ब्लॉग छत्तीसगढ़

08 January, 2018

मां के प्रति दबी काम वासना : हबीब तनवीर की प्रस्‍तुति 'बहादुर कलारिन'

एक औरत और एक मां या यो कहे कि एक मां को केवल एक औरत बना लेने की बेटे की इच्छा कैसे मां को तोड़ देती है, अपने जीवन से एकदम विमुख कर देती है इसका अत्यत प्रभावपूर्ण चित्रण बहादुर कलारिन मे फिदाबाई ने किया।

"चरनदास चोर' के बाद हबीब तनवीर ने फिर एक लोककथा उठाई 'बहादुर कलारिन' (1978)। यह कथा छत्तीसगढ़ के एक अचंल सोरर मे प्रचलित थी जिसमे बहादुर नाम की कलारिन (शराब बेचनेवाली) राजा के प्रेम में पड़ती है लेकिन राजा उसके प्रेम का प्रतिदान नहीं देता। उसका बेटा छछन इडिपस कामप्लेक्स के साथ बडा़ होता है। वह एक के बाद एक एक सौ छब्बीस औरतों से विवाह करता है मगर उन्हे छोड़ता चलता है। किसी भी औरत से न पटने का कारण छछन के मन मे अपनी मां के प्रति दबी काम वासना थी। जब वह बहादुर से अपनी इच्छा व्यक्त करता है तो वह सकते मे आ जाती है, बहुत क्षुब्ध होती है। पहले तो वह सारे गाँव से कहती है कि कोई छछन को पीने को एक घूट पानी भी न दे। फिर स्वय उसे कुए मे ढकेल देती है और खुद भी उसमे कूदकर आत्महत्या कर लेती है। आधुनिक युग मे व्याख्‍यायित इडिपस कामप्लेक्स का इस लोककथा मे समन्वय देखकर आश्चर्य होता है। इस प्रस्तुति में हबीब ने पंथी लोक कलाकारों के साथ जनजातियों के नर्तकों को सम्मिलित करने का प्रयोग भी किया। मंडला गाँव के ये गोंड नतर्क पंथी कलाकारों जैसे प्रभावपूर्ण नही रहे तथापि उन्होने बहादुर कलारिन को प्राणवान बनाया, अधिक कलरफुल बनाया। 

गीत : 'अईसन सुन्दर नारी के ई बात, कलारिन ओकर जात...', 'चोला माटी का हे राम एकर का भरोसा...',  'होगे जग अंधियार, राजा बेटा तोला...'

बहादुर कलारिन को सफलता का बडा़ श्रेय नाम भूमिका मे अभिनय करने वाली कलाकार फिदाबाई को है। उनका दंबग कंठस्वर, पूरी आवाज मे गला खोलकर गायन, खडे़ होने की भंगिमा, फुर्ती और चुस्ती सब मुग्ध करने वाले थे। मौजमस्ती और भोगविलास को लेकर चलने वाली कहानी अंत मे आकर दुखांत बन जाती है- दुखात भी ऐसी कि सबके मन को छलनी कर दे। फिदाबाई ने बडी़ कुशलतापूवक इस अंश को रूपायित किया- एक औरत और एक मां या यो कहे कि एक मां को केवल एक औरत बना लेने की बेटे की इच्छा कैसे मां को तोड़ देती है, अपने जीवन से एकदम विमुख कर देती है इसका अत्यत प्रभावपूर्ण चित्रण बहादुर कलारिन मे फिदाबाई ने किया। यद्यपि वर्षों तक वे नया थियेटर के साथ रही और उन्होने अनेंक नाटको मे मुख्य भुमिका मे अभिनय किया तथापि मेरी दृष्टि मे बहादुर कलारित की भूमिका मे उन्होनें दर्शकों को जो दिया, अनुभूति की गहरायी का जो साक्षात्कार उन्होने दर्शको को कराया वहु अद्भुत था, अपूर्व था, उस अभिनय के लिए वे सदा स्मरण की जायेगी। फिदाबाई के अतिरिक्त उदयराम (राजा), बाबूदास (बहादुर का चाचा) आदि ने भी प्रभावपूर्ण अभिनय किया।

प्रस्तुति की दृष्टि से बहादुर कलारिन "चरनदास चोर' से भिन्न थी। इसमे हबीब ने नाच का अधिक उपयोग किया, नाच के माध्यम से कहानी को आगे बढाया। जैसा कि कहा जा चुका है, इस प्रस्तुति मे ट्राइबल कलाकारों को भी लिया गया पर वे उतने सफल नही रहे तथापि प्रयोग की दृष्टि से यह एक नयी दिशा थी और उस दृष्टि से सफल थी। संगीत गंगाराम सिखेत का था जिसे कोरस ने खूबसूरती से प्रस्तुत किया। नाटक मे कुछ समकालीन संकेत भी थे यथा बच्चों का अतिरिक्त लाड़-दुलार और उसका समाज पर पड़नेवाला कुप्रभाव लेकिन वे संकेत तक ही रह गये विशेष प्रभावपूर्ण नही बन पाये।
साभार : हबीब तनवीर एक रंग व्‍यक्तित्‍व संपादन - प्रतिभा अग्रवाल
वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह नाटक गूगल बुक में यहॉं संग्रहित है। 

5 comments:

  1. रोचक जानकारी भैया

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  2. रोचक जानकारी भैया

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’ऐतिहासिकता को जीवंत बनाते वृन्दावन लाल वर्मा : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  4. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’ऐतिहासिकता को जीवंत बनाते वृन्दावन लाल वर्मा : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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08 January, 2018

मां के प्रति दबी काम वासना : हबीब तनवीर की प्रस्‍तुति 'बहादुर कलारिन'

एक औरत और एक मां या यो कहे कि एक मां को केवल एक औरत बना लेने की बेटे की इच्छा कैसे मां को तोड़ देती है, अपने जीवन से एकदम विमुख कर देती है इसका अत्यत प्रभावपूर्ण चित्रण बहादुर कलारिन मे फिदाबाई ने किया।

"चरनदास चोर' के बाद हबीब तनवीर ने फिर एक लोककथा उठाई 'बहादुर कलारिन' (1978)। यह कथा छत्तीसगढ़ के एक अचंल सोरर मे प्रचलित थी जिसमे बहादुर नाम की कलारिन (शराब बेचनेवाली) राजा के प्रेम में पड़ती है लेकिन राजा उसके प्रेम का प्रतिदान नहीं देता। उसका बेटा छछन इडिपस कामप्लेक्स के साथ बडा़ होता है। वह एक के बाद एक एक सौ छब्बीस औरतों से विवाह करता है मगर उन्हे छोड़ता चलता है। किसी भी औरत से न पटने का कारण छछन के मन मे अपनी मां के प्रति दबी काम वासना थी। जब वह बहादुर से अपनी इच्छा व्यक्त करता है तो वह सकते मे आ जाती है, बहुत क्षुब्ध होती है। पहले तो वह सारे गाँव से कहती है कि कोई छछन को पीने को एक घूट पानी भी न दे। फिर स्वय उसे कुए मे ढकेल देती है और खुद भी उसमे कूदकर आत्महत्या कर लेती है। आधुनिक युग मे व्याख्‍यायित इडिपस कामप्लेक्स का इस लोककथा मे समन्वय देखकर आश्चर्य होता है। इस प्रस्तुति में हबीब ने पंथी लोक कलाकारों के साथ जनजातियों के नर्तकों को सम्मिलित करने का प्रयोग भी किया। मंडला गाँव के ये गोंड नतर्क पंथी कलाकारों जैसे प्रभावपूर्ण नही रहे तथापि उन्होने बहादुर कलारिन को प्राणवान बनाया, अधिक कलरफुल बनाया। 

गीत : 'अईसन सुन्दर नारी के ई बात, कलारिन ओकर जात...', 'चोला माटी का हे राम एकर का भरोसा...',  'होगे जग अंधियार, राजा बेटा तोला...'

बहादुर कलारिन को सफलता का बडा़ श्रेय नाम भूमिका मे अभिनय करने वाली कलाकार फिदाबाई को है। उनका दंबग कंठस्वर, पूरी आवाज मे गला खोलकर गायन, खडे़ होने की भंगिमा, फुर्ती और चुस्ती सब मुग्ध करने वाले थे। मौजमस्ती और भोगविलास को लेकर चलने वाली कहानी अंत मे आकर दुखांत बन जाती है- दुखात भी ऐसी कि सबके मन को छलनी कर दे। फिदाबाई ने बडी़ कुशलतापूवक इस अंश को रूपायित किया- एक औरत और एक मां या यो कहे कि एक मां को केवल एक औरत बना लेने की बेटे की इच्छा कैसे मां को तोड़ देती है, अपने जीवन से एकदम विमुख कर देती है इसका अत्यत प्रभावपूर्ण चित्रण बहादुर कलारिन मे फिदाबाई ने किया। यद्यपि वर्षों तक वे नया थियेटर के साथ रही और उन्होने अनेंक नाटको मे मुख्य भुमिका मे अभिनय किया तथापि मेरी दृष्टि मे बहादुर कलारित की भूमिका मे उन्होनें दर्शकों को जो दिया, अनुभूति की गहरायी का जो साक्षात्कार उन्होने दर्शको को कराया वहु अद्भुत था, अपूर्व था, उस अभिनय के लिए वे सदा स्मरण की जायेगी। फिदाबाई के अतिरिक्त उदयराम (राजा), बाबूदास (बहादुर का चाचा) आदि ने भी प्रभावपूर्ण अभिनय किया।

प्रस्तुति की दृष्टि से बहादुर कलारिन "चरनदास चोर' से भिन्न थी। इसमे हबीब ने नाच का अधिक उपयोग किया, नाच के माध्यम से कहानी को आगे बढाया। जैसा कि कहा जा चुका है, इस प्रस्तुति मे ट्राइबल कलाकारों को भी लिया गया पर वे उतने सफल नही रहे तथापि प्रयोग की दृष्टि से यह एक नयी दिशा थी और उस दृष्टि से सफल थी। संगीत गंगाराम सिखेत का था जिसे कोरस ने खूबसूरती से प्रस्तुत किया। नाटक मे कुछ समकालीन संकेत भी थे यथा बच्चों का अतिरिक्त लाड़-दुलार और उसका समाज पर पड़नेवाला कुप्रभाव लेकिन वे संकेत तक ही रह गये विशेष प्रभावपूर्ण नही बन पाये।
साभार : हबीब तनवीर एक रंग व्‍यक्तित्‍व संपादन - प्रतिभा अग्रवाल
वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह नाटक गूगल बुक में यहॉं संग्रहित है। 
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