ओंकार ..... नत्‍था ..... पीपली लाईव .... और एड्स से मौत

पिछले पंद्रह दिनों से मीडिया में चिल्‍ल पों चालू आहे, ओंकार .... नत्‍था ....... पीपली लाईव ....... आमीर खान ....... अनुष्‍का रिजवी। यहां छत्‍तीसगढ़ भी इस मीडिया संक्रामित वायरल के प्रकोप में है। रोज समाचार पत्रों में ओंकार से जुडे समाचार कहीं ना कहीं किसी ना किसी रूप में प्रकाशित हो रहे हैं। हमें भी मीडिया से जुडे साथियों के फोन आ रहे हैं कि नत्‍था पर कुछ लिखो, फीचर पेज के लिए नत्‍था पर सामाग्री चाहिए। ....... पर अपुन तो ठहरे मांग और शव्‍द संख्‍या के परिधि से परे कलम घसीटी करने वाले ....... सो लिखने से मना कर दिया है। ... पर लिखना जरूर है सो कैमरा बैग में डालकर पिछले सात दिनों से आफिस जा रहे हैं, शायद समय मिल जाए तो ओंकार के घर जाकर उसके परिवार का फोटो ले लें।

 ओंकार का घर मेरे सुपेला कार्यालय से बमुश्‍कल एक किलोमीटर दूर होगा, पर मुझे पांच मिनट के लिए भी समय नहीं मिल पा रहा है। ओंकार स्‍वयं एवं उसके दोस्‍त यार भी व्‍यस्‍त हैं मेल-मुलाकात चालू है इस कारण उसका मोबाईल नम्‍बर भी नहीं मिल पा रहा है। बात दरअसल यह है कि पीपली लाईव के पहले खस्‍ताहाल ओंकार का मोबाईल नम्‍बर रखने की हमने कभी आवश्‍यकता ही नहीं समझी, बल्कि उसे हमारा नम्‍बर अपने गंदे से फटे डायरी में सम्‍हालनी पड़ती थी और हम उसके नचइया गवईया किसी दोस्‍त को हांका देकर बुलवा लेते थे। .... खैर वक्‍त वक्‍त की बात है। हबीब साहब के दिनों में नया थियेटर की प्रस्‍तुतियों में भी ओंकार का ऐसा कोई धांसू रोल नहीं होता था कि प्रदर्शन देखने के बाद ग्रीन रूम में जाकर ओंकार को उठाकर गले से लगा लें ...  हाथ तक मिलाने का खयाल नहीं आता था क्‍योंकि हबीब साहब के सभी हीरे नायाब होते थे। वह 'महराज पाय लगी ....' कहते हुए स्‍वयं हमसे मिलता था।
कल रविवार डाट काम में रामकुमार तिवारी का पीपली पर एक आलेख पढ़ा तो लगा यहां ओंकार के लिए वही लिखा गया है जो मैं महसूस करता हूं। नत्‍था के इस ग्‍लैमर को ओंकार को बरकरार रखना होगा, उसे और मेहनत करनी होगी। नत्‍था आमीर के प्रोडक्‍ट को बाजार में हिट कराने का एक साधान मात्र था, अब ओंकार को अपने जन्‍मजात नत्‍थेपन को सिद्ध करना होगा। यदि ओंकार पर नत्‍था हावी हुआ तो उसके जीवन के अन्‍य  पीपली लाईवों में वह लाईव नहीं रह पायेगा क्‍योंकि उसकी मांग उसके सामान्‍य होने में ही है। जैसा कि कुछ पत्रकार मित्रों नें कहा कि नत्‍था के तेवर कुछ बदले हुए से हैं, खुदा करे ऐसा ना हो। पिछले दिनों ओंकार के भिलाई वापस आने के पहले मैनें अपने सहयोगी जो ओंकार के पुत्र का मित्र है को ओंकार के घर भेजा कि मैं उनसे मिलना चाहता हूं वे मुझसे मिलने को समय देंगें क्‍या, पर ओंकार की पत्‍नी नें झुझलाते हुए कहा कि 'हलाकान होगेन दाई ..................'
अब ओंकार से अपने संबंधों को कुरेदने लगा हूं, कड़ी पे कड़ी जोडने लगा हूं यह बताने जताने के लिए कि नत्‍था से मेरा परिचय किस कदर लगोंटिया रहा है। पर पीपली लाईव को देखते हुए दूर मानस में राजू दुबे का नाम भी उभर रहा है, अभी पिछले दिनों ही तो मैं उसके भयंकर रूप से बीमार होने की खबर पर उसे देखने गया था और खबर यह है कि अभी कुछ दिन पहले ही उसकी भी मौत हो गई। कोई मीडिया नहीं, कोई सरकारी कर्मचारी नहीं, कोई नेता नहीं। एक खामोश मौत जैसे पीपली लाईव में उस मिट्टी खोदने वाले की हुई थी। ऐसी मौत तो हजारों हो रही है पर ये खिटिर-पिटिर क्‍यूं, मन कहता है, ... तो नत्‍था के मौत से इतना बवाल क्‍यूं ... मन फिर कहता है, वो आमीर के फिल्‍म में नत्‍था की मौत है ..... हॉं ....  बेमेतरा से कवर्धा जाने वाली रोड के किनारे स्थित एक गांव उमरिया में राजू दुबे की एड्स से मौत हुई है जो मेरा रिश्‍तेदार था। हॉं ठीक है ... एड्स से मरा है तो चुप रहो ना, किसी से क्‍यू कहना कि मेरा रिश्‍तेदार एड्स  से मर गया, नाहक अपनी इज्‍जत की वाट लगा रहे हो। नत्‍था से रिश्‍तेदारी की बात करो राजू दुबे को भल जाओ।
राजू दुबे को भूलना संभव नहीं क्‍योंकि राजू दुबे सचमुच मेरा रिश्‍तेदार था, उसके मां बाप बेहद गरीब हैं वह एक ट्रक ड्राईवर था, लाईन में उसे ये बीमारी लगी और उसने अपने उस बीमारी को अपनी पत्‍नी ... और संभत: अगली पीढ़ी में रोप गया और यही भूल पाना मुश्किल हो रहा है जिन्‍दा लाशों को देखकर। उसकी मौत तो हो गई अब पीढि़यों को उसके पाप को बोझा ढोना है, एक कम उम्र की पतिव्रता  पत्‍नी को छिनाल पति के विश्‍वास के मुर्दे को गाढ़ कर .......  जब तक सांसे हैं .....  जिन्‍दा रखना है। पिछली मुलाकात में राजू दुबे की मॉं ने बहुत खोदने पर अपना विश्‍वास प्रस्‍तुत किया था कि गांव के डाक्‍टर नें सुई नहीं बदला और फलाना का रोग इसे हो गया। मैं इसे स्‍वीकारने को तैयार नहीं हूं, राजू दुबे की प्रवृत्ति उत्‍श्रंखल थी, चाहे एक बार भी हो उसको वह रोग असुरक्षित शारिरिक संपर्कों से ही हुआ होगा, किन्‍तु मॉं को उसने जो विश्‍वास दिलाया है उसे वो कायम रखे हुए है, उसके मरने बाद भी और संभवत: अपने मृत्‍यु पर्यंत, क्‍योंकि वह मॉं है।

साथियों राजू दुबे की पत्‍नी एचआईवी पाजेटिव पाई गई है, उसका बच्‍चा सुरक्षित है किन्‍तु उसकी पत्‍नी को वर्तमान में टीबी है और गांव में इलाज चल रहा है, बच्‍चे का भविष्‍य असुरक्षित है। एड्स के क्षेत्र में कोई एनजीओ यदि छत्‍तीसगढ़ में कार्य कर रही हो तो मुझे बतलांए कि उस पीडित परिवार तक कैसे और किस हद तक सहायता पहुचाई जा सकती है।
राजू दुबे की मृत्‍यु के बाद मैं उस गांव में गया जहां के डाक्‍टर के सूई पर आरोप थे, लोगों से चर्चा भी किया तो लोगों नें कहा कि सरकारी आकड़ों की बात ना करें तो यहां इस गांव में दस बीस एड्स के मरीज होगें और लगभग इतने ही इस गांव के मूल निवासी भी एड्स मरीज होगें जो वर्तमान में अन्‍यत्र रहते हैं। इतनी बड़ी संख्‍या में एक गांव में एड्स के मरीज पर शासन प्रशासन चुप है, उसे पता ही नहीं है राजू दुबे जैसे कई एड्स संक्रमित उस गांव में हैं, जानकारी लेने पर यह भी ज्ञात हुआ कि वहां ड्राईवरों की संख्‍या भी बहुत है। अब ऐसे में एड्स पर काम करने वाले एनजीओ और स्‍वास्‍थ्‍य विभाग कान में रूई डाले क्‍यू बैठी है समझ में नहीं आता। क्षेत्रीय मीडिया को भी इसकी जानकारी नहीं है क्‍योंकि यह बाईट नत्‍था के मौत की नहीं है राजू दुबे की मौत की है।

सत्य को उद्घाटित करने वाली निडर पत्रकार आशा शुक्‍ला को वसुंधरा सम्मान

लगभग बीस वर्ष से भी पहले नवभारत रायपुर में तेज तर्रार महिला पत्रकार सुश्री आशा शुक्‍ला को रिपोर्टिंग करते देखकर और उनके रिपोर्टिंग को पढ़कर प्रदेश के गणमान्‍य एवं लेखनधर्मी आश्‍चर्यचकित हो जाते थे। तब छत्‍तीसगढ़ में पत्रकारिता के क्षेत्र में सुश्री आशा शुक्‍ला अकेली महिला पत्रकार थी। तत्‍कालीन परिस्थितियों में पुरूषों के प्रभुत्‍व वाले पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करते हुए सुश्री आशा शुक्‍ला नें प्रदेश में महिलाओं के लिए पत्रकारिता के पथ को प्रशस्‍त किया था। सुश्री आशा शुक्‍ला को देखकर ही प्रदेश में, उनके बाद की महिला पीढ़ी नें पत्रकारिता को अपनाया। जिसमें उदंती डाट काम की संपादिका डॉ.रत्‍ना वर्मा से लेकर संगीता गुप्‍ता तक की महिला पत्रकारों में पत्रकारिता क्षेत्र में रूचि जागी। मुझे सुश्री आशा शुक्‍ला के संबंध में पहली बार प्रदेश के ख्‍यात कहानीकार डॉ.परदेशीराम वर्मा जी के लेखों से जानकारी हुई। उसके बाद जब मैं ब्‍लॉग लिखने लगा और छत्‍तीसगढ़ समाचार पत्र के संपादकीय पन्‍नो को नियमित पढ़ने लगा तब सुश्री आशा शुक्‍ला के लेखन से मेरा साक्षात्‍कार हुआ।

मुझे याद आता है पिछले वर्ष, नक्‍सल प्रवक्‍ता गुड़सा और प्रदेश के पुलिस प्रमुख के बीच चल रहे आलेखों में सवाल जवाब, बात बेबात, बात निकलेगी तो बड़ी दूर तलक जाएगी जैसी बौद्धिक विमर्श छत्‍तीसगढ़ समाचार पत्र में प्रकाशित हो रही थी।  इसके ठीक बाद सुश्री आशा शुक्‍ला नें एक लम्‍बा आलेख छत्‍तीसगढ़ के लिए लिखा था जिसमें उन्‍होंनें दोनों के कार्यपद्धतियों, सिद्धांतों पर  सवाल दागते हुए पूछा था कि क्‍या बस्‍तर इससे खुशहाल हो पायेगा। इसके बाद तो उन्‍होंनें लगातार छत्‍तीसगढ़ के लिए आलेख लिखे, छत्‍तीसगढ़ के संपादक को बस्‍तर की परिस्थितियों पर मार्मिक पत्र लिखे। सुश्री आशा शुक्‍ला के लम्‍बे आलेखों में बस्‍तर के प्रति उनका अगाध स्‍नेह झलकता रहा है, जिसको पढ़कर मुझे, उनकी संवेदनशीलता को नमन करने का बार बार मन होता था। पिछले दिनों वसुन्‍धरा सम्‍मान के लिए प्राप्‍त आमंत्रण पत्र से ज्ञात हुआ कि वरिष्ठतम महिला पत्रकार सुश्री आशा शुक्ला को स्वर्गीय देवी प्रसाद चौबे की स्मृति में स्थापित वसुंधरा सम्मान प्रदान किया जाएगा। इसे पढ़कर खुशी हुई कि सुश्री शुक्‍ला से अब मुलाकात हो पायेगी।

भिलाई निवास में स्व. देवी प्रसाद चौबे की चौतीसवीं पुण्‍यतिथि पर आयोजित गरिमापूर्ण समारोह में वरिष्ठतम महिला पत्रकार सुश्री आशा शुक्ला को प्रदेश के मुख्‍यमंत्री डॉ.रमन सिंह नें वसुंधरा सम्मान प्रदान किया, उनके सम्मान में 21 हजार की सम्मान राशि व प्रशस्ति पत्र भेंट किया गया। इस अवसर पर समारोह को संबोधित करते हुए मुख्यामंत्री ने पत्रकार सुश्री आशा शुक्ला के कार्यो की सराहना करते हुए उम्मीद जताई कि सुश्री शुक्ला का नाम राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर होगा। वसुंधरा सम्मान आशा शुक्ला के कृतित्‍व और व्यक्तित्‍व की पहली सीढ़ी है। डॉ सिंह ने पत्रकारिता की चुनौतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि कहा कि पत्रकार समाज व देश को दिशा देने वाला होता है। मौजूदा दौर में पत्रकारिता कठिन चुनौतियों से गुजर रही है लेकिन पत्रकारिता का मूल मकसद आज भी जिंदा है। मौजूदा दौर बेहद प्रतियोगी है और पू्ंजीवाद की वजह से पत्रकार को बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। बावजूद इसके पत्रकारिता का मूल मकसद आज भी समाज व देश को सही रास्ते पर ले जाने का है। उन्होंने नक्सलवाद पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि देश की आतंरिक व्यवस्था के लिए खतरनाक बन चुकी इस हिंसक लड़ाई में पत्रकारों की भूमिका भी निर्णायक है। आशा को शुभकामनाएं देते हुए डॉ. रमन ने कहा कि मैं पिछले 25 वर्षों से आशा को जानता हूं और कह सकता हूं कि वे सत्य को उद्घाटित करने वाली एक निडर पत्रकार हैं।

राजनीतिशास्‍त्र व लोकप्रशासन में स्‍नातकोत्‍तर व  पत्रकारिता में डिप्‍लोमा प्राप्‍त सुश्री शुक्‍ला नें लगभग 33 वर्षों तक देश व प्रदेश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में बतौर पत्रकार कार्य किया है। वर्तमान में वे विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्‍वतंत्र लेखन कर रही हैं। उन्‍होंनें मूल्‍यगत शिक्षा व सामाजिक सरोकार विषय पर एक महत्‍वपूर्ण पाठ्यक्रम का सृजन भी किया है जिसे अमल में लाते हुए विभिन्‍न गैर सरकारी संगठनों द्वारा कार्य किया जा रहा है। सुश्री शुक्‍ला नें 'एक नदी की मौत' नामक चर्चित डाकूमेन्‍ट्री फिल्‍म का निर्माण भी किया है। कवर्धा जिले की बैगा आदिवासी महिलाओं के स्‍वास्‍थ्‍य पर भी उन्‍होंनें एक डाकूमेन्‍ट्री फिल्‍म बनाया है। उन्‍हें दलित व आदिवासी महिलाओं के अधिकार पर पेनास (साउथ एशिया) एवं स्विसऐड की फेलोशिप भी प्राप्‍त हुई है। सुश्री आशा शुक्‍ला वर्तमान में स्‍वतंत्र पत्रकारिता करते हुए छत्‍तीसगढ़ के दक्षिण बस्‍तर जिले कांकेर व नारायणपुर के 40 गांवों में विकास के मुद्दे पर कार्यरत हैं।

आज़ादी ... आज़ादी ... आज़ादी

आज़ादी क्या तीन थके रंगों का नाम है?
जिसे एक पहिया ढोता है?
या इसका कोई और मतलब होता है?
सुदामा पांडे 'धूमिल'
स्‍वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनांए

'पीपली लाइव' में भिलाई का रियल हीरो

सचमुच वह रियल लाइफ का हीरो है जो कल से बड़े परदे पर भी नजर आ रहा है। "नत्था" यानी ओंकारदास मानिकपुरी की जमीनी हकीकत पीपली लाइव से कम नहीं है। यही वजह है कि वह अपने किरदार में इस कदर डूब पाया है कि पता ही नही चलता कि वह अभिनय कर रहा है। इस्पात नगरी भिलाई के वार्ड-१९ वृंदा नगर/अर्जुन नगर में रहने वाले ओंकार का  खपरैल वाला घर है, जहां कच्‍ची मिट्टी की दीवारें हैं, सुविधाओं का पूर्ण अभाव है। यूं कह लें कि ओंकारदार मानिकपुरी का घर किसी मुफलिस के झोपड़े की तरह है, लेकिन परिवार के सदस्यों का परस्पर स्नेह इतना ज्यादा है कि इस गरीबी का अहसास ही नहीं होने देता। पीपली लाइव के हीरो ओंकारदास मानिकपुरी दस साल से थिएटर से जुड़े हैं। पेंटिंग, ठेकेदारी, श्रमिक का कार्य करने के बाद भी उन्होंने अपने अभिनय के शौक को जीवंत रखा है। ओंकार नें पिछले दिनों बतलाया था कि नया थियेटर में हबीब तनवीर के साथ काम करते समय चरणदास चोर साहित आगरा बाजार, जिन्‍ह लाहौर नई वेख्‍या आदि में उन्‍होंनें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। फिल्म स्टार आमिर खान ने उनका एक शो देखा था और करीब तीन साल पहले ही उन्हें पीपली लाइव के लिए फाइनल किया था।

नत्था यानि ओंकारदार मानिकपुरी के तीन बच्चे हैं। बड़ी बेटी चुमेश्वरी (१८ वर्ष) बीए फर्स्ट ईयर में है। वहीं देवेन्द्र दास (१२ वर्ष) पांचवी तथा गीतांजलि (४ वर्ष) कक्षा पहली में पढ़ रहे हैं। पीपली फिल्म में देवेन्द्र ने भी अभिनय किया है। ओंकार से पेंटिंग के सिलसिले में,  लोकरंग व रिखी क्षत्रीय के कार्यक्रमों में मुलाकात होते रही है किन्‍तु तब हम उस हीरे को हीरो के रूप में पहचानते नहीं थे। ओंकार दास २ अगस्त से फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में मुंबई में है और रोज समाचार चैनल में नजर आ रहे हैं। इसके पूर्व भिलाइें में उससे मिलने वालों एवं पत्रकारों का तांता लगा हुआ था, लोगों नें छत्‍तीसगढ़ के पारंपरिक गहना चांदी का रूपिया खरीदकर ओंकार को दिया था कि इसे दीपिका पादुकोण को पहनाना, और हमने टीवी में देखा कि दीपिका नें उसे प्रेम से पहना।
कल रविन्‍द्र गोयल भाई के एक पोस्‍ट के बाद हमने दुर्ग-भिलाई में इस फिल्‍म के प्रदर्शन के संबंध में जानना चाहा तो जैसा कि एक दर्शक मित्र नें फिल्‍म देखने के बाद हमें बतलाया कि कल श्री मानिकपुरी के परिवार सहित इस्पात नगरी और सम्पूर्ण देश के लोगों नें  पीपली लाइव में छत्तीसगढ़ के इस माटी पुत्र को देखा। फिल्‍म में शहर के लोगों को "नत्था" याने ओंकारदास मानिकपुरी की अदाकारी भा गई। यहां व्यंक्टेश्वर टॉकीज के चारों शो हाउसफुल रहे। फिल्म देखने से पहले लोग रोमांचित थे और देखने के बाद "नत्था" की तारीफों के पुल बांधते नजर आए। फिल्म की टिकिट लेने के लिए सुबह से ही लोगों की भीड़ टाकीज के सामने नजर आई। भिलाई के कलाकार को बड़े पर्दे पर देखने के लिए दर्शक उत्साहित रहे। सबकी निगाहें शुरू से अंत तक ओंकार पर ही टिकीं रहीं। फिल्म देखने हर वर्ग के लोग टॉकीज पहुंचे थे। फिल्म में ओंकार का अभिनय दर्शकों को पसंद आया। पूरी फिल्म में ओंकार के अलावा रघुवीर यादव का काम दर्शकों को अच्छा लगा। पूरे समय फिल्म ने दर्शकों को बांधे रखा था। कहीं पर ठहराव की स्थिति नहीं बनी। कुल मिलाकर फिल्म अच्छी लगी। वैसे भी इस फिल्म में अपने शहर का कोई कलाकार है तो यह हमारे लिए गर्व की बात है। फिल्म में शासकीय सुविधाओं और मीडिया पर किए गए व्यंग्य बेहतरीन लगे। ओंकार और रघुवीर के अभिनय में ग्रामीण क्षेत्र का सजीव चित्रण दिखा। पूरे फिल्म में दोनों छाए रहे। फिल्म का क्लाइमेक्स भी अच्छा लगा। जिस उद्देश्य से फिल्म बनाई गई है, वह पूरा हो गया। लोगों नें कहा कि स्थानीय कलाकार ओंकार के रहने से फिल्म में चार चांद लग गए, ओंकार का पूरा परिवार फिल्म देखने आया था।

एक थी नारायणी - कहानी संग्रह : जीवन के यथार्थ की कहानियॉं

’एक थी नारायणी कथा संग्रह की तमाम कहानियॉं भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के बोध विचारों से इस प्रकार आधारित हैं कि इन्हें पढ़ता हुआ पाठक लयबद्ध हो कब अंत पर पहुच जाता है इसका अहसास ही नहीं होता, अंत में पहुचकर एक अद्भुत शांति की अनुभूति मिलती है जिस प्रकार किसी सर के पुलिन पर क्रोंचो और कलहंसों का स्वन कणीवंश इस प्रकार विस्ताररित करता है कि मसाकृपट हुए बिना नहीं रहता, उसी प्रकार श्रीमती सुषमा अवधिया की कहानियॉं मनोवेग को ताडि़त किए रहती हैं, बीच-बीच में झंकृत भी’’ यह शब्द हैं क्षेत्र के ख्यात पत्रकार व साहित्यकार, वर्तमान में पदुमलाल पन्ना लाल बख्शी सृजनपीठ के अध्यक्ष श्री बबन प्रसाद मिश्र जी के जिन्होंनें इस संग्रह की भूमिका में उपरोक्‍त शव्‍द लिखा है, मिश्र जी नें लेखिका के कथा लेखन को सराहा है।
इस कहानी संग्रह में 16 कहानियॉं संग्रहित है, यह लेखिका की दूसरी प्रकाशित संग्रह है। लेखिका नें अपने श्रद्धेय ससुर श्री पुरसोत्तम लाल जी अवधिया को यह संग्रह समर्पित किया है एवं अपने श्रद्धा प्रसून में आदरणीय अवधिया जी के जीवन के आदर्शों का विवरण लिखा है। संग्रह में लेखिका श्रीमती सुषमा अवधिया का जीवन परिचय बहुत ही स्नेह व श्रद्धा से उनके पुत्र श्री उमेश अवधिया जी नें लिखा है। लेखिका की सहेली और उनसे एक कक्षा नीचे पढ़ने वाली डॉ.शीला गोयल नें लेखिका के भोले और संस्कारी मन के संबंध में ‘छिटक गई सुषमा बनकर’ में विस्तृत चित्र खींचा है। लेखिका नें स्वयं अपने आत्‍म कथ्य ‘मन की बात’ में कथा लेखन की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए संग्रह के प्रकाशन के लिए आभार व्यक्त किया हैं।
संग्रह की कहानियॉं जन सामान्य की कहानियॉं हैं जिसमें लेखिका नें धटनाओं को पल-पल उकेरा हैं, कहानियों को पढ़ते हुए यह भान हो जाता है कि लेखिका कहानी को अपने मानस पटल में चलचित्रों की भांति अनुभव करती रही है तभी शव्‍दों में प्रत्येक दृश्य को जीवंत करते चलती हैं। सैनिक छावनी की महक व प्रखर की निच्छनल प्रेम कथा, मैं पापिन में नायिका की हृदय विदारक फ्लैश बैक विवरण व वर्तमान के साथ उसका तालमेल व क्लाईमेक्स में नायिका की मृत्यु, पढ़ते हुए झकझोर के रख देते हैं। संस्कार में सामाजिक मर्यादाओं एवं संस्‍कार की शिक्षा देते हुए लेखिका नें नायिका को जीवन के अनुभवों से ही शिक्षित करती है। लम्बी कहानी वैदेही में लेखिका नें तत्कालीन राजे रजवाडे की परिस्थितियों का सुन्दर चित्रण किया है। कथा में राजा की पत्नी और पत्नी की मृत्यु पश्या‍त मिली अनाथ पुत्री के प्रेम का मर्मस्प‍र्शी चित्रण किया गया है। मूल कहानी एक थी नारायणी में छत्‍तीसगढ़ के गांव का सजीव चित्रण है, दुख, प्रेम, आर्थिक विपन्नता, संस्कार व विवाह नें कहानी में रोचकता भर दी है। इस संग्रह की कुछ कहानियों में कथानक कुछ ज्‍यादा लम्‍बा खिंचता है जो लगता है कि अनावश्‍यक खिंचाव है किन्‍तु कहानी की शास्‍त्रीयता से परे लेखिका नें अपने अनुभवों को इसमें पिरोया है इस कारण सभी कहानियों में पठनीयता विद्यमान है।
इस संग्रह की लेखिका श्रीमती सुषमा अवधिया का जन्म 15 सितम्बर 1946 को जबलपुर मध्य प्रदेश में हुआ,  छत्तीसगढ़ के धुर गांव में इनका विवाह हुआ। इन्होंनें महाविद्यालयीन स्तर में बी.एस सी. तक पढ़ाई की और साथ ही संस्कृत में कोविद् व पेंटिंग में डिप्लोमा किया। बचपन से ही इन्हें लेखन का शौक रहा, भाषण, वादविवाद, निबंध, कविता, नाटकों में इन्होंनें लगातार सहभागिता दी। तत्कालीन मध्य प्रदेश में प्रदेश स्‍तर की खो-खो खिलाड़ी रही और अनेक शहरों में बास्केंटबाल खिलाड़ी के रूप में रानी दुर्गावती विश्वदविद्यालय का प्रतिनिधित्व भी किया। इनकी पहली कहानी चिता और मिलन थी, जिसे महाविद्यालय में प्रथम पुरस्का‍र मिला जबकि लेखिका नें इसे तब लिखा था जब वो आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। एक थी नारायणी के पूर्व लेखिका की कृति सहमे-सहमे दर्द प्रकाशित हो चुकी है। इन्हें इनके लेखन के लिए अनेक सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हुए है, इन्हें महाकौशल कला सृजन सम्मानन 2004 प्राप्त हुआ है एवं छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् द्वारा भी इन्‍हें सम्मानित किया गया है। श्रीमती सुषमा अवधिया आकाशवाणी रायपुर में नियमित हिन्दी और छत्तीसगढ़ी की नाट्य कलाकार हैं व आकाशवाणी के लिए नियमित आलेख लेखन करती रहती हैं। इनके आलेख व कहानियां अखबारों में प्रकाशित होते रहते हैं। श्रीमती सुषमा अवधिया, छत्‍तीसगढ़ के ख्‍यात वनस्‍पति शास्‍त्री व ब्‍लॉगर दर्द हिन्‍दुस्‍तानी डॉ. पंकज अवधिया की माता हैं।

मित्रों विगत महीनों में छत्‍तीसगढ़ के लेखकों की प्रकाशित कुछ और पुस्‍तकें लेखकों के द्वारा मुझे स्‍नेह से प्रेषित की गई हैं, जिनके संबंध में प्रिंट मीडिया के लिए संक्षिप्‍ती लिखना शेष है, समयाभाव के कारण यह हो नहीं पा रहा है। फिर भी प्रयास करूंगा कि शीघ्र ही पुस्‍तकों का परिचय प्रस्‍तुत करूं। अगली कड़ी में आदरणीय प्रो.अश्विनी केशरवानी जी की पुस्‍तक 'बच्‍चों की हरकतें' पर कुछ लिखने का प्रयास करूंगा।  

लेह .... अब यादें ही शेष है

लेह बाजार के स्‍वागत द्वार में मित्र ऋषि तिवारी

खारदुंगला रोड में थम से गए झरने पर मेरे मित्र

हजारों किलोमीटर दूर, दुनिया के सबसे उंचे मोटरेबल रोड पर काम करते मजदूरों के मुह से गुरतुर गोठ छत्‍तीसगढ़ी सुनना कितना सुखद लगता था ............ आज छत्‍तीसगढ़ में हरेली तिहार से त्‍यौहारों का आरंभ हो रहा है ..... आकुल आंखें कमाने खाने गए बेटों का इंतजार कर रही है ......
लेह में उन छत्‍तीसगढि़या मजदूरों के साथ ही दैवीय आपदा के शिकार सभी व्‍यक्तियों को हम श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।

ब्‍लॉग से दूर रहने में कोई आनंद नहीं है प्‍यारे

मित्रों,  पिछले सप्‍ताह कुछ दिनों के लिए ब्‍लॉग सक्रियता से अवकाश लेकर हम अपने काशी काबा  में धूनी रमाये बैठे रहे। इस धूनी यज्ञ में हम इस कदर व्‍यस्‍त रहे कि मित्र अजय झा एवं राजीव तनेजा जी के स्‍नेह निमंत्रण व , अनुज मिथिलेश व नीशू के मेरठ से दिल्‍ली आकर मिलने के अधिकार का भी हम मान नहीं रख सके। हम प्रतीक्षारत हैं कि धूनी की राख कुछ शांत हो और हम वापस ब्‍लॉग पर आयें और हमारी अगली यात्रा भी शीध्र हो ......

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छत्‍तीसगढ़ की कला, साहित्‍य एवं संस्‍कृति पर संजीव तिवारी एवं अतिथि रचनाकारों के आलेख

लूट का बदला लूट: चंदैनी-गोंदा

  विजय वर्तमान चंदैनी-गोंदा को प्रत्यक्षतः देखने, जानने, समझने और समझा सकने वाले लोग अब गिनती के रह गए हैं। किसी भी विराट कृति में बताने को ...