ब्लॉग छत्तीसगढ़

28 April, 2008

क्या पलाश के वृक्ष से एकत्रित किया गया बान्दा आपको अदृश्य कर सकता है?

18. हमारे विश्वास, आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक, कितने अन्ध-विश्वास?

- पंकज अवधिया


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क्या पलाश के वृक्ष से एकत्रित किया गया बान्दा आपको अदृश्य कर सकता है?


मुझे इस बात का अहसास है कि शीर्षक देखकर ही आप कहेंगे कि यह सब बेकार की बाते है क्योकि मि.इंडिया बनना तो सम्भव ही नही है। पर ग्रामीण अंचलो मे अभी भी इस तरह की बाते प्रचलित है। मै वर्षो से ग्रामीण हाटो मे जाता रहा हूँ। वहाँ जडी-बूटियो की दुकानो मे अक्सर जाना होता है। इन दुकानो मे बहुत बार दुर्लभ वनस्पतियाँ भी दिख जाती है। ऐसी ही दुर्लभ वनस्पतियाँ है पलाश नामक वृक्ष के ऊपर उगने वाले पौधे। इन्हे आम बोलचाल की भाषा मे बान्दा कहा जाता है पर विज्ञान की भाषा मे इन्हे आर्किड कहा जाता है।


पलाश के वृक्ष से वांडा प्रजाति के आर्किड को एकत्र कर लिया जाता है फिर इस दावे के साथ बेचा जाता है कि इसे विशेष समय मे धारण करने से अदृश्य हुआ जा सकता है। वशीकरण और शत्रुओ से निपटने के लिये भी इसके प्रयोग की सलाह दी जाती है। इस तरह के दावो मे कोई दम नही है यह हम सब जानते है पर जागरुकता नही होने के कारण ग्रामीण अंचलो मे अभी भी इसे खरीदा जाता है बडी मात्रा मे और ऊँचे दामो मे। आम लोगो के पैसे भी व्यर्थ जाते है और इस माँग के कारण देश के बहुत से जंगलो मे अब आर्किड मिल पाना मुश्किल होता जा रहा है। आर्किड प्रकृति मे विशिष्ट भूमिका निभाते है। पर्यावरण प्रदूषण के सूचक होते है। इनका रहना जंगल के स्वास्थ्य के लिये जरुरी है।


तंत्र से जुडे सस्ते और महंगे दोनो ही प्रकार के साहित्यो मे भी यह दावा मिलता है। इस तरह के गलत दावे करने वाले साहित्यो पर अंकुश लगाना जरुरी है।

2 comments:

  1. अंधविश्वास को बढावा देने वाले साहित्य को बंद कराया जाना चाहिए आपके इस विचार से सहमत हूँ . आपकी पोस्ट बहुत बढ़िया लगी . आप एक प्रकार से अपनी पोस्ट के माध्यम से अंधविश्वास के ख़िलाफ़ जनजागरण अभियान चला रहे है यह सब पढ़कर बड़ा सुखद लगता है . बहुत बहुत आभार

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  2. निराशा हुयी। कोई तो वनस्पति बतायें जो अदृष्य करती हो। कोई हो तो मजा आ जाये! :)

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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मुझे इस बात का अहसास है कि शीर्षक देखकर ही आप कहेंगे कि यह सब बेकार की बाते है क्योकि मि.इंडिया बनना तो सम्भव ही नही है। पर ग्रामीण अंचलो मे अभी भी इस तरह की बाते प्रचलित है। मै वर्षो से ग्रामीण हाटो मे जाता रहा हूँ। वहाँ जडी-बूटियो की दुकानो मे अक्सर जाना होता है। इन दुकानो मे बहुत बार दुर्लभ वनस्पतियाँ भी दिख जाती है। ऐसी ही दुर्लभ वनस्पतियाँ है पलाश नामक वृक्ष के ऊपर उगने वाले पौधे। इन्हे आम बोलचाल की भाषा मे बान्दा कहा जाता है पर विज्ञान की भाषा मे इन्हे आर्किड कहा जाता है।


पलाश के वृक्ष से वांडा प्रजाति के आर्किड को एकत्र कर लिया जाता है फिर इस दावे के साथ बेचा जाता है कि इसे विशेष समय मे धारण करने से अदृश्य हुआ जा सकता है। वशीकरण और शत्रुओ से निपटने के लिये भी इसके प्रयोग की सलाह दी जाती है। इस तरह के दावो मे कोई दम नही है यह हम सब जानते है पर जागरुकता नही होने के कारण ग्रामीण अंचलो मे अभी भी इसे खरीदा जाता है बडी मात्रा मे और ऊँचे दामो मे। आम लोगो के पैसे भी व्यर्थ जाते है और इस माँग के कारण देश के बहुत से जंगलो मे अब आर्किड मिल पाना मुश्किल होता जा रहा है। आर्किड प्रकृति मे विशिष्ट भूमिका निभाते है। पर्यावरण प्रदूषण के सूचक होते है। इनका रहना जंगल के स्वास्थ्य के लिये जरुरी है।


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