ब्लॉग छत्तीसगढ़

14 April, 2017

कोदूराम दलित की साहित्य साधना : अम्‍बेडकर जयंती पर विशेष

मनुष्य भगवान की अद्भुत रचना है, जो कर्म की तलवार और कोशिश की ढाल से, असंभव को संभव कर सकता है । मन और मति के साथ जब उद्यम जुड जाता है तब बडे - बडे तानाशाह को झुका देता है और लंगोटी वाले बापू गाँधी की हिम्मत को देख कर, फिरंगियों कोहिन्दुस्तान छोड कर भागना पडता है । मनुष्य की सबसे बडी पूञ्जी है उसकी आज़ादी,जिसे वह प्राण देकर भी पाना चाहता है, तभी तो तुलसी ने कहा है - ' पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।' तिलक ने कहा - ' स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे ।' सुभाषचन्द्र बोस ने कहा - ' तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा ।' सम्पूर्ण देश में आन्दोलन हो रहा था, तो भला छ्त्तीसगढ स्थिर कैसे रहता ? छ्त्तीसगढ के भगतसिंह वीर नारायण सिंह को फिरंगियों ने सरेआम फाँसी पर लटका दिया और छ्त्तीसगढ ' इंकलाब ज़िंदाबाद ' के निनाद से भर गया, ऐसे समय में ' वंदे मातरम् ' की अलख जगाने के लिए, कोदूराम 'दलित' जी आए और उनकी छंद - बद्ध रचना को सुनकर जनता मंत्र - मुग्ध हो गई - सम्पूर्ण आलेख शकुंतला शर्मा जी के ब्लॉग शाकुन्तलम् में यहाँ संग्रहित है।

3 comments:

  1. बने सोरियायेव कोदूराम दलित जी ल बाबा साहेब के जयंती के मउका म, ...जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके किसी काम की नहीं...बी.आर. अंबेडकर।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-04-2017) को
    "खोखली जड़ों के पेड़ जिंदा नहीं रहते" (चर्चा अंक-2619)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. कोदूराम दलित जी छत्तीसगढ़ के एक महान जन कवि रहिस हवे। फेर दुर्भाग्य के बात हरे जेन सम्मान मिलना रहिस हवै नइ मिल पाइस।।

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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मनुष्य भगवान की अद्भुत रचना है, जो कर्म की तलवार और कोशिश की ढाल से, असंभव को संभव कर सकता है । मन और मति के साथ जब उद्यम जुड जाता है तब बडे - बडे तानाशाह को झुका देता है और लंगोटी वाले बापू गाँधी की हिम्मत को देख कर, फिरंगियों कोहिन्दुस्तान छोड कर भागना पडता है । मनुष्य की सबसे बडी पूञ्जी है उसकी आज़ादी,जिसे वह प्राण देकर भी पाना चाहता है, तभी तो तुलसी ने कहा है - ' पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।' तिलक ने कहा - ' स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे ।' सुभाषचन्द्र बोस ने कहा - ' तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा ।' सम्पूर्ण देश में आन्दोलन हो रहा था, तो भला छ्त्तीसगढ स्थिर कैसे रहता ? छ्त्तीसगढ के भगतसिंह वीर नारायण सिंह को फिरंगियों ने सरेआम फाँसी पर लटका दिया और छ्त्तीसगढ ' इंकलाब ज़िंदाबाद ' के निनाद से भर गया, ऐसे समय में ' वंदे मातरम् ' की अलख जगाने के लिए, कोदूराम 'दलित' जी आए और उनकी छंद - बद्ध रचना को सुनकर जनता मंत्र - मुग्ध हो गई - सम्पूर्ण आलेख शकुंतला शर्मा जी के ब्लॉग शाकुन्तलम् में यहाँ संग्रहित है।

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