ब्लॉग छत्तीसगढ़

03 March, 2008

क्यो कहा जाता है कि जहरीले साँप को देखते ही रुमाल सहित सभी कपडे उस पर डाल देना चाहिये?

10. हमारे विश्वास, आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक, कितने अन्ध-विश्वास?

- पंकज अवधिया

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इस सप्ताह का विषय


क्यो कहा जाता है कि जहरीले साँप को देखते ही रुमाल सहित सभी कपडे उस पर डाल देना चाहिये?

यह बात न केवल छत्तीसगढ बल्कि देश के दूसरे हिस्सो मे भी कही जाती है। मै लम्बे समय से यह जानने उत्सुक रहा कि ऐसा क्यो कहा जाता है? क्या यह अन्ध-विश्वास है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण है? मै आधुनिक और पारम्परिक दोनो ही प्रकार के सर्प विशेषज्ञो से मिला। दोनो ही ने इस बात की पुष्टि की और वैज्ञानिक कारण बताया। उनका कहना है कि सर्प का पहला दंश विष से भरा होता है और यह कुछ ही पलो मे जान ले सकता है। दूसरे, तीसरे और इस तरह बाद के दंश कम जहर युक्त होते है। सर्प विशेषज्ञ कहते है कि पाँचवे दंश से मनुष्य पर बुरा प्रभाव नही पडता है। रुमाल आदि कपडे को जहरीले साँप के ऊपर डालने का यह उद्देश्य होता है कि वह लगातार इसे डस कर अपना जहर खो दे ताकि उससे आसानी से निपटा जा सके। देश के पारम्परिक विशेषज्ञ अलग तर्क देते है। उनका कहना है कि कपडे डालने से साँप शांत हो जाता है और आप मुसीबत से बच जाते है। पर ऐसा कब करना चाहिये? जब आमने-सामने की ऐसी स्थिति हो कि मुठभेड के अलावा कोई चारा न हो तब कपडे वाला उपाय अपनाया जा सकता है।


कुछ वर्ष पहले एक बारात मे नागपुर जाना हुआ। सुबह सब जागे तो पता चला कि बिस्तर मे साँप है। तुरंत एक वयोवृद्ध सज्जन ने उस पर कपडा डालकर उसे शांत किया फिर सबने मिलकर कपडे सहित उसे बाहर कर दिया। एक बार घर पर भी साँप निकला और किचन के सिंक पर कुँडली मारकर बैठ गया। अब उसे निकाले तो निकाले कैसे। तब हमने भी कपडे वाला उपाय अपनाया तो वह शांत हो गया। बाद मे बाहर से लोगो को बुलाकर उसे बाहर किया।


आजकल हम साँपो के क्षेत्र मे अतिक्रमण कर रहे है और यही कारण है कि हमारी उनसे अक्सर मुलाकात हो जाती है। ज्यादातर लोग न चाहते हुये भी उन्हे मार देते है। मुझे लगता है कि उन आसान तरीको के प्रचार-प्रसार की जरुरत है जिनकी सहायता से हम इन्हे सुरक्षित ढंग़ से बाहर कर सकते है। मनुष्यो और साँपो दोनो ही का बचा रहना जरुरी है उस धरती पर।


अगले सप्ताह का विषय़


क्या बारहसिंघे के सींगो से बना ताबीज पहनने से साँप नही काटता?

6 comments:

  1. पंकज जी आप के जहां से बहुत सी जान कारी मिलती हे,जेसा कि आज के लेख से.

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  2. पंकजजी,
    इस जानकारी के लिये धन्यवाद, अगली प्रविष्टी का इन्तजार रहेगा ।

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  3. तर्क संगत प्रतीत होती है जानकारी। धन्यवाद।

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  4. सांपों से वैसे ही हवा होती है अपनी तो ;)

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  5. अच्छा हुआ जो आपने ये तरीका बता दिया। अब अगर कभी सांप निकलेगा और अगर हम डरे नही तो इसे आजमा कर देखेंगे।

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  6. Sir, u had written to me asking to reproduce photos of Late Maharaja Pravir Chandra Bhanjdeo in your blog.. You maydo so. regards.

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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यह बात न केवल छत्तीसगढ बल्कि देश के दूसरे हिस्सो मे भी कही जाती है। मै लम्बे समय से यह जानने उत्सुक रहा कि ऐसा क्यो कहा जाता है? क्या यह अन्ध-विश्वास है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण है? मै आधुनिक और पारम्परिक दोनो ही प्रकार के सर्प विशेषज्ञो से मिला। दोनो ही ने इस बात की पुष्टि की और वैज्ञानिक कारण बताया। उनका कहना है कि सर्प का पहला दंश विष से भरा होता है और यह कुछ ही पलो मे जान ले सकता है। दूसरे, तीसरे और इस तरह बाद के दंश कम जहर युक्त होते है। सर्प विशेषज्ञ कहते है कि पाँचवे दंश से मनुष्य पर बुरा प्रभाव नही पडता है। रुमाल आदि कपडे को जहरीले साँप के ऊपर डालने का यह उद्देश्य होता है कि वह लगातार इसे डस कर अपना जहर खो दे ताकि उससे आसानी से निपटा जा सके। देश के पारम्परिक विशेषज्ञ अलग तर्क देते है। उनका कहना है कि कपडे डालने से साँप शांत हो जाता है और आप मुसीबत से बच जाते है। पर ऐसा कब करना चाहिये? जब आमने-सामने की ऐसी स्थिति हो कि मुठभेड के अलावा कोई चारा न हो तब कपडे वाला उपाय अपनाया जा सकता है।


कुछ वर्ष पहले एक बारात मे नागपुर जाना हुआ। सुबह सब जागे तो पता चला कि बिस्तर मे साँप है। तुरंत एक वयोवृद्ध सज्जन ने उस पर कपडा डालकर उसे शांत किया फिर सबने मिलकर कपडे सहित उसे बाहर कर दिया। एक बार घर पर भी साँप निकला और किचन के सिंक पर कुँडली मारकर बैठ गया। अब उसे निकाले तो निकाले कैसे। तब हमने भी कपडे वाला उपाय अपनाया तो वह शांत हो गया। बाद मे बाहर से लोगो को बुलाकर उसे बाहर किया।


आजकल हम साँपो के क्षेत्र मे अतिक्रमण कर रहे है और यही कारण है कि हमारी उनसे अक्सर मुलाकात हो जाती है। ज्यादातर लोग न चाहते हुये भी उन्हे मार देते है। मुझे लगता है कि उन आसान तरीको के प्रचार-प्रसार की जरुरत है जिनकी सहायता से हम इन्हे सुरक्षित ढंग़ से बाहर कर सकते है। मनुष्यो और साँपो दोनो ही का बचा रहना जरुरी है उस धरती पर।


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