ब्लॉग छत्तीसगढ़

04 March, 2010

आभासी दुनिया के दीवाने और भूगोल के परवाने

पिछले दिनों ब्लॉगजगत को आभासी दुनिया करार देने के लिये काफी जद्दोजहद की गई. तब तात्कालीन परिस्थितियों एवं विषय को देखते हुए हम इससे असहमत थे. इतने दिनों हिन्दी ब्लॉग में हासिये  मे ही सही, रमें  और जमें रहने से हमारा अनुभव भी यही था. इसी आधार पर हमनें पूर्व में एक पोस्ट भी लिखा था. इस विषय पर ठंडे पढ गए विमर्श को पुनः उठाने के पीछे मेरा मकसद यह स्पष्ट करना है कि भूगोल आधारित समूह या आभासी समूह, कौन हमारे हितों और आकांक्षाओं का ध्यान रखते हैं.

पिछले दिनों भाई रविन्द्र प्रभात जी नें अपने ब्लॉग परिकल्पना में परिकल्पना फगुनाहट सम्मान- 2010 के लिए रचना आमंत्रित किए एवं इस तथाकथित आभासी दुनिया से अभिमत मंगाए गए जिसके आधार पर फगुनाहट सम्मान सर्वाधिक अभिमत प्राप्त कविता "जब फागुन में रचाई मंत्री जी ने शादी..." के कवि भाई श्री वसन्त आर्य जी को प्रदान किया गया. श्री वसन्त आर्य जी की रचना के समर्थन मे 36, श्री ललित शर्मा की रचना के समर्थन मे 30, श्री अनुराग शर्मा की रचना के समर्थन मे 08 वोट प्राप्त हुए.
   
सर्वाधिक मत प्राप्त कवि श्री वसन्त आर्य को 5000 रूपये का फगुनाहट सम्मान - 2010 प्रदान किया गया और हमारे भूगोल के भाई ललित शर्मा को उपविजेता का पुरस्कार दिया गया. आशावादी ब्लॉगर भाई लोग कहते हैं कि हिन्दी ब्लॉगों की संख्या 20 हजार हो गई है और वोट पडे मात्र  74. जय हो आभासी दुनिया! चलिये भूगोल आधारित दुनिया की भी खबर ले लेते हैं. छत्तीसगढ के उपलब्ध डाटा बेस के अनुसार इस भूगोल के समूह मे लगभग 150 ब्लॉगर हैं. जिसमे से सक्रिय ब्लॉगर लगभग 50 तो होंगे ही फिर भी ललित भाई की कविता के लिये वोट पडे 30. इसमे भौगोलिक और आभासी  दोनो दुनिया के वोट थे. मेरे अनुसार से भाई ललित शर्मा जी की कविता ही इस पुरस्कार के हकदार थी. इसके बावजूद उन्हें उपविजेता पुरस्कार से ही संतोष करना पडा. क्योंकि अधिकाधिक ब्लॉगरो नें वोट नहीं किया. कहां गया भूगोल का समूह - आभासी दुनिया का आभास ?

ये कैसी दुनिया है,  यह तो पता चल गया. साथ ही यह भी पता चल गया कि टिप्पणियों में फोनों में हम लाख साथ देने, वैचारिक साम्यता की बाते करते हों पर वोट डालने की बात आती है तो हम तटस्थ हो जाते हैं वोट ही नहीं डालते या एक पुरानी कहानी की तरह व्यवहार करते हैं (राजा के गड्ढे में दूध डालने के आदेश पर रात में सभी लोगों नें पानी डाला कोई दो चार लोगों नें ही दूध डाला, सब सोंचते रहे कि मेरे बस पानी डालने से क्या होगा सभी लोग तो दूध डाले होंगें और जब सुबह देखा गया तो वहां पानी ही पानी था.)  इस आभासी दुनिया के दीवाने और भूगोल के परवाने सभी सोंचते रहे कि और लोग दूध डालेंगें, पर ऐसा हुआ नहीं.

संजीव तिवारी

9 comments:

  1. हम तो अपनों के लिए बहुत वोट डालते हैं.... बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट....

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  2. दूध और पानी वाली कथा का यह अच्छा उपयोग है । इस कथा को हम जीवन भर इस आभासी दुनिया मे ही नही असल दुनिया मे भी इस्तेमाल करते हैं । जैसे किसी कवि ने लिखा भी है ...सब चाहते है कि देश के लिये कोई बेटा शहीद हो बस उनके घर से नही हो ।

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  3. भाई संजीव वाकई आपने पते की बात कही है. जहां तक वोटिंग का प्रश्न है मुझे तो यही लगा कि या तो हम केवल "स्वान्तः सुखाय" स्वतः सुख या केवल सम्मान पाने की लालसा रखते हैं. कोई बात नहीं या तो उस लायक अपने को बनाएं. नहीं बना पाए तो कम से कम जो अच्छे रचनाकार हैं उनको जरा सम्मान दे देंगे तो क्या बिगड़ जाएगा. लेकिन पता नहीं हम क्यों हिचकते हैं. आपने इस बात को यहाँ प्रकट कर अच्छा काम किया.

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  4. संजीव भाई उस वक़्त सोचा था कि आभास और भूगोल के मुद्दे पर अपने की बोर्ड को कष्ट दिया जाये फिर लगा...जाने दो ! वर्ना कुछ दिल टूट जायेंगे ! इस केस में इतन॓ शानदार आंकड॓ जुटाये आपने ...इसके बावज़ूद उम्मीदें ...भला क्यों ? और किससे ? आपके लिए निदा फ़ाज़ली याद आ गये..."दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहां होता है सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला " :)

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  5. ये तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया!

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  6. बात तो विचारणीय है.

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  7. संजीव भाई,
    आपने विल्कुल सही मुद्दे उठाये हैं . यह कटु सत्य है की सार्वजनिक टिपण्णी में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले कई ब्लोगर वोट डालने के नाम पर पीछे रह जाते । जहां तक भूगोल का प्रश्न है मैं उस भूगोल से ताल्लुक नहीं रखता , फिर भी ललित शर्मा जी के गीत से प्रभावित होकर मैंने प्रथम नामित रचनाकार होने का गौरव उन्हें प्रदान किया !आप की बात विचारणीय है जिस परिक्षेत्र में १५० ब्लोगर हैं वहां से केवल ३० ब्लोगर का वोट मिलना आश्चर्यजनक है !इससे भी ज्यादा आश्चर्य का विषय तो यह है कि पूरे भारतवर्ष से केवल -70 वोट प्राप्त हुए हैं तथा ०4 वोट विदेशों से...!इस दिशा में सूर्यकांत गुप्ता जी ने सही कहा है कि -जहां तक वोटिंग का प्रश्न है मुझे तो यही लगा कि या तो हम केवल "स्वान्तः सुखाय" स्वतः सुख या केवल सम्मान पाने की लालसा रखते हैं. कोई बात नहीं या तो उस लायक अपने को बनाएं. नहीं बना पाए तो कम से कम जो अच्छे रचनाकार हैं उनको जरा सम्मान दे देंगे तो क्या बिगड़ जाएगा. लेकिन पता नहीं हम क्यों हिचकते हैं.

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  8. संजीव भाई,
    आपकी सोच ठीक है, इसी तरह लोगों को जगाना होगा.
    राजेन्दऱ सिंह ठाकुर

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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