ब्लॉग छत्तीसगढ़

26 November, 2016

भीम सम विधान


हमारा संविधान सचमुच में भीम है, इसलिए नहीं कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर उसके निर्माता हैं। बल्कि अपनी सम्पूर्णता में वह भीम है। हमारा संविधान विश्व का सर्वश्रेष्ठ भारतीय नागरिक संहिता है। भीम शब्द को इसके साथ युग्म करना सार्थक है क्योंकि संविधान को अम्बेडकर से और अम्बेडकर को संविधान से पृथक नहीं किया जा सकता। हमारे देश के चौक-चौराहों में लगी प्रतिमाओं में भी संविधान भीम के साथ उपस्तिथ है जिसे अम्बेडकर ने पोटार कर रखा है, बच्चे की तरह। दुनिया में संभवत: भारत ही ऐसा देश है जहां चौराहों में संविधान मूर्ति के रूप में उपस्थित है।

स्थूल मूर्तियां प्रतीक रूप में जीवन को सक्रिय करती हैं शायद इसलिए मूर्तियों को चौक चौराहों में लगाने की भारतीय परंपरा रही है। यह अलग बात है कि इन मूर्तियों में पक्षी बीट करते हैं और उसकी रखरखाव तरीके से नहीं हो पाती है। किन्तु भारत में अन्य लोगों के बरस्क अंबेडकर की प्रतिमा का देखरेख बहुत अच्छे ढंग से होता है जो यह सिद्ध करता है कि भारत में उनकी जबरदस्त साख है। होना ही चाहिए, उन्होंने दुनिया का सर्वश्रेष्ठ संविधान जो हमें रच के दिया है जिस पर हमें गर्व है।

इसीलिए इस महान भीम की महिमा अक्षुण रखने के वास्ते इनके अनुयायी संविधान दिवस को भी भीम दिवस के रूप में देखते हैं। इस बात के लिए तो छत्तीसगढ़ियों सहित सभी भारतवासियों को इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। हालाँकि छत्तीसगढ़ अभी इस भीम के पगरइती को ठीक-ठीक से समझता नहीं है।छत्तीसगढ़ में भीम के मायने वही गदा वाले से है। आदि काल से जो लोक का नायक है, जिससे पंडवानी की अजस्र धारा प्रवाहित है। यहाँ के गांव में 'जय भीम-जय भीम' नारा लगाने से, गाँव का व्यक्ति पाण्डव वाला भीम समझ के ही जय-जय नरियाता है। जो थोड़े-बहुत इस भीम रचित संविधान को जानते हैं वे बस्तर में इस संविधान के पन्नों को फाड़कर चखना धरते है और फटहा संविधान, बाद में बिलासपुर के बोदरी में खिला जाता है।

भीम के साथ संविधान निर्मात्री सदस्यों में दुर्ग के घनश्याम गुप्ता भी थे। सुना है कि वे दाऊ थे शायद इसीलिए उनके वारिसनो को उनके इतने बड़े अवदानो का सुरता नहीं है, कुछ सहेज कर रखा भी नहीं है। वैसे भी उन्हें इसकी कोई जरुरत भी नहीं है वे तो पीढ़ीगत दऊई में मस्त हैं, ये तो जनता का कर्तव्य है कि घनश्याम गुप्ता के अवदानों को अपने स्वयं के संसाधनों से सकेलें और बगरायें। यह हम छत्तीसगढ़ियों का भोलापन है या दऊई अख्खड़पन। भीम के साथ कदम-पे-कदम मिलाते संविधान निर्माण के लिए चलते हुए भी, घनश्याम गुप्ता संविधान को पोटार के फोटू नहीं खिंचा सके।

इसके बावजूद हमारी नासमझी या बकौल पद्मश्री डॉ सुरेन्द्र दुबे कहें तो सुप्पर इंटेलिजेंट छत्तीसगढ़िया चीजों का संतुलन और अर्थ अपने सुविधा के अनुसार बनाता है। मेरे एक दोस्त को ही ले लो, वह उंगली करने में माहिर है, कहीं RTI लगाएगा तो कहीं शिकायत पत्र लेकर पहुंच जाएगा, कभी चौक में धरना-आंदोलन करने लगेगा तो कभी मुर्दाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाने लगेगा। जब मैं उसे पूछता हूं कि तुम्हें यह उंगली करने की का ज्ञान कहां से प्राप्त हुआ तो वह अपने पास रखे संविधान की ओर इशारा करता है। संविधान का इस तरह भी महत्त्व हो सकता है यह तत्कालीन संविधान निर्माता दल ने नहीं सोंचा होगा।

जो भी हो, आज संविधान दिवस है और आज अपने महान संविधान को सोरियाने का अवसर है। किन्तु आज के समाचार पत्रों में छपे विज्ञापनों को देखते हुए अंबेडकर के प्रति पूर्ण आदर के साथ लगता है कि विज्ञापनदाताओं के लिए, संविधान गौड हो गया है व्यक्ति महत्वपूर्ण हो गया है।

- तमंचा रायपुरी
26.11.2016
(हम भारत के लोगों के साथ सिटी बस में सफ़र करते हुए)

2 comments:

  1. प्रणाम सुप्पर इंटेलिजेंट छत्तीसगढ़िया...

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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26 November, 2016

भीम सम विधान


हमारा संविधान सचमुच में भीम है, इसलिए नहीं कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर उसके निर्माता हैं। बल्कि अपनी सम्पूर्णता में वह भीम है। हमारा संविधान विश्व का सर्वश्रेष्ठ भारतीय नागरिक संहिता है। भीम शब्द को इसके साथ युग्म करना सार्थक है क्योंकि संविधान को अम्बेडकर से और अम्बेडकर को संविधान से पृथक नहीं किया जा सकता। हमारे देश के चौक-चौराहों में लगी प्रतिमाओं में भी संविधान भीम के साथ उपस्तिथ है जिसे अम्बेडकर ने पोटार कर रखा है, बच्चे की तरह। दुनिया में संभवत: भारत ही ऐसा देश है जहां चौराहों में संविधान मूर्ति के रूप में उपस्थित है।

स्थूल मूर्तियां प्रतीक रूप में जीवन को सक्रिय करती हैं शायद इसलिए मूर्तियों को चौक चौराहों में लगाने की भारतीय परंपरा रही है। यह अलग बात है कि इन मूर्तियों में पक्षी बीट करते हैं और उसकी रखरखाव तरीके से नहीं हो पाती है। किन्तु भारत में अन्य लोगों के बरस्क अंबेडकर की प्रतिमा का देखरेख बहुत अच्छे ढंग से होता है जो यह सिद्ध करता है कि भारत में उनकी जबरदस्त साख है। होना ही चाहिए, उन्होंने दुनिया का सर्वश्रेष्ठ संविधान जो हमें रच के दिया है जिस पर हमें गर्व है।

इसीलिए इस महान भीम की महिमा अक्षुण रखने के वास्ते इनके अनुयायी संविधान दिवस को भी भीम दिवस के रूप में देखते हैं। इस बात के लिए तो छत्तीसगढ़ियों सहित सभी भारतवासियों को इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। हालाँकि छत्तीसगढ़ अभी इस भीम के पगरइती को ठीक-ठीक से समझता नहीं है।छत्तीसगढ़ में भीम के मायने वही गदा वाले से है। आदि काल से जो लोक का नायक है, जिससे पंडवानी की अजस्र धारा प्रवाहित है। यहाँ के गांव में 'जय भीम-जय भीम' नारा लगाने से, गाँव का व्यक्ति पाण्डव वाला भीम समझ के ही जय-जय नरियाता है। जो थोड़े-बहुत इस भीम रचित संविधान को जानते हैं वे बस्तर में इस संविधान के पन्नों को फाड़कर चखना धरते है और फटहा संविधान, बाद में बिलासपुर के बोदरी में खिला जाता है।

भीम के साथ संविधान निर्मात्री सदस्यों में दुर्ग के घनश्याम गुप्ता भी थे। सुना है कि वे दाऊ थे शायद इसीलिए उनके वारिसनो को उनके इतने बड़े अवदानो का सुरता नहीं है, कुछ सहेज कर रखा भी नहीं है। वैसे भी उन्हें इसकी कोई जरुरत भी नहीं है वे तो पीढ़ीगत दऊई में मस्त हैं, ये तो जनता का कर्तव्य है कि घनश्याम गुप्ता के अवदानों को अपने स्वयं के संसाधनों से सकेलें और बगरायें। यह हम छत्तीसगढ़ियों का भोलापन है या दऊई अख्खड़पन। भीम के साथ कदम-पे-कदम मिलाते संविधान निर्माण के लिए चलते हुए भी, घनश्याम गुप्ता संविधान को पोटार के फोटू नहीं खिंचा सके।

इसके बावजूद हमारी नासमझी या बकौल पद्मश्री डॉ सुरेन्द्र दुबे कहें तो सुप्पर इंटेलिजेंट छत्तीसगढ़िया चीजों का संतुलन और अर्थ अपने सुविधा के अनुसार बनाता है। मेरे एक दोस्त को ही ले लो, वह उंगली करने में माहिर है, कहीं RTI लगाएगा तो कहीं शिकायत पत्र लेकर पहुंच जाएगा, कभी चौक में धरना-आंदोलन करने लगेगा तो कभी मुर्दाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाने लगेगा। जब मैं उसे पूछता हूं कि तुम्हें यह उंगली करने की का ज्ञान कहां से प्राप्त हुआ तो वह अपने पास रखे संविधान की ओर इशारा करता है। संविधान का इस तरह भी महत्त्व हो सकता है यह तत्कालीन संविधान निर्माता दल ने नहीं सोंचा होगा।

जो भी हो, आज संविधान दिवस है और आज अपने महान संविधान को सोरियाने का अवसर है। किन्तु आज के समाचार पत्रों में छपे विज्ञापनों को देखते हुए अंबेडकर के प्रति पूर्ण आदर के साथ लगता है कि विज्ञापनदाताओं के लिए, संविधान गौड हो गया है व्यक्ति महत्वपूर्ण हो गया है।

- तमंचा रायपुरी
26.11.2016
(हम भारत के लोगों के साथ सिटी बस में सफ़र करते हुए)

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