ब्लॉग छत्तीसगढ़

19 May, 2010

बेकसूरों की हत्याओं पर कलम का मौन दर्ज करेगा इतिहास : कनक तिवारी


बस्तर में सुकमा-दंतेवाड़ा मार्ग पर यात्री बस को बारूदी सुरंग विस्फोट से उड़ाकर नक्सालियों ने निर्दोष नागरिकों सहित 36 लोगों (संख्या परिवर्तनीय है) की निर्मम हत्या कर दी। यह एक माह में तीसरी बड़ी घटना है। राज्य का पुलिस और खुफिया तंत्र सवालों के घेरे में है। पूरी सरकारी मशीनरी बेबस और लाचार तो नहीं लेकिन किंकर्तव्यविमूढ़ ज़रूर नजर आ रही है। केन्द्र सरकार का गृह मंत्रालय भी पसोपेश में नजर आता है। प्रदेश के गृहमंत्री सेना को बुलाने की मांग करते हैं। मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) उनसे सहमत नहीं हैं। केद्रीय गृह मंत्री वायु सेना के सीमित उपयोग की बात करते हैं। वायु सेनाध्यक्ष की अपनी ढपली है। म.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्वविजय सिंह केद्रीय गृह मंत्री को इस मामले में केवल राज्य सरकार को सहायता देने तक सीमित रहने की सलाह देते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी सीमित समय के लिए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रहे हैं। राज्य कांग्रेस पार्टी विधान सभा का विशेष अधिवेशन बुलाए जाने की मांग कर चुकी है। राज्यपाल अनिर्णय में हैं। प्रधानमंत्री नक्सल वाद को सबसे बड़ा आंतरिक खतरा करार दे चुके हैं। गांधीवादी शांति यात्री भी असफल अभियान से लौट चुके हैं। उकसाए गए थोड़े से युवकों और बस्तर के व्यापारियों ने उनके खिलाफ पुलिस की सांठगांठ से विरोध करने की पिकनिक भी कर ली। मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की तत्काल प्रतिक्रिया देखने में नहीं आई है।
बुद्धिजीवी, लेखक, कवि, कलाकार, संस्कृति कर्मी चुप हैं। कुछ निर्विकार हैं, कुछ अल्पसूचित हैं, कुछ सहमे हुए हैं, कुछ भाग्यवादी हैं, कुछ हलचल में हैं, कुछ सरकारी सूचनातंत्र पर निर्भर हैं, कुछ टी.वी. चैनलों से चिपके हुए हैं, ब्रेक होने पर इंडियन आयडल देख लेते हैं। कुछ सरकारी बुद्धिजीवी अपने राजनीतिक आकाओं के महिमा मंडन में व्यस्त हैं। अफसरी बुद्धि चातुर्य के किस्से अलग गढ़े जा रहे हैं। सामचार पत्रों में खबरों के लिए जगह है, विचारों के लिए नहीं। सेक्स, दुर्घटना, डकैती, हत्या , भ्रष्टाचार, क्रिकेट, फिल्मी लटकों झटकों के तड़कों की प्रथम पृष्ठ की खबरों का मुकाबला बहुराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापनों से ही होता है। वहां भी एम.डी. साहब या जी.एम. साहब सम्पादकों के ऊपर हैं। वे अधिकतर मंत्रियों और अफसरों के दीवानखानों, निजी पार्टियों और सरकारी उडऩ खटोले में व्यस्त होते हैं।
ये तस्वीर की मोटी मोटी रेखाएं हैं। बारीक अभिव्यक्तियां तो जनता को पता ही नहीं होतीं। बस्तर का क्या भविष्य है-यह बुनियादी सवाल है। नक्सल वाद नासूर नहीं नासूर का एक कारण है। वैश्विक पूंजीवाद के प्रसार के कारण बस्तर जैसे देश के सभी आदिवासी अर्थात वन संस्कृति के इलाके नक्सलियों के हत्थे चढ़ते जा रहे हैं। जंगल नक्सलियों के छिपने के स्थान हैं। आदिवासी वहां सदियों से रह रहे हैं। नक्सली उनके मसीहा बनकर नहीं आए हैं। उनकी तो इतने सीधे सादे, मन- वचन-कर्म के प्रति ईमानदार आदिवासियों को पाकर लॉटरी खुल गई है। विनाश का मूल कारण तो विकास की वह थ्योरी है जो व्हाइट हाउस, वर्ल्ड बैंक या 10 डाउनिंग स्ट्रीट वगैरह से पैदा होकर नई दिल्ली की संसद के मार्फत बस्तर जैसे जंगलों तक विस्तृत हो गई है।
पिछले चालीस पचास बरस से राज्य और केद्र सरकारें आदिवासियों पर नीयतन या लापरवाही से अत्याचार कर रही हैं। उनके प्राकृतिक, संवैधानिक, जातीय और नागरिक अधिकार कम किए जा रहे हैं। कूढ़मगज सरकारी सोच ने अंगरेजों के बनाए गए जालिम कानूनों जैसे भारतीय वन अधिनियम 1927, भू अर्जन अधिनियम 1894, भारतीय सुखभोग अधिनियम, पंचायत और भू राजस्व कानून वगैरह को आदिवासी जरूरतों, माली हालत, संस्कृति आदि के अनुकूल नहीं बनाया है। अलबत्ता उनसे जंगल का परिवेश, संरक्षण, उपयोगिता आदि को कम ही किया जाता रहा। तथाकथित जातीय आरक्षण से भी आदिवासियों का एक मलाईदार तबका ही तैयार हो पाया जो राजनीति के ब्राम्हण ठाकुर मालिकों के दरबारी की भूमिका में मुस्तैद रहा। आज बाजार का आदिवासी खुद को ठगा हुआ या विस्थापित पाता है। इससे निजात के लिए टाटा, एस्सार, एन.एम.डी.सी. शराब, खनिज और जंगल के ठेकेदार या चिदंबरम योजना के अनुसार बस्तर चुने हुए पांच हजार नौजवानों को महानगरों में ट्रेनिंग के नाम पर गुम कर देना नहीं है।
बदहाल नक्सल वाद जैसे राजनीतिक आदोलन के नाम पर हत्यारों का एक गिरोह डाकुओं की तरह जंगलों में हुकूमत कर रहा है। वह बीच बीच में राज्य-व्यवस्था को चुनौती भी देता रहता है। लोकतांत्रिक राज्य की अपनी प्रतिबद्धताएं, मर्यादाएं और न्याय तंत्र होते हैं। नक्सली हिंसक पशुओं की तरह मनुष्यता का ही शिकार कर रहे हैं। इसे समर्थन कैसे दिया जा सकता है? यह एक राज्यद्रोह की चुनौती है। यह संविधान को धमकी देने का विध्वंसक ऐलान है। इसका मुकाबला किए बिना लोकतंत्र, संविधान और राज्य संस्थाएं इतिहास में अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर पाएंगी। जब युद्ध चल रहा हो तो संविधान जनित संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर सरकारों को बदलने का कोई सवाल नहीं है।
पुलिस तंत्र की असफलता या धीरे धीरे मिलने वाली सफलता पर विचार हो ही रहा होगा। यह वक्त सभी विचार धाराओं के सम्मिलित प्रयास से राज्य में उस वातावरण को बनाए जाने से है जिससे नक्सलवाद के नासूर को सुखाया जा सके। नक्सलवाद को वैचारिक फोकस में रखने के बदले आदिवासी विकास और संरक्षण नागरिक चिन्‍ता का विषय होना चाहिए। यह देश केवल सभ्य शहरी समाजों का नहीं है। भारत के वनवासी उतने ही संवैधानिक और नागरिक अधिकारों से निर्मित हैं जो तथाकथित कुलीन लोगों को उपलब्ध हैं। नक्सली आज निर्दोष नागरिकों के जीने के संवैधानिक अधिकारों पर डाका डाल रहे हैं। यह बौद्धिक प्रतिकार का भी वक्त है। समाज कैसे निरपेक्ष रह सकता है? जो मारे जा रहे हैं, वे भी आदिवासी हैं, गरीब हैं, सिपाही हैं, अनजान देश-भाई हैं। नक्सली अब कथित अन्यायी अधिकार तंत्र से लडऩे के बाद खुद अधिकार तंत्र के रूपक बन रहे हैं।
समाज चुप क्यों है? सरकार तो समाज का प्रतिनिधित्वत करती है। उसे समाज के जीवंत समर्थन की जरूरत होगी। यह वक्त नक्सली और सरकारी हिंसा को तराजू के दो पलड़ों पर रखकर तौलने का भी नहीं है। गांधी को बार बार याद करने वाले जानते होंगे कि बापू ने जरूरत होने पर हिंसा को समाप्त करने के लिए जायज बड़ी हिंसा की पैरवी की थी। यह समय छत्तीसगढ़ के लिए सबसे बड़ी चुनौती लेकर आया है। एक दूसरे की ओर दोष की उंगली उठाए बिना नक्सल चुनौती से प्रदेश और उनके चंगुल में फंसे आदिवासियों को बचाने का यही वक्त है। पूर्व मुख्यमंत्रियों, गृहमंत्रियों, प्रभारी मंत्रियों, अधिकारियों वगैरह का अनुभव परीक्षा की घड़ी में है। वक्तव्य बहादुरों के बदले मैदानी बहादुरों की हौसला अफजाई का यही समय है। मैंने नक्सलियों और नक्सल समर्थकों की बीसियों कविताएं पढ़ी हैं। नक्सलवाद के विरोध में उतनी कविताएं नहीं। क्या नक्सली-हत्या में मारे गए सिपाही और निर्दोष नागरिक कवियों की संवेदना का विषय नहीं हैं?
एक पक्षी युगल की बहेलिए ने हत्या? क्या कर दी, भारत का पहला डाकू आदि कवि में तब्दील हो गया। बस्तर की पहाड़ी मैना भी तो राज्य पक्षी है। उसकी बहेलिए हत्या कर रहे हैं। क्या मनुष्य की मृत्यु पशु- पक्षी की मौतों से कमतर है जो उनके समर्थन में कलमें खामोश रहेंगी? पुलिस या सेना की बंदूक का भौतिक प्रदर्शन समयबद्ध ऑपरेशन है। कलम की ताकत समयातीत होती है। निर्दोष नागरिकों के शव यही सवाल हमसे पूछ रहे हैं।

I am Animesh Tiwari,son of Mr. Sanjeeva Tiwari, presenting this post. Sorry for unicode conversion and typing mistakes

आलेख व चित्र छत्‍तीसगढ़ से साभार, उपर जो चित्र है वह अस्थिकलश का नहीं, विष्‍फोट में बिखर गए मानव मांस कलश का है।

9 comments:

  1. यही समय है एकता दिखाने का न कि एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहने का।

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  2. सही वक़्त पर सही चिंतन और चिंता ।

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  3. sahi.

    to bhaiya animesh tola mai ha bhai kahav ya fer bhatija te ha ghar me puchh ke decide kar le yar ;)
    fer aagu baat kar hu ki kon class me havas, thik he na?

    ;)

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  4. आदरणीय कनक जी,

    लेखक बिरादरी खामोश रहेगी। मास्को नें भले ही "चारा डालना" बंद कर दिया हो लेकिन अभी भी भारत में लाल-प्रकाशकों की ही गुटबंदी है जो शब्दों की जुगाली करने वालों को "लेखक" का तमगा देती है एसे में "महाश्वेताओं" और "अरुन्धतियों" से अलग लाईन पर लिखना "महान लेखक" बनने की राह में रोड़ा अटका सकता है। कैरियर खराब हो जायेगा कनक जी अगर हमारे लेखक खुल कर नक्सली आतंकवाद की भर्तसना करेंगे।

    बहुत से "महान लेखक/लेखिकायें" तो नक्सली आतंकवादियों की बी-टीम की तरह काम कर ही रहे हैं। मुझे कोई संदेह नहीं कि हिन्दी का लेखक अगर इसी तरह कछुए के खोल में ही जीता रहेगा तो एक दिन लेखन अपनी प्रासंगिकता ही खो देगा।

    इस महत्वपूर्ण बात को चर्चा का विषय बनाने के लिये आभार।

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  5. टीप से पूर्व :

    प्रिय अनिमेश ढेर सारा आशीष ...आपने बहुत मेहनत की ! बात समझ मे आ जाये तो टायपिंग की त्रुटिया मायने नही रखती !

    टीप :

    @कनक तिवारी जी
    समस्या पर आपका नज़रिया जितना साफ सुथरा है उतना ही धुंधला है उन लोगों / एजेंसियों का जो इसे सुलझाने के लिये नियत है ! या फिर इन एजेंसियों की मंशा और उसके निहितार्थ कुछ और ही है ( पैसा / सत्ता वगैरह वगैरह ) यह सही है कि कलम की ताकत समयातीत होती है किंतु भौतिक प्रदर्शन ने अपनी सारी ऊर्जा इस हिमाकत मे झोंक दी है कि समस्या सुलझाने मे उसका एकाधिकार / वर्चस्व बना रहे , फिर से कहूंगा कि निहितार्थ जो भी हों ! शायद इसे ब्यूरोक्रेटिक टेक-ओवर भी कह सकते है ! इस मुद्दे मे जनप्रतिनिधियो की बात करना व्यर्थ है ...एक तो वे सच्चे जनप्रतिनिधि हैं ही नही और अगर लोकतंत्र की लाज रखने के नाम पर उन्हे लोकसेवक / लोकशासक मान भी लिया जाये तो भी उनका वश केवल नौकरशाही से वशीभूत बने रहने तक सीमित है ! खैर विषय यह है कि इतिहास , कलम के मौन पर जो भी लानत मलामत करे उसके साथ ही साथ उसे ब्यूरोक्रेटिक टेक-ओवर का अभिलेखीकरण भी करना होगा !
    मेरा व्यक्तिगत मत यह है कि नक्सलवाद पर खुलेपन के साथ विचार विमर्श का स्पेस ही नही छोड़ा गया है यहां कलम की रौशनाई सोखने के इंतज़ाम पुख्ता है ! ऐसा होना तो नही चाहिये था पर शायद कलम जन सुरक्षा अधिनियम के भय से पीली पड़ गई है !

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  6. इसमें काफी सार्थक बाते आ गई हैं,"महान लेखक/लेखिकायें" तो नक्सली आतंकवादियों की बी-टीम की तरह काम कर ही रहे हैं। बात सही है पर सौ फीसदी नही,जहां ताबूत,हथियारो और खनिज संपदा सबकी दलाली हो ,सुरक्षा पैकेज की भी बन्‍दर बाट हो ,दिल्‍ली,रायपुर में बैठ कर मातम का इन्‍तजार करना ...अरे लोकलुभावनो कही तो कठोरता का परिचय दो......या छोड तो .....
    सतीश कुमार चौहान

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  7. जघन्य व निन्दनीय कृत्य ।

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  8. आपने कहा ..... गांधी को बार बार याद करने वाले जानते होंगे कि बापू ने जरूरत होने पर हिंसा को समाप्त करने के लिए जायज बड़ी हिंसा की पैरवी की थी।

    यह उद्हरण हमेशा के लिए नोट किया गया, सनद रहे वक्‍त पे काम आवे.

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  9. ये कलम आतंकवादियों व गद्दारों ने खरीद ली है यह कलम अब आतंकवादियों को बचाने व सुरक्षाबलों और भारतीय संसकृति को गाली निकालने के लिए ही चलती है

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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19 May, 2010

बेकसूरों की हत्याओं पर कलम का मौन दर्ज करेगा इतिहास : कनक तिवारी


बस्तर में सुकमा-दंतेवाड़ा मार्ग पर यात्री बस को बारूदी सुरंग विस्फोट से उड़ाकर नक्सालियों ने निर्दोष नागरिकों सहित 36 लोगों (संख्या परिवर्तनीय है) की निर्मम हत्या कर दी। यह एक माह में तीसरी बड़ी घटना है। राज्य का पुलिस और खुफिया तंत्र सवालों के घेरे में है। पूरी सरकारी मशीनरी बेबस और लाचार तो नहीं लेकिन किंकर्तव्यविमूढ़ ज़रूर नजर आ रही है। केन्द्र सरकार का गृह मंत्रालय भी पसोपेश में नजर आता है। प्रदेश के गृहमंत्री सेना को बुलाने की मांग करते हैं। मुख्यमंत्री और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) उनसे सहमत नहीं हैं। केद्रीय गृह मंत्री वायु सेना के सीमित उपयोग की बात करते हैं। वायु सेनाध्यक्ष की अपनी ढपली है। म.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्वविजय सिंह केद्रीय गृह मंत्री को इस मामले में केवल राज्य सरकार को सहायता देने तक सीमित रहने की सलाह देते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी सीमित समय के लिए राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रहे हैं। राज्य कांग्रेस पार्टी विधान सभा का विशेष अधिवेशन बुलाए जाने की मांग कर चुकी है। राज्यपाल अनिर्णय में हैं। प्रधानमंत्री नक्सल वाद को सबसे बड़ा आंतरिक खतरा करार दे चुके हैं। गांधीवादी शांति यात्री भी असफल अभियान से लौट चुके हैं। उकसाए गए थोड़े से युवकों और बस्तर के व्यापारियों ने उनके खिलाफ पुलिस की सांठगांठ से विरोध करने की पिकनिक भी कर ली। मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की तत्काल प्रतिक्रिया देखने में नहीं आई है।
बुद्धिजीवी, लेखक, कवि, कलाकार, संस्कृति कर्मी चुप हैं। कुछ निर्विकार हैं, कुछ अल्पसूचित हैं, कुछ सहमे हुए हैं, कुछ भाग्यवादी हैं, कुछ हलचल में हैं, कुछ सरकारी सूचनातंत्र पर निर्भर हैं, कुछ टी.वी. चैनलों से चिपके हुए हैं, ब्रेक होने पर इंडियन आयडल देख लेते हैं। कुछ सरकारी बुद्धिजीवी अपने राजनीतिक आकाओं के महिमा मंडन में व्यस्त हैं। अफसरी बुद्धि चातुर्य के किस्से अलग गढ़े जा रहे हैं। सामचार पत्रों में खबरों के लिए जगह है, विचारों के लिए नहीं। सेक्स, दुर्घटना, डकैती, हत्या , भ्रष्टाचार, क्रिकेट, फिल्मी लटकों झटकों के तड़कों की प्रथम पृष्ठ की खबरों का मुकाबला बहुराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापनों से ही होता है। वहां भी एम.डी. साहब या जी.एम. साहब सम्पादकों के ऊपर हैं। वे अधिकतर मंत्रियों और अफसरों के दीवानखानों, निजी पार्टियों और सरकारी उडऩ खटोले में व्यस्त होते हैं।
ये तस्वीर की मोटी मोटी रेखाएं हैं। बारीक अभिव्यक्तियां तो जनता को पता ही नहीं होतीं। बस्तर का क्या भविष्य है-यह बुनियादी सवाल है। नक्सल वाद नासूर नहीं नासूर का एक कारण है। वैश्विक पूंजीवाद के प्रसार के कारण बस्तर जैसे देश के सभी आदिवासी अर्थात वन संस्कृति के इलाके नक्सलियों के हत्थे चढ़ते जा रहे हैं। जंगल नक्सलियों के छिपने के स्थान हैं। आदिवासी वहां सदियों से रह रहे हैं। नक्सली उनके मसीहा बनकर नहीं आए हैं। उनकी तो इतने सीधे सादे, मन- वचन-कर्म के प्रति ईमानदार आदिवासियों को पाकर लॉटरी खुल गई है। विनाश का मूल कारण तो विकास की वह थ्योरी है जो व्हाइट हाउस, वर्ल्ड बैंक या 10 डाउनिंग स्ट्रीट वगैरह से पैदा होकर नई दिल्ली की संसद के मार्फत बस्तर जैसे जंगलों तक विस्तृत हो गई है।
पिछले चालीस पचास बरस से राज्य और केद्र सरकारें आदिवासियों पर नीयतन या लापरवाही से अत्याचार कर रही हैं। उनके प्राकृतिक, संवैधानिक, जातीय और नागरिक अधिकार कम किए जा रहे हैं। कूढ़मगज सरकारी सोच ने अंगरेजों के बनाए गए जालिम कानूनों जैसे भारतीय वन अधिनियम 1927, भू अर्जन अधिनियम 1894, भारतीय सुखभोग अधिनियम, पंचायत और भू राजस्व कानून वगैरह को आदिवासी जरूरतों, माली हालत, संस्कृति आदि के अनुकूल नहीं बनाया है। अलबत्ता उनसे जंगल का परिवेश, संरक्षण, उपयोगिता आदि को कम ही किया जाता रहा। तथाकथित जातीय आरक्षण से भी आदिवासियों का एक मलाईदार तबका ही तैयार हो पाया जो राजनीति के ब्राम्हण ठाकुर मालिकों के दरबारी की भूमिका में मुस्तैद रहा। आज बाजार का आदिवासी खुद को ठगा हुआ या विस्थापित पाता है। इससे निजात के लिए टाटा, एस्सार, एन.एम.डी.सी. शराब, खनिज और जंगल के ठेकेदार या चिदंबरम योजना के अनुसार बस्तर चुने हुए पांच हजार नौजवानों को महानगरों में ट्रेनिंग के नाम पर गुम कर देना नहीं है।
बदहाल नक्सल वाद जैसे राजनीतिक आदोलन के नाम पर हत्यारों का एक गिरोह डाकुओं की तरह जंगलों में हुकूमत कर रहा है। वह बीच बीच में राज्य-व्यवस्था को चुनौती भी देता रहता है। लोकतांत्रिक राज्य की अपनी प्रतिबद्धताएं, मर्यादाएं और न्याय तंत्र होते हैं। नक्सली हिंसक पशुओं की तरह मनुष्यता का ही शिकार कर रहे हैं। इसे समर्थन कैसे दिया जा सकता है? यह एक राज्यद्रोह की चुनौती है। यह संविधान को धमकी देने का विध्वंसक ऐलान है। इसका मुकाबला किए बिना लोकतंत्र, संविधान और राज्य संस्थाएं इतिहास में अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर पाएंगी। जब युद्ध चल रहा हो तो संविधान जनित संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर सरकारों को बदलने का कोई सवाल नहीं है।
पुलिस तंत्र की असफलता या धीरे धीरे मिलने वाली सफलता पर विचार हो ही रहा होगा। यह वक्त सभी विचार धाराओं के सम्मिलित प्रयास से राज्य में उस वातावरण को बनाए जाने से है जिससे नक्सलवाद के नासूर को सुखाया जा सके। नक्सलवाद को वैचारिक फोकस में रखने के बदले आदिवासी विकास और संरक्षण नागरिक चिन्‍ता का विषय होना चाहिए। यह देश केवल सभ्य शहरी समाजों का नहीं है। भारत के वनवासी उतने ही संवैधानिक और नागरिक अधिकारों से निर्मित हैं जो तथाकथित कुलीन लोगों को उपलब्ध हैं। नक्सली आज निर्दोष नागरिकों के जीने के संवैधानिक अधिकारों पर डाका डाल रहे हैं। यह बौद्धिक प्रतिकार का भी वक्त है। समाज कैसे निरपेक्ष रह सकता है? जो मारे जा रहे हैं, वे भी आदिवासी हैं, गरीब हैं, सिपाही हैं, अनजान देश-भाई हैं। नक्सली अब कथित अन्यायी अधिकार तंत्र से लडऩे के बाद खुद अधिकार तंत्र के रूपक बन रहे हैं।
समाज चुप क्यों है? सरकार तो समाज का प्रतिनिधित्वत करती है। उसे समाज के जीवंत समर्थन की जरूरत होगी। यह वक्त नक्सली और सरकारी हिंसा को तराजू के दो पलड़ों पर रखकर तौलने का भी नहीं है। गांधी को बार बार याद करने वाले जानते होंगे कि बापू ने जरूरत होने पर हिंसा को समाप्त करने के लिए जायज बड़ी हिंसा की पैरवी की थी। यह समय छत्तीसगढ़ के लिए सबसे बड़ी चुनौती लेकर आया है। एक दूसरे की ओर दोष की उंगली उठाए बिना नक्सल चुनौती से प्रदेश और उनके चंगुल में फंसे आदिवासियों को बचाने का यही वक्त है। पूर्व मुख्यमंत्रियों, गृहमंत्रियों, प्रभारी मंत्रियों, अधिकारियों वगैरह का अनुभव परीक्षा की घड़ी में है। वक्तव्य बहादुरों के बदले मैदानी बहादुरों की हौसला अफजाई का यही समय है। मैंने नक्सलियों और नक्सल समर्थकों की बीसियों कविताएं पढ़ी हैं। नक्सलवाद के विरोध में उतनी कविताएं नहीं। क्या नक्सली-हत्या में मारे गए सिपाही और निर्दोष नागरिक कवियों की संवेदना का विषय नहीं हैं?
एक पक्षी युगल की बहेलिए ने हत्या? क्या कर दी, भारत का पहला डाकू आदि कवि में तब्दील हो गया। बस्तर की पहाड़ी मैना भी तो राज्य पक्षी है। उसकी बहेलिए हत्या कर रहे हैं। क्या मनुष्य की मृत्यु पशु- पक्षी की मौतों से कमतर है जो उनके समर्थन में कलमें खामोश रहेंगी? पुलिस या सेना की बंदूक का भौतिक प्रदर्शन समयबद्ध ऑपरेशन है। कलम की ताकत समयातीत होती है। निर्दोष नागरिकों के शव यही सवाल हमसे पूछ रहे हैं।

I am Animesh Tiwari,son of Mr. Sanjeeva Tiwari, presenting this post. Sorry for unicode conversion and typing mistakes

आलेख व चित्र छत्‍तीसगढ़ से साभार, उपर जो चित्र है वह अस्थिकलश का नहीं, विष्‍फोट में बिखर गए मानव मांस कलश का है।
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