जगमग छत्तीसगढ़ पर संजीव तिवारी एवं अतिथि कलमकारों के विचार
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उदंती.com मासिक पत्रिका वर्ष 1, अंक 6, जनवरी 2009
मुक्तिबोध की मशाल जलती रहे
हबीब का योग्य शिष्य : अनूप रंजन पांडेय
`सापेक्ष' के सपने सच होने लगे हैं (Sapeksh)
तुकबंदी व्यक्ति को कवि न सहीं भावनात्मक तो बनाती ही है
नये वर्ष का धूम धडाका और फोन की घंटी
नहीं बिखरा, अधिक निखरा, बस सघन हूं मैं .....
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