ब्लॉग छत्तीसगढ़

05 June, 2008

तीन करोड ............. पर्यावरण दिवस का ये कैसा तोहफा

हैलो.... हैलो..... हॉं क्या हुआ ?, कहॉं का ..... बारसूर फीडर का ? ..... अरे बाप रे .....
बातें लम्बी चलती रही बीच बीच में कई कई बार फोन कटा और बातें चलती रही कि कहां कहां का लाईन ध्वस्त हुआ । एयर कंडीशन्ड रेस्तरॉं में भी पसीने से भर भर जा रहे माथे को एक अंगुली से बार बार पोंछते हुए वह अपने दोनों मोबाईलों से अपने मातहतों को निर्देश देता रहा एवं उधर से प्राप्त जवाबों से बार बार झुंझलाता रहा ।

'क्या हुआ साहब' मैंनें पूछा । यद्यपि फोन में हो रहे चर्चा के अनुसार मुझे बाकया सब समझ में आ गया था ।
'फिर उडा दिये यार बिजली टावर को ....' उसने बदहवासी के साथ कहा ।
मैनें पानी का गिलास उनकी ओर बढाते हुए उन्हें संयत रहने का निरर्थक सलाह दिया । वे उठने लगे ।
'सर खाना लग रहा है ।'

'नहीं भाई सब मूड खराब हो गया' उसने उठते हुए कहा और अपने साथ आये चार कर्मचारियों को भी चलने को कहा । मेरे खाने पर अनुनय नें उन्हें रोक लिया ।
'सर पिछली बार भी तो उडा दिये थे ना इन लोगों नें टावर को .... ब्लैक आउट ........ बस्तर ।' मैनें बात को कुछ सामान्य करने के उम्मीद से कहा ।
'हां यार कुछ वैसा ही बडा लफडा हुआ है ।' साहब नें कहा ।
'क्या मिलता होगा सर इन्हें बिजली टावरों को उडा कर ?' मैनें पूछा ।
'पिछली बार पांच करोड रूपये खर्च हुए थे, बिजली को पुन: बहाल करने में .... ' साहब नें बताया ।


'हॉं वो तो हुआ ही होगा ... पर इससे इन्हें क्या, सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुचाना आजकल विरोध का अच्छा माध्यम है ।' मैनें कहा ।
' यही तो तो मूल है बाबू, जानते हो पिछली बार जो बिजली की बहाली में पैसे खर्च हुए वे यदि अन्य इलाके में खर्च होता तो कितना होता ? .... ज्यादा से ज्यादा दो करोड ठेकेदारों के अधिकतम लाभ सहित ।'
'तो तीन करोड ? ..... ' मेरे आंखों में प्रश्न थे ।
' हॉं ये तीन करोड उन्हें ही गये, ठेकेदारों के माध्यम से ।'
मैंनें पनीर चिल्ली का प्लेट उनकी ओर सरकाया और चटनी अपनी ओर खींच लिया

4 comments:

  1. छत्‍तीसगढ़ के हालत वाकई चिंताजनक हैं....

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  2. तो आपने सिर्फ़ चटनी खाई ऐसा क्यो?? हा हा हा
    बाकि तो आपने बिना कुछ कहे बहूत कुछ कह दिया

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  3. सच, इतना बेबस हो जाता है इन्सान कि बस चटनी ही खाई जा सकती है. हालात चिन्ताजनक हैं छत्तीसगढ़ के. कब थमेगा यह.

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  4. तिवारी जी
    अच्छी कलम घसीटी है आपने।

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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