अब तुलसी क़ा होइहै, नर क़े मनसबदार

-छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 12 से 14 दिसम्बर को पुरखौती मुक्तांगन में प्रस्तावित 'रायपुर साहित्य महोत्सव' पर शेष-

राज्य बन जाने के बाद छत्तीसगढ़ का क्रेज हिन्दी पट्टी में भी बढ़ा है. इस बात को साबित करने के लिए एक वाकया काफी है. हुआ यूं कि एक बार, देश के सर्वोच्च आलोचक डॉ.नामवर सिंह राजकीय मंच से कहते हैं कि मैं ही आपका माधव राव सप्रे हूं. रियाया तालियॉं बजाती है, क्रांतिकारी हाथ मलते हैं, मनसबदारों के जी में जी आता है, कुल मिला कर बात यह कि, कार्यक्रम सफल होता है. आपने कभी सोंचा कि यह परकाया प्रवेश का चमत्कार कब होता है, तब, जब एक मुहफट आलोचक राजकीय अतिथि बनकर परम तृप्त होता है.

संतों! समय ऐसे कई उच्च साहित्यकारों के परकाया प्रवेश का समय आ रहा है. हॉं भाई, रायपुर साहित्य महोत्सव होने जा रहा है. इस पर राज्य में सुगबुगाहट है, खुसुरपुसूर हो रही है और साहित्य के कुछ संत छाती पीट रहे हैं. 

हमने भी रचनाकारों के प्रति राजकीय आस्था अनास्था के क्रम में कल ही कुम्भनदास को कोट किया था. लिख डालने के बाद याद आया कि, कुम्भनदास के समय में तुलसीदास नाम से भी एक कवि हुए थे. इधर अकबर के बुलावे पर कुम्भनदास अपनी पनही टोरते पैदल निकल पड़ते हैं सीकरी. उधर तुलसीदास बुलाने पर, बार बार बुलाने पर, बग्धी भेजे जाने पर, भी नहीं जाते. उनके दरबारी मित्र अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना रहीम का स्पेशल फोन भी आता है कि, मियॉं सीकरी में साहित्य महोत्सव करना है आकर चर्चा कर लेवें.

आगे की छोटी बातों को आप सब जानते हैं, बड़ी बात यह रही कि अकबर के बुलाने पर भी तुलसी नें दरबार में मत्था नहीं टेका वे रचते रहे, रचते रहे. आगे सत्य को समय नें सिद्ध किया और जहॉंगीर स्वयं तुलसी के दुआरे पहुंचे. साहित्य महोत्सव की रूपरेखा तय करने के लिए डायरी साथ लाए किन्तु तुलसीदास जी नें निर्विकार भाव से कहा कि मैं राज 'काज' में दखल नहीं दूंगा. वाह! धन्य हैं बाबा तुलसी, बाबा तुलसी की जय!

ऐसे मनसबदार कवि रहीम और जनझंडाबरदार कवि तुलसी, हर राज में हुए है. मनसबदार राजा को रचनाकारों और कलाकारों का लिस्ट सौंपते रहे हैं. कला और साहित्य के आयोजनों के प्रेमी राजा अकबर ऐसे मनसबदार कवि रहीम की अगुवाई में या पिछुवाई में कलाकारों और रचनाकारों को समय समय पर दरबार में 'नचनिया पेश किया जाए!' के तर्ज पर बुलाते भी रहे. वहीं राजा जहॉंगीर भी हुए जो तुलसी जैसे जनकवि के चौंखट में सलाम ठोंकरने स्वयं जाते भी रहे हैं. यही युग सत्य है, समय सापेक्ष है. 

आप रामचरित मानस लिखिए, जहॉंगीरों को आपके दुवारे आना पड़ेगा. बोलो सियाबर रामचंद्र की जय!!

किन्तु किस्सा अभी बाकी है मेरे दोस्त— ताजा रसोई से उठती खुशबू के साथ चर्चा यह भी आम रही कि, इतने बड़े आयोजन के पूर्व राज्य के साहित्यकारों और साहित्यिक समितियों से सलाह तो कम से कम ले लेना था. उनसे पूछा जाना चाहिए था कि आप किन्हें सुनना चाहते हो, देखना चाहते हो. बात में दम तो है, पूछने में हर्ज क्या था, एक सार्वजनिक प्रकाशन भर करना था. मानना नहीं मानना तो अकबरों की मर्जी है. आप अकबरबाजी छोड़कर जहॉंगीर की भूमिका निभा कर तो देखिए, हम मानते हैं कि हम तुलसी जैसे नहीं किन्तु राज्य में मानस रचयिता तुलसियों की कमी भी नहीं है.

सनद रहे कि हम जहाँगिरों को यह आस्वस्त भी करते हैं कि, हम सरकार की विफलताओं या नसबंदी कांड मे मृत महिलाओं का लेखा जोखा नहीँ पूछेंगे. सरकारी पोंगा से विरोध का गान नहीं गायेंगे किन्तु इतने बड़े आयोजन के सम्बन्ध में हमें पूछ तो लेते. हमें यह केवल्य ज्ञान हैं कि, समय हर जख्म को भुला देता है, हर गाला भर देता है. वैसे भी हमारा मगज तो सरकारी विज्ञापनों और अनुदानो के बिला पर गिरवी रखा है.

तमंचा रायपुरी
(बचा खुचा अपच का वमन)

संतन को कहाँ सीकरी सों काम ?

-छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 12 से 14 दिसम्बर को पुरखौती मुक्तांगन में प्रस्तावित 'रायपुर साहित्य महोत्सव' पर शेष-
अब न कुम्भनदास रहे न अकबर बादशाह न फतेहपुर सीकरी। अब के कुम्भनदासों को हर पल अगोरा रहता है कि कब सीकरी से बुलावा आए और वे दौड़ पड़े। बिना अपने पनही के टूटने या घिसने की परवाह किए। इसमें शर्त बस इत्ती सी है कि, सीकरी तक आने जाने के लिए पुष्पक और असमान्य सम्मानजनक मानदेय। फ़ोकट में तो कोई भिस्ती भी न जाय। अब रही बात अब के रियाया और दरबारियों की, तो वे भी तभी इन कुम्भंदासों के आह में ताली बजाने आयेंगे जब कोई चतुर सेनापति बौद्धिक रणनीति अपनाएगा।

मौजूदा हालत में कुम्भंदासों की टीम और रियाया दोनों, सीकरी के आयोजन के प्रति उत्सुक हैं। सीकरी के चाहरदीवारी में रहने वाले बौद्धिक जो रियाया और दरबारी की परिभाषा से अपने आप को, परे समझते हैं उनके लिये ये समय मंथन का है। सरकारी है तो क्या ये असरकारी होगा? असरकारी होता तो क्या प्रभावकारी होगा? इन प्रश्नों की गठरी बांधने के बजाय, इस सरकारी साहित्यिक आयोजन को हम फैंटेसी मान लें।

भक्तजनों! साहित्य की दुनिया में आयोजनों का बड़ा क्रेज रहा है। आपको तो मालूम ही है कि, आयोजनो के चकाचौंध में लेखन गौड़ हो जाता है लेखक महत्वपूर्ण हो जाता है। आयोजनों की आंच दूर तक जाती है जिसमें कई कई परत के पूर्वाग्रह पकते हैं। इन्ही बातों को ध्यान में रखते हुए साहित्यकार बोधित्सव नें फेसबुक मे एक बार लिखा कि, लोकार्पण शब्द कभी कभी तर्पण की तरह सुनाई देता है.. और विमोचन लुंचन की तरह .. पुरस्कार तिरस्कार की तरह और .. बडा कवि सड़ा कवि ध्वनित करता है। ऐसे समय में जब एक जिम्मेदार साहित्यकार ये कहता है तब साहित्य का छद्म अनावृत हो जाता है, इनके कथनी और करनी में फ्रिक्शन नजर आने लगता है। राज्य का ताजा इतिहास गवाह है कि, सेनापति के खून सने हांथो से नेवता नई झोकेंगे कहने वालों की भीड़ सेनापति को सलाम ठोकते नजर आते हैं और हमारे जैसे दू दत्ता बछवा को चूतिया बनाते है। इसीलिए कलम की जनपक्षधरता में संदेह होने लगता है। छद्म जनपक्षधर कलमकारों और संदेह का लाभ उठाने वाले साहित्यकारों की पहचान तय करना आवश्यक हो जाता है। ऐसे कलमकारों, साहित्यकारों और जन पैरोकारों से साक्षात्कार के लिए हमें आयोजन को बढ़ावा देना चाहिए।

रही बात आयोजन में राज्य के दखल की तो, प्लेटो, अरस्तु और सुकरात के समय मे भी राजाओं का अस्तित्व दखलकारी रहा। किंग एडिबस रैक्स का फितूर कलम पर हावी रहा। साहित्य का वैचारिक पक्ष जहर के प्यालों में उबलता रहा। ऐसे ही समय मे सुकरात ने अपनी बात बड़ी दृढ़ता से रखी, उन्होंने कहा अपनी मूर्खता का जिसे ज्ञान है वही बुद्धिमान है। इसीलिए मै अपनी सर्वोच्च मुर्खता का भान और मान रखते हुए इस साहित्य उत्सव का स्वागत करता हूँ।

तमंचा रायपुरी
(अपच बौद्धिकता का रायता बिखराते हुए)

सरगुजिहा बोली और संस्कृति के पर्याय : डॉ.सुधीर पाठक

छत्तीसगढ़ के दो उपेक्षित क्षेत्रो में एक बस्तर की संस्कृति पर, अंग्रेजी अध्येताओं व हीरालाल शुक्ल से लेकर राजीव रंजन प्रसाद जैसे लेखकोँ नें प्रकाश डाला है किंतु छत्तीसगढ़ का सरगुजा क्षेत्र हमेशा से उपेक्षित रहा है. सरगुजा क्षेत्र की संस्कृति के संबंध मे अंग्रेज अध्येताओं नें भी विश्वसनीय जानकारी सामने नही लाई है. अंग्रेज अध्येताओं के अध्यन जमीनी सत्यता से कोसों दूर हैं. 


सरगुजा क्षेत्र की लोक कला एवं लोक गीतों पर विभिन्न शोध  कार्य हुए हैं. भाषाविज्ञान की दृष्टि से सरगुजिहा बोली पर शोधात्मक कार्य लगभग 40 वर्ष पहले डॉ.कांति कुमार जैन नें किया था. उसके बाद डॉ. साधना जैन नें उस शोध की कड़ी को विस्तार दिया. इसके उपरांत लम्बे समय तक सरगुजिहा बोली पर अकादमिक शोध कार्य नहीं हुए. लम्बे अंतराल के बाद डॉ. सुधीर पाठक नें इस पर कार्य किया. उनके शोध का विषय था, सरगुजिया बोली व छत्तीसगढी भाषा के व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन. इस शोध नें डॉ.कांति कुमार जैन एवं डॉ.साधना जैन के भाषावैज्ञानिक शोध में नये अध्याय जोड़े जो छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास में एक मील का पत्थर बना. हालांकि यह शोध ग्रंथ विश्वविद्यालय तक ही सीमित है, इसका लोक प्रकाशन नहीं हुआ है. 

छत्तीसगढी भाषा की समृद्धि के लिए डॉ.सुधीर पाठक के इस शोध ग्रंथ का प्रकाशन आवश्यक है. यह शोध भाषा सुधी अध्येताओं एवं शोधार्थियों के लिए सरगुजिहा बोली एवं छत्तीसगढ़ी भाषा के अंतर्संबंधों को समझनें में महत्वपूर्ण ग्रंथ सिद्ध होगी. डॉ. सुधीर पाठक से हुई चर्चा के अनुसार उन्होंनें इस शोध ग्रंथ के प्रकाशन के लिए संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ शासन से सहायता की मांग की है. देखिए संस्कृति विभाग अपनी ही संस्कृति के एक धरोहर के प्रकाशन के लिए सहयोग करती है कि नहीं.

पिछले लगभग बीस वर्षों से छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र की संस्कृति के संबंध मेँ कोई भी तथ्यपरक जानकारी यदि आप तक पहुंची है, तो यह तय मानें कि वह किसी न किसी रुप मेँ डॉ. सुधीर पाठक के माध्यम से ही आप तक पहुंची है. डॉ.सुधीर पाठक सरगुजा की बोली, साहित्य, संस्कृति और परम्परा के जीते जागते कोष हैं. यदि हम यह कहे तो, अतिश्योक्ति नहीं होगी.

ग्रामीण बैंक मेँ अधिकारी डॉ.सुधीर पाठक सरगुजा के मूल निवासी हैं. वे बैंक में सेवा करते हुए क्षेत्र के दूरस्थ ग्रामों में पदस्थ रहे हैं. अभी भी वे जहॉं पदस्थ हैं वहाँ आवागमन और संचार के माध्यमो की अल्पता है. वे इन दूरस्थ गाँवों में सरगुजा की मूल और 'आरुग' संस्कृति का साक्षात्कार करते हैं. अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण वे लोक बोली और परंपराओं का गहरा अध्ययन निरंतर करते रहते हैं. अपनी ही इसी प्रवृत्ति को वे समय समय पर शब्दो के माध्यम से विभिन्न आलेखों के माध्यम से या पत्रिका 'गागर' मेँ प्रस्तुत करते हैं. 'गागर' सरगुजिहा बोली की पहली पत्रिका है, जिसका प्रकाशन संपादन डॉ. सुधीर पाठक द्वारा सन 2003 में शुरू की गई जो आज तक अनवरत प्रकाशित है. इस पत्रिका के साथ ही डॉ.सुधीर पाठक भारतेंदु साहित्य कला समिति के माध्यम से लोक कलाओं का संवर्धन एवम लोक साहित्य के प्रकाशन का कार्य निरंतर कर रहे हैं.

डॉ. सुधीर पाठक द्वारा संपादित पत्रिका 'गागर' के दो अंक मेरे हाथो में है, जिसमें से एक मेँ सरगुजिहा लोककथा संग्रहित है ओर दूसरी नियमित अंक है. अभी मैनें लोक कथा अंक को पढ़ना आरंभ किया है. सरगुजिया लोक कथाओं पर फिर कभी, अभी डॉ. सुधीर पाठक को सरगुजिया बोली, भाषा व संस्कृति पर उनके प्रदेय के लिए कोटिश: आभार.
यदि आप चाहें तो उनसे 08959909048 पर संपर्क कर सकते हैं 

-संजीव तिवारी
Sarguja, Sargujiha Boli, Dr.Sudhir Pathak

एक मोबाईल नम्बर से चल रहे व्हाट्स एप्प को किसी दूसरे मोबाईल फोन से कैसे चलावें



मित्रों हममे से अधिकतम लोग दो मोबाईल नम्बर का प्रयोग करते हैं. एक का प्रयोग हम बातें करने के लिए करते हैं जो बहुत दिनों से हमारे पास है एवं जिसका नम्बर हमारे परिचितों को ज्ञात है.. और दूसरे का प्रयोग मोबाइल में इंटरनेट चलाने के लिए रखते हैं, इसे हम टेरिफ रेट के अनुसार समय समय पर बदलते रहते हैं. हमसे जुड़े लोगों को हमारा जो नम्बर पता है वे उसी में व्हाट्स एप्प की खोज पहले करते हैं इसलिए व्यवहारिक रूप में उसी नम्बर पर व्हाट्स एप्प चलाना चाहिए. यदि हम इन दोनों नम्बरों को दो सिम वाले मोबाइल फोन में उपयोग करते हैं तो उन दोनों में से किसी भी एक नम्बर पर व्हाट्स एप्प चला सकते हैं. उस नम्बर पर भी जिसमें इंटरनेट सुविधा ना हो. दो सिम वाले मोबाईल सेटों में ऐसा करने से मोबाईल की बैटरी बहुत जल्दी खत्म हो जाती है. बैटरी की समस्या का निदान पावर बैंक है किन्तु उसे ढोना अच्छा नहीं लगता. इससे अच्छा दो सिम वाले मोबाईल सेट में भी सिंगल सिम उपयोग करें, यानी दो फोन सेट प्रयोग करें. 




अब यदि आपके सार्वजनिक नम्बर में इंटरनेट की सुविधा ना हो और व्हाट्स एप्प भी आप उसी नम्बर पर चलाना चाहते हैं, तो यह संभव है. जिस दूसरे android मोबाईल सेट और नम्बर में इंटरनेट है उसमें आप अपने सार्वजनिक नम्बर का व्हाट्स एप्प उपयोग कर सकते हैं.



कैसे - अपने उस android मोबाईल फोन में नये सिरे से व्हाट्स एप्प इंस्टाल करें जिसमें इंटरनेट की सुविधा है. व्हाट्स एप्प को कानफिगर करने के क्रम में वहॉं अपना सार्वजनिक फोन नम्बर डालें. वहॉं फोन नम्बर मैच नहीं करेगा, व्हाट्स एप्प आपसे अप्रूवल के लिए दो विकल्प देगा, एक एसएमए से दूसरा फोन काल के द्वारा. आप दोनों में से कोई भी विकल्प चुन लें, आपके सार्वजनिक नम्बर में व्हाट्स एप्प से एक कोड प्राप्त होगा, उसे व्हाट्स एप्प में टाईप कर आगे बढ़ें. काम हो गया. अब आपके उस दूसरे नम्बर पर व्हाट्स एप्प चलेगा.

संजीव तिवारी 

ब्‍लॉगर्स के लिए आवश्‍यक सूचना : साहित्यिक पत्रिका हंस की पुरानी वेबसाईट लिंक तत्‍काल बदल लें



आज सुबह अरूण कुमार निगम जी का फोन आया कि, आपके छत्‍तीसगढ़ ब्‍लॉगर्स चौपाल में कुछ गड़बड है. तो मैं इस बात को बहुत ही सामान्‍य लेते हुए कहा कि देख लेता हूं. किन्‍तु अरूण भईया नें कहा कि समस्‍या गंभीर किस्‍म की है, कोशिस करें कि जल्‍दी उसका हल करें.. तो मैं चकराया, कारण पूछा तो उन्‍होंनें बताया कि, मेरे ब्‍लॉग एग्रीगेटर छत्‍तीसगढ़ ब्‍लॉगर्स चौपाल ब्‍लॉग में हिंदी की सबसे प्रतिष्ठित 'हंस' पत्रिका का जो लिंक लगा है उसे क्लिक करने पर पोर्न साईट खुल रहा है.

बात सचमुच गंभीर थी, हमारे कई पाठक जिन्‍हें आनलाईन साहित्यिक पत्रिका पढ़ना होता है वे मेरे इस ब्‍लॉग से इन लिंकों के सहारे वे, उन आनलाईन पत्रिकाओं में पहुचते थे. किन्‍तु हमारे सहित हजारों लोगों नें हंस पत्रिका की यही लिंक अपने ब्‍लॉग या वेबसाईटों में लगा रखी है इस कारण विश्‍वास नहीं हो रहा था. जब उस लिंक को क्लिक किया तो सचमुच में थाई भाषा की कोई पोर्न वेबसाईट इस लिंक से खुल रही थी. लिंक बिना रिडायरेक्‍ट हुए उसी डोमेन नाम से खुल रहा था. यह स्‍पष्‍ट है कि 'हंस' के इस पुराने वेब साईट के डोमेन की अवधि समाप्‍त हो गई होगी. इसके साथ ही इसकी लोकप्रियता एवं हजारों साहित्‍य प्रेमियों के ब्‍लॉग एवं वेब में लगे लिंकों, सर्च इंजन में तगड़े धमक के कारण किसी सिरफिरे नें इसे खरीद लिया एवं इसे मलेशियाई संतरागाच्‍छी बना दिया.

हिंदी की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका इसी 'हंस' में जब रामशरण जोशी का, छत्‍तीसगढ़ बालाओं का जुगुप्‍ता उपजाने वाला अमर्यादित लंबा वृतांत, दो किश्‍तों में छपा था, तब से हमें तो, यह लगने ही लगा था कि इस पत्रिका के डोमेन पर भरोसा करना, ज्‍यादा भरोसे के लायक नहीं है. उसके बाद के कुमार-कुमारियों के किस्‍सों की जानकारी आप सब को है. इन सबके वावजूद पत्रिका का स्‍तर राजेन्‍द्र यादव जी के रहते तक कायम भी रहा है. पिछले दिनों फेसबुक में एक वरष्ठि साहित्‍यकार नें ताजा अंक के संबंध में टिप्‍पणियां की थी जिसके यह ज्ञात होता था कि हंस का स्‍तर राजेन्‍द्र जी के जाने के बाद कुछ कम हुआ है. 

स्‍तर के आकलन की न तो हमारी योग्‍यता है ना ही हमारी कोई बौद्धिक जिम्‍मेदारी किन्‍तु वेब साईट में हंस के नाम पर फैले पोर्न वेब साईट को हटाने की अपील करने की जिम्‍मेदारी अवश्‍य है. तो मित्रों उन सभी ब्‍लॉगों एवं वेब साईटों में जहॉं 'हंस' पत्रिका के लिंक लगे हैं उन्‍हें बदल ले एवं पत्रिका का नया वेब साईट का लिंक लगा लें. हंस का वर्तमान वेबसाईट यह http://hansmagazine.in है. आगे इस डोमेन में भी साहित्‍य के बजाए कुछ और दिखाने लगे तो तत्‍काल सूचना दें.    

संजीव तिवारी

Android मोबाईल में हिन्दी टायपिंग

हमने कुछ वर्ष पहले विन्डोज एक्पी में हिन्दी टूलकिट के प्रयोग के संबंध में एक पोस्ट इस ब्लॉग में डाली है जिसके प्रतिदिन के क्लिक से यह ज्ञात होता है कि अब भी लोग कम्प्यूटर व मोबाईल जैसे साधनों में हिन्दी का प्रयोग नहीं कर पाते। इसे देखते हुए हमने Android मोबाईल में हिन्दी टायपिंग कैसे की जा सकती है इस पर जानकारी देना चाहते हैं। मित्रों इस विषय के संबंध में इंटरनेट में ढ़ेरों पोस्ट और ट्यूटोरियल्स हैं। इसके बावजूद अभी तक हमारे बहुत से मित्र इसका प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं। लीजिए प्रस्तुत है क्रमिक चित्रमय जानकारी —

अपने मोबाईल से गूगल प्ले स्टोर में जायें.
बायनाकुलर सर्च टच कर Google Hindi Input लिखें.
सर्च से प्राप्त Google हिंदी इनपुट में आयें.
इंस्टाल करें. प्रक्रिया पूर्ण होने पर गूगल एप्स से बाहर आ जायें.

मोबाइल के सेटिंग में जायें - भाषा और इनपुट खोलें, “कीबोर्ड और इनपुट विधियां” अनुभाग के अंतर्गत, Google हिन्दी इनपुट को चेक कर लें.



आपका हिन्दी की बोर्ड इंस्टाल हो गया. इसके सहारे आप अंग्रेजी की को पुश कर देवनागरी हिन्दी शब्द टाईप कर सकते हैं या फिर हिन्दी के अक्षरों वाले की बोर्ड के सहारे देवनागरी हिन्दी टाईप कर सकते हैं. मैं अपनी सहूलियत के अनुसार अंग्रेजी की पुश कर हिन्दी प्राप्त करता हूं यथा - hamara - हमारा. 


अब जहां आपको देवनागरी हिन्दी में टाईप करना है वहां जायें, लिखने के लिए उस स्थान को टच करें, कीबोर्ड प्रकट हो जायेगा. इसमें लिप्यंतरण मोड चालू/बंद करने के लिए अंग्रेज़ी कीबोर्ड पर बटन “a-अ” आ गया है, इसे टॉगल करें. लिप्यंतरण मोड में आप अंग्रेज़ी वर्णों में हिन्दी शब्द लिख सकते हैं और एप्लिकेशन उन्हें हिन्दी में रूपांतरित कर देगा. उदाहरण के लिए “hindi” लिखें और फिर आपको सूची से शब्द 'हिंदी' प्राप्त होगा.

शब्दों को टाइप करते समय यह ध्यान रखें कि अंग्रेजी की से मिले शब्द कभी कभी सहीं नहीं होते किन्तु गूगल संभावित शब्दों को की के उपर बताता है. यदि आप इसे टच करेंगें तो सही शब्द चुन लिया जाता है. जैसे उपर के चित्र में जोहार के स्थान पर जोहर लिखा रहा है. इस स्थिति में जोहार को टच कर दें. यदि की के उपर में सही शब्द ना दिखे तो उसी लाइन में दिए गए बिलो एरो को टच करें. यहां अतिरिक्त मिलते जुलते शब्द होंगें, आप इनमें से सही शब्द चुन सकते हैं. फिर वापस एरो को टच कर वापस की बोर्ड में आ सकते हैं. आपको शुरूआती समय में हिन्दी शब्दों के उच्चारण एवं उसके अंग्रेजी शब्दों पर ध्यान देना होगा. धीरे धीरे आप अंग्रेजी की से सटीक हिन्दी शब्द पा जायेंगें. 


यदि आपको इसके बाद अंग्रेज़ी में लिखना हो तो अंग्रेज़ी कीबोर्ड पर लिप्यंतरण मोड बंद करके (“a-अ” बटन दोबारा दबाकर), आप अंग्रेज़ी में लिख सकते हैं.

गूगल बाबा नें एक वीडियो खास आपके लिए बनाया है, इसे भी देख लें-



रवि शंकर श्रीावास्तव भाई नें अपने ब्लॉग पर अब अपने कंप्यूटर पर हिंदी में बोलकर सही-सही लिखें हिन्दी में एवं अंग्रजी में डाल कर इसे और सुविधाजनक बना दिया है. 



आशा है, इससे आप अपने मोबाइल को हिन्दी लिखने में सक्षम बना लिए होंगें. 

संजीव तिवारी

आंचलिक उपन्यास और डॉ.नामवर को न जानने का संतोष


फणिश्वर नाथ रेणु द्वारा 1954 में लिखे गए उपन्यास 'मैला आँचल' को आंचलिक उपन्यास माना गया है। अन्य आंचलिक उपन्यासों में नागार्जुन रचित मिथिला अंचल पर 'रतिनाथ की चाची', बरगद के पेड़ पर 'बाबा बटेश्वर नाथ', मछुवारो के कस्बे पर 'वरुण के बेटे' और तमका कोइली गाँव पर आधारित 'दुखमोचन' को माना जाता हैं।

रेणु के अन्य आंचलिक उपन्यासों में 'परती परिकथा' संयुक्त परिवार की कहानी, 'जुलुस' विभाजन के शरणार्थी लोगों की कथा और 'कितने चौराहे' अन्धविश्वास और नारी की स्थिति पर आधारित उपन्यास हैं। अन्य रचनाकारों में रांगेय राघव का 'काका' मथुरा के पुजारियों के सम्बन्ध में, उदय शंकर भट्ट द्वारा लिखित मुंबई महानगर के कस्बे वरसोवा का चित्रण करता उपन्यास 'सागर लहरें और मनुष्य' आदि हैं।

आंचलिक उपन्यास इन्हें क्यों कहा गया और आंचलिक उपन्यास की कसौटी क्या है यह जानने के लिए खुदाई शुरू करने पर पता चलाता है कि, रेणु ने स्वयं 'मैला आँचल' की भूमिका में लिखा “यह है मैला आंचल, एक आंचलिक उपन्यास। कथांचल है पूर्णिया। पूर्णिया बिहार राज्य का एक जिला। ... मैंने इसके एक हिस्से के एक ही गांव को पिछ्ड़े गांवों का प्रतीक मानकर इस किताब का कथाक्षेत्र बनाया है।” ऐसा भूमिका में लिख कर रेणु ने किसी उपन्यास के आंचलिक होने के लिए आवश्यक सूत्र गढ़ दिये और विवादों को विराम तक पंहुचा दिया था।

साहित्य में विवाद का विराम लगना संभव न था न ही लगना चाहिए क्योंकि यहाँ विवाद को विमर्श की तस्तरी में पेश किया जाता है, जिसमें से श्रेष्ठ पकवान आलोचना को माना जाता है। बीसवीं सदी के अंत और इक्कीसवी सदी के शुरुवात के लगभग आधे से भी अधिक सदी तक आलोचना के पर्याय के रूप में डॉ.नामवर सिंह स्थापित हैं अतः हम सहूलियत की दृष्टी से आलोचकों को नामवर कहते हैं।

बाद में इन्हीं नामवरों में से कुछ नें आंचलिक उपन्यासों के मानदंड रचे जिसके अनुसार किसी उपेक्षित अंचल विशेष का समग्र रूप प्रस्तुत करने वाले उपन्यास को आंचलिक माना। कुछ नें कहा कि आंचलिक उपन्यास का कथानक स्वरुप न तो पूरा गाँव होता और न पूरा शहर होता बल्कि वो क़स्बा जैसा कुछ होता है। (जो रवीस कुमार के कस्बे से जाहिर तौर पर अलग होता है) कुछ कहते हैं कि अंचल का सजीव चित्रण होना चाहिय यार, बस।

तो बिहार के पूर्णिया जिले के मेरीगंज गाँव को पिछड़े गाँव का प्रतीक मान कर रेणु ने 'मैला आँचल' लिखा जिसमें कोई सजीव नायक नहीं है। अन्य उपन्यासों में एक नायक अनिवार्य रूप से होता है जिसके इर्द गिर्द कथानक घूमता है। किन्तु आंचलिक उपन्यासों में चरित्र भले होते हैं पर वे नायक नहीं होते। ऐसे उपन्यास के नायक वह अंचल ही होता है, मने मेरीगंज गाँव ही नायक है। एक और बात जे कि, इसमें कथानक का विस्तार होता है पर इसकी कथा एक गाँव को छोड़कर बाहर नहीं जाती। अंचल को जिसने भी जिया है वो जानता है कि अंचल का विस्तार मने जीवन का समग्र मूल्यांकन, आंतरिक और बाह्य। वा भई, गजब!

हम सोंचते थे कि, आंचलिक का मतलब जानने की हमें का जरुरत है, हमें तो सब पता हइये है। ठीक वैसेइ जैसे हमने अपने एक वयोवृद्ध चचा जो साहित्यिक उपन्यासों के संग्रह और अध्ययन के शौक़ीन हैं उनसे जब पूछा कि 'चचा डॉ.नामवर सिंह को जानते हो?' तो उन्होंने असहमति जताई और जब हमने कहा कि डॉ.काशी नाथ सिंह के भाई हैं तो चचा ने बेफिक्री से कहा अरे हाँ वो! .. वो तो कवितायेँ लिखता था।'

© तमंचा रायपुरी

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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...