ब्लॉग छत्तीसगढ़

03 February, 2010

मेहनत कश के लिए रूखी सूखी और आराम करने वालों के लिए हलवा पूरी - 1

बंधु राजेश्वर राव खरे जी मूलत: व्यंग्यकार है इस कारण उन्होने अपने इस कविता संग्रह का नाम भी व्यंग्यात्मक रखा है, हम यहॉं इस संग्रह में से कुछ कविताओ का हिन्दी अनुवाद क्रमश: प्रस्तुत करेंगे.  आज उनकी माटी वन्दना प्रस्तुत कर रहे है आगे उनके व्यंग्यात्मक लहजे की कविताओ को भी प्रस्तुत करेंगे.

इससे वर्तमान मे छत्तीसगढी भाषा में लिखी जा रही कविताओ से आप परिचित  हो सकेंगे. मूल छत्तीसगढी कविता आप गुरतुर गोठ मे पढ सकते है.


माटी वन्दना

मिट्टी की हमारी कुटिया
मिट्टी हमारा रोजगार है
जय हो मॉं धरती मॉं
माटी में बरसे प्रेम की धार है

मिट्टी मे हम पैदा हुए बढे
मिट्टी हमारी जिन्दगी है
मिट्टी जन्म और कर्म की संगिनी है
मिट्टी ही हमारी अन्नपानी है
मिट्टी ही सबके तन - मन का श्रृंगार है

मिट्टी से नंदी बैल बना
मिट्टी से बनी चक्की और लोटा
मिट्टी का गणेश और दुर्गा
छत्तीसगढ मे बारहो मास मिट्टी का ही त्यौहार है

मिट्टी से ही बना चना फोडने का पात्र
और खाना बनाने का पात्र
दूध गरम करने का और दूध दूहने का पात्र
पानी की मटकी, घर का छप्पर, हन्डी
ढक्कन, दीप-प्रदीप
इन सबके रचने वाले कुम्हार हैं

जय हो मॉं धरती मॉं
माटी में बरसे प्रेम की धार है

मूल छत्तीसगढी कविता - बंधु राजेश्वर राव खरे
हिन्दी अनुवाद - संजीव तिवारी 

9 comments:

  1. संजीव जी बहुत सुन्दर शब्दों की धार बरस रही है इस कविता से धन्यवाद इसे पढवाने के लिये और अनुवाद के लिये

    ReplyDelete
  2. बहुत बढ़िया रहा खरे जी को पढ़ना...आगे भी इन्तजार रहेगा.

    ReplyDelete
  3. बहुत बढ़िया रहा खरे जी को पढ़ना......


    नोट: लखनऊ से बाहर होने की वजह से .... काफी दिनों तक नहीं आ पाया ....माफ़ी चाहता हूँ....

    ReplyDelete
  4. bahut badhiya sanjeevji, sarthak prayas.

    ReplyDelete
  5. माटी बहुत आकर्षित करती है और उसपर सुन्दर कविता हो तो क्या कहने।

    पोस्ट के लिये धन्यवाद।

    (समस्या तब होती है जब अपनी जमीन, किसानी, खेती आदि की बात करते ही साम्यवादी उसपर अपना वर्चस्व जताने लगते हैं।)

    ReplyDelete
  6. खरे जी को पढ़वाने के लिए आभार!

    ReplyDelete
  7. मुझे अनुवाद,मूल रचना के पुनर्जन्म सा लगता है ! इस मायने में आपका काम,तारीफ के क़ाबिल है !

    ReplyDelete
  8. bahut dino k baad khare ki kitab aayi...badhaai.aur uski kavita ka sugghar anhuvaad karane k liye sanjiv , tumko bhi badhai...

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

loading...

Popular Posts