ष डॉ संजय दानी नें दिया। 

पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन का ठीहा : गढ़कलेवा


खानपान के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय भोज्यपदार्थों के प्रति बढ़ती जनता की रूचि एवं शहरीकरण के चलते हम अपने पारंपरिक खान-पान को विस्मृत करते जा रहे हैं। देश के कई क्षेत्रों में पारंपरिक खान-पान की परंपरा आज विलुप्ति के कगार पर है, जबकि माना जाता है कि खान-पान संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। हमारी खान-पान की परंपरा हमारी क्षेत्रीय अस्मिता का गौरव है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ के संस्कृति संचालनालय द्वारा 'गढ़कलेव' के नाम से पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का एक रेस्टॉरेंट रायपुर में खोला गया है।


'गढ़कलेवा' का परिसर एक ठेठ खूबसूरत छत्तीसगढ़ी गांव के रूप में तैयार किया गया है। इस स्थल की साजसज्जा और जनसुविधाएं छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन का आनंद दिलाते हैं। जिसे गांव के ही पारंपरिक शिल्पियों ने ही मूर्त रूप देते हुए आकार दिया है। वर्तमान में यहाँ पारंपरिक परिवेश और बर्तनों में लगभग तीन दर्जन छत्तीसगढ़ी व्यंजन परोसा जा रहा है। आगे मध्यान्ह तथा रात्रि भोजन भी उपलब्ध कराया जायेगा।

इसका शुभारंभ प्रदेश के मुख्य मंत्री डॉ.रमन सिंह के द्वारा 26 जनवरी 2016 को किया गया। इस जलपानगृह में छत्तीसगढ़ की संस्कृति में रचे-बसे ठेठरी, खुरमी, चीला, मुठिया, अंगाकर रोटी, बफौरी, चउसेला जैसे तीन दर्जन से भी अधिक पारंपरिक व्यंजनों को शामिल किया गया है। छत्तीसगढ़ी परिवेश उपलब्ध कराने के लिए परिसर में लकड़ियों की आकर्षक कलाकृतियां भी बनाई गई हैं और दीवारों की भित्तिचित्र के माध्यम से सजावट की गई है। गढ़ कलेवा में जलपान में शामिल चाउर पिसान के चीला, बेसन के चीला, फरा, मुठिया, धुसका रोटी, वेज मिक्स धुसका, अंगाकर रोटी, पातर रोटी, बफौरी सादा और मिक्स, चउंसेला आदि परोसा जा रहा है। इसके अलावा मिठाइयों में बबरा, देहरउरी, मालपुआ, दूधफरा, अईरसा, ठेठरी, खुरमी, बिडि़या, पिडि़या, पपची, पूरन लाडू, करी लाडू, बूंदी लाडू, पर्रा लाडू, खाजा, कोचई पपची आदि भी परोसा जा रहा है। गढ़ कलेवा का एक अति महत्वपूर्ण पक्ष इसका परिसर है, जिसे ठेठ छत्तीसगढ़ी ग्रामीण परिवेश के रूप में तैयार किया गया है। इसकी साज-सज्जा और जनसुविधाएं सभी कुछ छत्तीसगढ़ ग्रामीण जीवन का आनंद उपलब्ध कराने की क्षमता रखते हैं।

समाचार : अपना सिर्फ दो हजार लगाएं,बनाएं शौचालय

राजधानी में भारत स्वच्छता मिशऩ में आड़े आ रही जमीन की कमी

राजधानी में मात्र 5,649 पात्र हितग्राही, हो चुका सर्वे

रायपुर। भारत स्वच्छता मिशन के अंतर्गत अब आप मात्र दो हजार रुपए में स्वयं का शौचालय बनवा या बना सकते हैं बशर्ते आपका नाम निगम द्वारा किए गए सर्वे में शौचालय विहीन घर के रुप में आया हो। केन्द्र सरकार द्वारा वित्त पोषित इस योजना के संचालन में राजधानी की गरीब बस्ती में जमीन की अनुपलब्धा प्रमुख अड़चन के रूप में सामने आ रही है।
नगर पालिका निगम के भारत स्वच्छता मिशऩ के नोडल अधिकारी अभियंता हरेन्द्र साहू बताते हैं कि इस योजना में एपीएल बीपीएल का कोई लफड़ा नहीं है राजधानी का कोई भी किसी भी श्रेणी का व्यक्ति अगर उसके घर में शौचालय नहीं है और उसके पास शौचालय बनवाने लिए जमीन है तो उसे इस योजना में शामिल किया जाएगा। चाहे फिर वह करोड़पति ही क्यों न हो। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि दो हजार रुपए में आप शौचालय बनवाने में सक्षम होंगे बल्कि स्वच्छता मिशन के माध्यम से आपको 18 हजार की सब्सीडी मिलेगी जिसका उपयोग कर आप शौचालय बनाने या बनवाने में कर सकते हैं। इसके अलावा अगर आप अपने शौचालय को और अच्छा बनाना चाहते हैं टाइल्स वगैरह लगाना चाहते हैं तो सरकार को कोई आपत्ति नहीं है,उसका खर्चा स्वयं आपको वहन करना पड़ेगा। इसके अलावा ज्यादा सदस्यों वाले परिवार में दूसरे सहनिवासी परिवार के नाम से भी अतिरिक्त टायलेट बनवाया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि इस योजना का सर्वे राजधानी में हुआ है सर्वे में कुल 7 हजार 9 सौ 14 मकान बिना शौचालय के पाए गए। इन मकानों में से 5 हजार 6 सौ 49 घरों को शौचालय निर्माण के लिए पात्र पाया गया। इन मकानों में 2019 तक शौचालय का निर्माण कराने की योजना चल रही है। श्री साहू ने बताया कि राजधानी के 15 प्रतिशत घरों में शौचालय बनाने के लिए जगह की कमी है जिसके कारण उनके लिए सार्वजनिक शौचालय ही विकल्प है। उन्होंने कहा कि इस योजना का अगला सर्वे फिर होगा अगर किसी का मकान छूट गया होगा तो वह उसके बाद के सर्वे में अपना नाम जुड़़वा सकता है।

योजना में शामिल होने के पात्र परिवार
ऐसे परिवार जिनके यहां शौचालय नहीं है और जिनके सदस्यों की संख्या 5 तक है इसके अलावा उनके पास घर के अतिरिक्त शौचालय निर्माण के लिए कम से कर आठ गुणा छह फुट की जमीन है । वे इस योजना में शामिल होकर शौचालय निर्माण की सहमति दे सकते हैं तथा नियमानुसार दो हजार रुपए नगर निगम में जमा कर सकते हैं। वैसे इस योजना के लिए सामान्यतया दस गुणा आठ फुट की जगह उपयुक्त होती है।

योजना के लिए अपात्र परिवार
इस योजना में कुछ परिस्थियों में शौचालय निर्माण की अनुमति नहीं दी जाती है -जैसे तालाब के किनारे की बस्ती क्योंकि पास डिजाइऩ में सोख्ता टंकी बनाने का प्रावधान है जो तालाब को प्रदूषित कर सकता है। इसके अलावा रेलवे की बेजा कब्जा वाली जमीन पर तथा ऐसी बस्तियां जिन्हें निकट भविष्य में विस्थापित किया जाना है।

योजना में अलग-अलग हितग्राही अंशदान
भारत को खुले में शौच मुक्त बनाने के अभियान में विभिन्न स्तरों पर हितग्राहियों से अलग-अलग अंशदान लिए जाने का प्रावधान है। नगर पालिक निगम क्षेत्र में दो हजार रुपए, नगर पालिका क्षेत्र में डेढ़ हजार तथा ग्राम पंचायत क्षेत्र में एक हजार रुपए का अंशदान लिया जाता है। हर स्तर पर डिजाइन भी बदलती है।

योजना एक नजर में
2014-15 के बचे शौचालय निर्माण 700
2015-16 का लक्ष्य 3000
अभी तक पूर्ण हुआ निर्माण 2019
निर्माण में लगे एनजीओ व ठेकेदार 43
(केवल राजधानी में संचालित योजना का ब्योरा)

ऐसे मिलेगी हितग्राही को राशि
हितग्राही स्वयं के योजना में शामिल होने की सहमति देगा और अपना बैंक अकाउंट देगा क्योंकि राशि सीधे खाते में जाएगी।
जमीन पर कार्य दिखाने के साथ हितग्राही के खाते में 2 हजार जमा होंगे।
स्लेब लेबल का काम दिखाने पर मिलेंगे 7 हजार रुपए।
हितग्राही के शौचालय बनवाकर उपयोग करने का प्रमाण दिखाने पर मिलेंगे 9 हजार रुपए।
(योजना में कार्य का प्रमाण मोबाइल से फोटो खींचकर दिखाना पर्याप्त है)

-प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट
रायपुर
प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट जी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, वर्तमान में रायपुर के प्रतिष्ठित दैनिक अखबार 'जनता से रिश्‍ता' से जुड़े हैं।
इनसे आप फेसबुक पर यहॉं संपर्क कर सकते हैं। 

डॉ.विष्‍णु सिंह ठाकुर : छत्‍तीसगढ़ के जीवंत ज्ञान कोश

डॉ विष्णु सिंह ठाकुर का जन्म 18 अगस्त 1933 को रायपुर जिले के सुंदर केरा गांव में हुआ था। आपने अपनी स्कूली शिक्षा रायपुर में ग्रहण की। ठाकुर जी की आर्थिक स्थिति उस समय अच्छी नहीं थी इसलिए उन्होंने आगे की शिक्षा को रोककर, शिक्षण का कार्य अपना लिया। वे अंबागढ़ चौकी के स्कूल में प्राथमिक शिक्षक के रूप में कार्य करनें लगे। ज्ञान के प्रति उनकी ललक शायद शुरु से ही रही होगी इसलिए, इस बीच उन्होंने अपनी नौकरी से अवकाश लेकर स्नातक और स्नातकोत्तर की परीक्षा देने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय चले गए। उन्होंने वहां से अपनी पढ़ाई पूरी करने पश्चात डॉ राजबली पांडे के मार्गदर्शन में ‘प्री हिस्ट्री एंड आर्कियोलाजी ऑफ दक्षिण कोसला’ विषय पर पीएच डी की उपाधि अर्जित की। इसके पश्चात वे दाउ कल्याण सिंह महाविद्यालय बलौदा बाजार में इतिहास के प्राध्यापक नियुक्‍त हो गए। सन 1972 में उन्होंने दुर्गा महाविद्यालय रायपुर में एक अध्यापक के रूप में कार्य शुरू किया और अपनी सेवानिवृत्ति तक वही कार्य करते रहे।

डॉ. विष्‍णु सिंह छत्तीसगढ़ के ज्ञान कोश के रूप में जाने जाते रहे हैं। छत्तीसगढ़ के संबंध में ऐसा कौन सा क्षेत्र था जिसके संबंध में उन्हें गहन जानकारी ना हो। यदि उन्हें छत्तीसगढ़ शास्त्री के रूप में संबोधित किया जाए तो शायद यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस राज्य का ज्ञात इतिहास हो, संस्कृति हो या भाषा हो, सभी विधाओं में उनकी जानकारी अतुलनीय थी। जिस विषय पर भी उन से चर्चा आरंभ की जाए वह बहुत गहराई के साथ उस विषय के संबंध में विस्‍तार से जानकारी देते थे। अपने जीवन के अंतिम दिनों तक वे छत्‍तीसगढ़ के विभिन्‍न विषयों पर गंभीर विमर्श किया करते थे और विमर्शों में सहज रूप से भाग लिया करते थे। इन विमर्शो में वे उपस्थित लोगों को नई-नई जानकारियां दिया करते थे। इतिहास और संस्कृति से उनका लगाव काफी गहरा था। वे रायपुर स्थित महंत घासीदास संग्रहालय में पिछले लगभग 40-50 वर्षों से प्रतिदिन आया करते थे। जहां वे सहज रूप से आगंतुकों व जिज्ञासुओं से छत्‍तीसगढ़ के विभिन्‍न पहलुओं पर विषय विशेषज्ञ के रूप में चर्चा किया करते थे। डॉ.विष्‍णु सिंह छत्तीसगढ़ राज्य की संस्कृति संचनालय द्वारा प्रकाशित की जाने वाली मासिक पत्रिका बिहनिया के आरंभ से संपादक रहे। जिसके पिछले अंक तक का संपादन उन्‍होंनें किया। अपनी अस्वस्थता के दिनों में भी वे बिना नागा किए प्रतिदिन संस्कृति संचालनालय आया करते थे। पिछले छह महीने की अवधि में उनका स्वास्थ्य अधिक खराब हो गया तब उनका यह क्रम टूटा।

वे संस्‍कृति संचालनालय में नौकरी नहीं करते थे किन्‍तु उनकी छत्तीसगढ़ संबंधी ज्ञान को बांटने की ललक ही थी जिसके चलते वे प्रतिदिन संचालनालय में आया करते थे। उन्होंने सैकड़ों लेख लिखे, अखबारों में उनकी लेखनी लगातार प्रकाशित होती थी। जब वे काफी क्रियाशील थे तब उन्होंने आकाशवाणी के रायपुर नागपुर और भोपाल केंद्र में सैकड़ों विषयों पर अपने आलेख प्रस्‍तुत किये। छत्तीसगढ़ पर यदि कोई महत्‍वपूर्ण सूचना देने वाली पुस्तक का नाम लिया जाए तो उसमें ‘राजिम’ नामक पुस्तक का उल्लेख सबसे पहले किया जाएगा। जिसे डॉ. विष्‍णु ठाकुर ने लिखा था। मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी ने इस ग्रंथ को प्रकाशित किया है। अविभाजित मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ शास्त्री के रूप में यदि किसी व्यक्ति की महत्ता थी तो वह थे डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर। डॉ. विष्‍णु सिंह ठाकुर के राज्‍य के प्रति महत्‍वपूर्ण अवदानों का सम्‍मान करते हुए राज्‍य शासन नें वर्ष 2014 में उन्‍हें पं.रविशंकर शुक्‍ल सम्‍मान भी प्रदान किया था। इस राज्य के पुरातत्वीय इतिहास को खोजने का उन्हेंने जो काम किया है वह अपने आप में अनुकरणीय हैं। उन्होंने राज्य के पुरातत्व और इतिहास के विविध पक्षों को न केवल राष्ट्रीय वरन अंतर्राष्ट्रीय जगत में प्रसारित प्रकाशित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके शोध ग्रंथ के प्रकाशन के संबंध में छत्तीसगढ़ शासन ने जिम्मा उठाया है। जिसके शीघ्र ही विमोचित होने की संभावना है ।

डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर समकालीन छत्तीसगढ़ में एक ऐसे ज्ञान पुंज थे जिन्होंने हमेशा छत्तीसगढ़ और यहां के लोगों, यहां की भाषा, यहां की संस्कृति, यहां का इतिहास, यहां का पुरातत्व सहित संपूर्ण प्रदेश के संबंध में ही सोचा। वे कहते थे कि, छत्तीसगढ़ में जो ज्ञान और संस्कृति का भंडार है वह समूचे विश्व को आलोकित करने की क्षमता रखता है। उनकी हमेशा प्रबल इच्छा रहती थी कि, छत्तीसगढ़ के संबंध में जो बातें अभी तक दुनिया नहीं जानती हैं वह दुनिया के समक्ष लाई जाए। वे हमेश कहते थे कि, छत्तीसगढ़ के लोगों में यहां की कला, संस्कृति, भाषा, जीवन शैली, सहजता, सरलता और प्रेम भाव की जो अनुकरणीयता है उसे यहां के लोगों को संभाल कर और सहेज कर रखना चाहिए। आज डॉ विष्णु सिंह ठाकुर जी का दुखद अवसान हुआ, इसके साथ ही एक ऐसे ज्ञान पुंज का हमारे बीच से विलोप हो गया, जिन्होंने इस राज्य को संस्कृति और पुरातत्व के क्षेत्र में अध्ययन करने हेतु एक नई दिशा प्रदान की। उन्‍होंनें अपने बाद की पीढ़ी के तमाम लोगों का संबल बढ़ाया। उन्‍होंनें बताया कि, छत्तीसगढ़ में इतना कुछ है कि कई जन्मों तक भी इसका अध्ययन नहीं किया जा सकता। यहां की महान संस्कृति और ज्ञान परंपराओं को अक्षुण रखने के लिए डॉ विष्णु सिंह ठाकुर द्वारा किए गए कार्यों को राज्य हमेशा याद रखेगा। उनका दुखद निधन प्रशासन, राजनीति, व्‍यापार, पत्रकारिता सहित अन्‍यान्‍य क्षेत्रों में कार्यरत उनके हजारों छात्रों, प्रेमियों, संबंधियों व प्रशंसकों सहित संपूर्ण राज्‍य के लिए अनुकरणीय क्षति है।

-अशोक तिवारी

ठीक पकड़े हैं, शौंचालय बनाना सस्ते का सौदा है

आप बिलकुल ठीक पकड़े हैं आप शौचालय बनाने की सोच रहे हैं या शौचालय में एसी लगाने की सोच रहे हैं जिसके चलते शौचालय महंगा बनेगा। शौचालय महंगा होता ही नहीं है। गांवों में तो शौचालय बाहर जाने की परंपरा है। गांवों में कहा जाता है -
नदी नहाए पूरा पाए , तालाब नहाए आधा।
कुआंं नहाए कुछ न पाए, घर नहाए ब्याधा।।

कहने का सीधा मतलब है कि नदी नहाने से पूरा पुण्य मिलता है जबकि तालाब नहाने से आधा और कुंआ नहाने से कुछ भी पुण्य नहीं मिलता है । वहीं घर में नहाने वाले बीमार व्यक्ति होते हैं। नहाने के पूर्व शौच जाना और फिर शुद्ध होना गांंव की परंपरा है। इस परंपरा में सुबह की सैर नदी की धारा में कटि स्नान शामिल है। यानी पूरी तरह वैज्ञानिक सम्पूर्ण स्नान। अगर ऊपर के दोहे को ध्यान से देखें तो उसके साथ गांव के शांत जीवन और पर्याप्त समय की बात भी छुपी हुई है जिसके पास जितना समय होता है उस हिसाब से वह नहाने और शौच के लिए नदी या तालाब का विकल्प चुनता है।
लेकिन अब पहले के से गांव नहीं रहे । किसानों की जोत छोटी हो गई है उन्हें अपनी जीविकोपार्जन के लिए खेती के अलावा भी अन्य काम करने पड़ते हैं इसलिए अब गांवों में भी लोगो के पास समय नहीं है उन्हें भी जल्द से जल्द तैयार होकर अपने काम से जाना पड़ता है इसके कारण उनके पास भी अब न तो नदी जाने की फुरसत है और न तालाब जाने का समय । चूंकि गृह स्वामी को जल्दी तैयार होना होता है तो उससे पहले महिलाओं को तैयार होना जरूरी है क्योंकि आखिर गृह स्वामी के भोजन व नास्ते का प्रबंध जो उन्हें करना पड़ता है, इसलिए अब गांवों के कच्चे घरों में भी शौचालय विलासिता नहीं बल्कि जरूरत बन गई है।

घबराइए नहीं शौचालय बिल्कुल भी महंगा नहीं होता है बस आपको उसकी तकनीक का थोड़ा सा ज्ञान भर होना चाहिए। हम देखते हैं कि गांवों में सस्ते शौचालय बनाने की तकनीक सुलभ इंटरनेश्नल ने विकसित की है। इसके लिए आपके पास थोड़ी ज्यादा जमीन होनी चाहिए जिसमें सोख्ता शौचालय(सोक पिट) का निर्माण किया जा सकता है इसमें अंदाज से डेढ़ मीटर व्यास तथा उतनी ही गहराई का थोड़ी-थोड़ी दूरी पर दो गड्ढ़े बनाइए जाते हैं उसमें ईंटोंं से अंतर छोड़कर जोड़ाई करके पक्का निर्माण किया जाता है ताकि छोड़े गए स्थान से पानी आसानी से जमीन में चला जाए। इस गड्ढ़ा निर्माण में उसके ऊपर के स्थान पर सीमेंट से ढलाई कर ढक्कन बना दिया जाता है। इस दोनों सोक पिट को पाइप के सहारे एक छोटे से ब्लाक से जोड़ा जाता है इस ब्लाक से एक पाइप जुडा होता है जो शौचालय की सीट के सिस्टम से जुड़ा होता है जो जमीन से थोड़ी ऊंचाई पर बनाया जाता है। इस सिस्टम मेंं पहले एक गड्ढ़े में शौच चालू किया जाता है जब वह गड्ढा भर जाता है तो फिर दूसरे गड्ढ़े की तरफ की का पाइप खोल दिया जाता है और पहले वाले गड्ढे का उपयोग बंद रहता है। एक दो महीने बाद पहला गड्ढा सूख जाता है इस गड्ढ़े से बाद मेंं खोल कर सोनखाद निकाल ली जाती है जो खेतों के लिए उपयोगी है। यही क्रम बारी-बारी से चलता रहता है। इस निर्माण मेंं गड़्ढ़े में बनी गैस ईंट के किनारे के छोरोंं से अपने-आप निकलती रहती है। यह सबसे सस्ता सोकपिट शौचालय सिस्टम है।

आइए अब देखें सेप्टिक टैंक की तकनीक जिसे अज्ञानता वश लोग महंगा बना देते हैं। वास्तव में सेप्टिक टैंक ऐसी साधारण टंकी है जिसमें मानव मल के प्रबंधन की युक्ति से बनाई गई होती है। हम देखें तो मल की प्रकृति कच्चे में पानी में ऊपर बलबलाने की होती है । यही मल जब सड़ जाता है तो मलबे के रूप में नीचे बैठ जाता है, इसलिए टंकी में कच्चे मल को अलग और मलबा को अलग करने के खंड बनाए जाते हैं। टंकी के ऊपरी सतह से गैस पाइप दिया जाता है ताकि गंदी बास ऊपर वायुमंडल में उड़ जाए । वहीं सेप्टिक टैंक से पानी निकालने के लिए बीच के भाग से साइफन सिस्सटम से पाइप लगाया जाता है ताकि केवल भूरा पानी ही निकले और मल न निकल पाए। इस पानी को आप सीधे नाली,खेतों में या फिर सोक पिट में डाल सकते हैं।

सेप्टिक टैंक के आकार पर उसका खर्च निर्भर करता है समझ के अभाव में लोग टैंक को बड़ा और मजबूत बनाने के लिए भारी खर्च कर देते हैं जबकि सेप्टिक टैंक का आकार उसके उपयोग करने वालों की संख्या पर निर्भर करता है साधारणतया 700 गैलन का टैंक दो बाथरूम तक के लिए पर्याप्त होता है। आपके आत्म विश्वास के लिए यहां पर विभिन्न सेप्टिक टैंक क्षमता के बनावट की तालिका दी जा रही है ताकि आप निश्चिंत हो सकें कि कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हो रही है। रही बात उसको बनाने की तो यह आप पर निर्भर करता है कि आप इसे छड़ सीमेंट से ढाल कर हल्की कांक्रीट का सिस्टम बनाते हैं या फिर एक ईंट की दीवार का बनाते हैं यह नहीं भूलना चाहिए कि आपको एक वाटर प्रूफ टंकी बनानी है जिसे जमीन में गड़े रहना है कोई बंकर या तहखाना नहीं बनाना है जिसमें न ही कोई विस्फोटक पदार्थ रखना हो। सेप्टिक टैंक मानव मल के प्रबंधन का एक साधारण संयत्र है जिसके भर जाने पर समय-समय पर साफ करवाना पड़ता है। विदेशों में तो अब प्लास्टिक के रेडीमेट सेप्टिक टैंक मिलने लगे हैं जिन्हें जमीन में गाड़ दीजिए और उपयोग करिए।

चलिए सेप्टिक टैंक से अलग बाथरूम की बात करते हैं तो बाजार में शौचालय में लगने वाली शीट की कीमत में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। राजधानी के गुप्ता ट्रेडर्स के सौरभ गुप्ता ने चार गुणा साढ़े चार फिट के स्थान में बाथरूम की डिजाइन तैयार की है। उनके अनुसार इंडियन शीट 3 सौ रुपए से शुरु हो कर 50 हजार तक मिलती है जबकि इंग्लिश शीट 8 सौ रुपए से शुरु होकर 2 लाख रुपए तक बिकती है। अब तो बाजार में टच स्क्रीन टायलेट का विज्ञापन भी देखने को मिल रहा है। इसे ही कहते हैं जितना गुण उतना मीठा आपकी मर्जी आप कितना खर्च करना पसंद करेंगे।

आजकल टीवी में सरकार के द्वारा भी शौचालय के उपयोग की महत्ता से जुड़े विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं। लेकिन अपनी आदत को क्या कीजिएगा जहां कहीं सुनसान नदी देखता हूं शौच जाने के लिए मचल जाता हूं। आखिर बचपन के संस्कार कहीं छूटते हैं। मन और है और जरूरत और है क्या आप तथा-कथित सभ्य बनेंगे। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।


-प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट
रायपुर
प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट जी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, वर्तमान में रायपुर के प्रतिष्ठित दैनिक अखबार 'जनता से रिश्‍ता' से जुड़े हैं।
इनसे आप फेसबुक पर यहॉं संपर्क कर सकते हैं। 

बाबा नागार्जुन याद आये कई दिनों के बाद

1952 में अकाल और उसके बाद नागार्जुन नें 'कई दिनों के बाद' लिखा। हमने भी कई कई दिनों के अंतराल में इसे पढ़ा, नाट्यशालाओं में रेंकियाते कलाकारों से बार-बार सुना। गरीबी-भुखमरी और पता नहीं क्या-क्या ..मरी से परिपूर्ण इस देश में इस सहज-सरल कविता का मर्म हम समझने का यत्न करते रहे। वातानुकूलित कमरों में बैठकर सर्वहारा की बात करने वाले इसे कालजयी कविता बताते रहे और हम इसे पढ़ते रहे। इसे पढ़ते-सुनते उपरी तौर पर हृदय में सिहरन सी दौड़ती और अभिव्यक्ति की दबंगई को वाह, वाह कहते 'पोटा, पोट-पोट' करने लगता। दरअसल, सही मायनों में हमने इसे अंदर तक महसूस किया ही नहीं था, जरूरत भी नहीं थी?

भौतिकवादी युग में 1952 की कविता की प्रासंगिगता 2015 में कुछ रह कहॉं जाती है। चूल्हे गायब हो गए, गोदी नें अमीरों की गैस सबसिडी छोड़वाकर झुग्गी-झोपड़ी में लगवा दिया। गैस नें सांझ ढले खपरैल की घरों के उपर उठते धुंए की मनोहारी छटा को लील लिया। महिलाओं की चूडि़यों की खनक के साथ हर्षित होने वाली चक्कियॉं घरों से 'नंदा' गए, उनकी उदासी देखने के लिए हमारी आंखें तरस गयी। सीजते संयुक्त परिवार की परिकल्पना 'तईहा' की बातें हुई, अचानक आने वाले मेहमानों के लिए उतावली और हमेशा 'एक ठोम्हा अकतिहा चुरने' वाली देचकी किलो के भाव बेंच दी गई और उनका स्थान सीमित मात्रा में भोजन बनाने के लिए उपलब्ध लीटर वाले कूकरों नें ले लिया। ऐसे में घर के सामने जूठन पर पलने वाली कानी कुतिया भी भाग कर अब मुनिसपल के वेस्ट मैनेजमेंट में अपना कमीशन खोजने लगी। रंगीन केमिकल्स से पुते पुताये भीत से कीट-पतंगों को विरक्ति हुई और जो आशक्त किचन के सेंधों में छिपे बैठे रहे उनके लिए हिट सहज रूप से परचून की दुकान पर उपलब्ध हो गया। इन सबको देखते हुए सुकड़दुम छिपकिलियों का गस्त, पहरेदारों की नहीं चोरों सी लगने लगी, सो छिपकिल्लियां भी गायब। विभिन्न प्रकार के उडल-नूडल खाद्धान्न से भरे घरों में कपड़े, किताबें, गत्ते और लकडि़यों को कुतरते चूहों की शिकश्ती का हालात भी अब दिखने से रहा। चाउंर वाले बाबा की किरपा से मुफ्त दानों की एक आध बोरी और चेपटी की दो चार बोतलों से घर सदा आबाद रहा मने अंदर ही रहा, तो दानों के अंदर आने की बात रही ही नहीं। रही बात काले कौये की तो उस पर ब्‍लॉ.. ब्‍लॉं.. ब्‍लॉं...

हॉं अब समय बदल गया है, शब्दों की परिभाषाओं में बदलाव आ गया है। ग्रोथ के आंकड़ो के छद्मावरण के बीच किश्तों में खरीदी खुशियों से संतुष्ट, एंड्राइड मोबाईल धारी, मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग आज भी इस कविता में अपने आप को तलासता है। उपरी कमाई व छठे वेतनमान के अंगूर को ताकते, न्यूनतम वेतनमान को तरसते, जिन्दगी के ड्यू इंस्टांलमेन्ट की रिकवरी वाले एसएमएस और फोन काल से तंग, किसी परिवार में अचानक जब मेहनत का असली फल गांधी जी के छापों वाले कागज के टुकड़ों के साथ मिलता है तब बाबा नागार्जुन याद आते हैं और घर भर की आंखें चमक उठती है, कई दिनों के बाद!

-तमंचा रायपुरी

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