ब्लॉग छत्तीसगढ़

02 August, 2009

स्‍त्री का सबसे सुन्‍दर हिस्‍सा देह नहीं, उसकी भावना है.

मैं बहुत किशोरावस्‍था में ही कविता के प्रति आकर्षिक हो गया था और सौंदर्य के प्रति कविता में मैंनें कविता की उपमा दी है स्‍त्री से. क्‍योंकि वह सौंदर्य की प्रतिनिधि है.


सौंदर्य तो हिमालय के अंचल में पैदा होने के कारण मेरे घर का मेहमान रहा है, सदैव से. तो मैं यह कहना चाहता था कि भाई प्रेम की जो अवस्‍था आज है, जो स्थिति आज है, वह तो द्रोह से, मोह से, लांछन से, कर्दम से घिरी हुई है. हूं, वह कभी सार्थक होगी, मैने हमेशा स्‍त्री के लिये लिखा है् कि उसका हृदय तो तिजोरी में बंद है. उसको तो ऐसा होना चाहिये जैसे फूल अपने नाल से बंधा रहता है, वैसे स्‍त्री को अपने प्रियजन से, बंधा तो रहना चाहिये घर से, लेकिन अपने हृदय का सौरभ जैसे फूल सबों को देता है, वैसे भी स्‍त्री को अपनी भावना समस्‍त लोगों को देनी चाहिए जिससे कि भावना का आदान प्रदान हो सके. क्‍योंकि स्‍त्री का सबसे सुन्‍दर हिस्‍सा देह नहीं, उसकी भावना है.

अपनी कविता 'आत्मिका' की पंक्तियां 'कल्‍मष लांछन के कांटों में खिला प्रेम/ का फूल धरा पर/उसको छूना मौन भू-कर्दम में/ गिरना दुस्‍तर.' के संबंध में पूछे गए एक प्रश्‍न के उत्‍तर में महाकवि सुमित्रा नंदन पंत.

5 comments:

  1. बहुत सुंदर उद्धरण! एकदम सच्ची बात। भावना देह की कुरूपता को असीम सुंदरता में परिवर्तित कर देती है।

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  2. स्‍त्री का सबसे सुन्‍दर हिस्‍सा देह नहीं, उसकी भावना है. बहुत ही आदर्श बात कही है संजीव जी आप ने .
    - विजय

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  3. भावना का महत्त्व स्त्री पुरूष दोनों के लिए समान है।बहुत सुन्दर लिखा है।बधाई।

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  4. सही कहा जी। भावना देह पर वरीयता रखती ही है।

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  5. स्त्री के मन के भाव सुंदर होते हैं उसकी देह नहीं ... देह यदि सुंदर होती भी है तो सुंदर मन के कारन .. आपने बहुत सही लिखा की उसे अपने मन की खुशबू फूल के सौरभ की तरह फैलानी चाहिए बहुत कोमल बात कही

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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