2008/03/07

ओह ! भिलाई तुम कितनी खूबसूरत हो

संदर्भ : स्वर्ण जयन्ती वर्ष

ओह ! भिलाई तुम कितनी खूबसूरत हो : विनोद साव


यह वर्ष भिलाई का स्वर्ण जयन्ती वर्ष है। 4 Feb.' 1959 को सोवियत संघ के सहयोग से भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना हुई थी। भिलाई के साथ साथ राउरकेला भी अपनी स्थापना के पचास बरस पूरे कर रहा है। तब नेहरु के नेतृत्व में देश औद्योगिक विकास के लिए कसमसा रहा था और प्रथम प्रधानमंत्री का यह सपना था कि इस कसमसाहट को सार्वजनिक उपक्रमों की ज्यादा से ज्यादा स्थापना कर दूर किया जाए और इस देश को त्वरित विकास की राह पर ले जाया जाए। कुछ दशकों बाद जब नेहरु का यह हिन्दुस्तान विश्व के दस बड़े औद्योगिक देशों में शुमार हो गया। तब ये मान भी लिया गया कि उस स्वप्नद्रष्टा के सपने सचमुच पूरे हुए। नेहरु के उस सपने को संजोकर रखा भिलाई में उन अधिकारियों एवं कार्मिकों ने जिन्होंने इस इस्पात उद्योग की बुनियाद रखी थी। फिर पहले लौह उत्पादन से लेकर आज तक एक ऐसी कार्यसंस्कृति का निर्माण किया जिससे औद्योगिक विकास के एजेन्डा में `वर्क कल्चर` नाम का सिन्ड्रोम जमकर चर्चा में आया। भिलाई की यही वर्क कल्चर देश के सभी औद्योगिक संगठनों और घरानों के लिए अनिवार्य माना जाने लगा। तब इस देश के औद्योगिक विकास के सपनों के सागर में भिलाई एक लाइट हाउस बनकर सामने आया। इस्पात बनाने वाले औद्योगिक संगठनों के अतिरिक्त उद्योग के दूसरे क्षेत्र भी थे जो अपनी स्थापना के तुरन्त बाद भिलाई की कार्यप्रणाली का अवलोकन करने आते रहे और इसकी व्यवस्थित कार्यशैली को आत्मसात कर अपने यहां भी अमल में लाने को प्रेरित होते रहे।

उत्पादन के कितने ही कीर्तिमानों को तोड़ने और फिर नये कीर्र्तिमानों को गढ़ने की निरन्तर कवायद करने वाले भिलाई के निष्पादन कार्यो की जानकारी तो जब तब समाचार पत्रों और दूसरे प्रचार माध्यमों से होती रही है। यहां भिलाई की कुछ ऐसी खूबियों की चर्चा जरुरी होगी जो उसकी अपनी निजी खूबियां हैं और जिनके लिए भी भिलाई हर ओर से शाबाशी लेता आया है।



यह अविभाजित मध्यप्रदेश में भोपाल के बाद सबसे सुन्दर शहर माना जाता था। और अब छत्तीसगढ़ में तो भिलाई का आकर्षण वैसा ही है जैसे देशवासियों के लिए मुम्बई का आकर्षण। उत्तर से दक्षिण तक बसे लगभग एक हजार किलोमीटर लम्बे इस छत्तीसगढ़ राज्य के सुदूर अंचलों में भिलाई को देख लेने की छटपटाहट हमेशा दिल में रहती है। अपनी इस आस और प्यास को लेकर छत्तीसगढ़ का मानस अपनी लोकबोली में भिलाई के आकर्षण को अपने गीतों में शामिल कर गाया भी करता है। भिलाई की धमनभटि्ठयों की लपलपाती अग्निशिखा और कारखाने व शहर की बिजलियां कोसों दूर तक आधी सदीं से जगमगाती आ रही हैं। इस चमक को रोज रोज अपने गांवों से निहारते ग्रामवासी के मन में भिलाई दर्शन की ललक हमेशा बरकरार रहती है। वे भिलाई के कारखाने, इसके मैत्री गार्डन और यहां के व्यावसायिक परिसर सिविक सेन्टर के बारे में कितनी ही गाथाएं लोगों से बरसों से सुनते आ रहे हैं। भिलाई के रंगीन फौव्वारों से सुसज्जित चौराहों और कतारबद्ध खड़े हरे पेड़ों के किनारे बसी साफ सुथरी चौड़ी सड़कों के साथ इसके सुन्दर नगर विन्यास के मनोहारी चित्र अखबारों में बरसों से देखते आ रहे हैं। भिलाई की कल्पना उनके मन में इन्द्रपुरी की तरह होती है। तब भिलाई के दर्शन कर नैनसुख प्राप्त कर लेने की उनकी उद्दाम इच्छा उन्हें कितना रोमांचित करती होगी इस दशा की केवल कल्पना ही की जा सकती है। गांव के ऐसे कितने ही उत्साही जन जो भिलाई को देख पाते हैं एकबारगी उन्हें लगता है मानों कोई स्वप्न सुन्दरी उन्हें मिल गई हो।


यद्यपि सार्वजनिक उपक्रमों और कारखानों को अपनी धरती पर बसाने वाले देश में ऐसे कई सुन्दर और व्यवस्थित शहर हैं पर दूसरे इलाके से आने वाला इन्सान भी भिलाई की धरती पर कदम रखते ही सुकुन पाता है। बाहर से दौरे पर आने वाले अधिकारियों को अभिभूत होते हुए ये कहते हुए देखा जा सकता है कि `नो डाउट..भिलाई इज ए भिलाई।` भिलाई एकसाथ मेहनतकशों और सुविधाभोगियों का शहर है। यहां लोग खुशमिजाज हैं। पूर्वाग्रह रहित हैं। व्यवहार सद्भाव भरा है। ड्यूटी के वक्त जमकर ड्यूटी करते समर्पितजनों को प्लांट में रोज देखा जा सकता है तो मौज मस्ती के वक्त जमकर मौजमस्ती करते हुए यहां क्लबों में, सिविक सेन्टर और आकाशगंगा के बाजारों में हर शाम लोग मिल जाते हैं। यहां जब तब भरने वाले `फन एंड फेयर मेलों` में भी भिलाई की मस्ती दिखलाई दे जाती है। यह उत्सवधर्मी और आयोजनप्रिय शहर है। इसके आयोजनों को देखकर बाहर से आने वाले कलाकार व अतिथि भी मान जाते हैं कि `वाकई .. भिलाई का जवाब नहीं।` रात इस नगर के केन्द्र स्थल रोशनी से नहाए हुए होते है जहां क्रीड़ा एवं सांस्कृतिक उत्सवों के अनेक कार्यक्रम एवं स्पर्द्धाएं चलती रहती हैं। यद्यपि पहले की अपेक्षा इनमें कमी आई है। उसे फिर से पूर्ववत करने की आवश्यकता है।


छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने के बाद इसके पहले मुख्यमंत्री ने कहा था कि `भिलाई छत्तीसगढ़ का सेन्टर ऑफ एक्सलेंस है।` अपना अलग राज्य बन जाने के बाद भिलाई में शिक्षा के बड़े केन्द्र बने और सारे देश में उनका प्रभाव पड़ा है। यह एक अच्छा `एजुकेशन हब` और साइबर सीटी बन सकता है। यह स्कूल एजुकेशन में तो देश के सबसे अच्छे केन्द्रों में पहले से ही जाना जाता है। पीईटी जैसी परीक्षाओं में तो देश भर में टॉपर रहा है। आई आई टी के परिणामों में कई बार प्रावीण्यक्रम में सबसे ज्यादा छात्र भिलाई के होते हैं। अब तो उच्चतर और व्यावसायिक शिक्षा की सुविधाएं भी यहां बढ़ गई हैं। देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले यहां पढ़ाई का खर्च कम बैठता है। कम्पयूटर, इंजीनियरिंग, पैरा-मेडिकल, स्नातकोत्तर शिक्षण व कितने ही किसम के औद्योगिक प्रशिक्षणों के लिए यहां कम खर्चीले संस्थान हैं। पढ़ने वाले विद्यार्थियों के रहने खाने के लिए निजी हॉस्टलों और टिफिन सेन्टरों की भरमार है। बस.. यहां से पढ़ लिखकर तैयार हो रहे योग्य उम्मीदवारों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं तो छत्तीसगढ़ की प्रतिभाओं को बाहर नौकरी के लिए ज्यादा न भटकना पड़े।


यहां का जवाहरलाल नेहरु रिसर्च एंड मेडिकल सेन्टर देश का एक ख्यातनाम चिकित्सा केन्द्र है। यह सेक्टर - ९ के करीब होने के कारण सेक्टर नाइन हॉस्पिटल के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। आजकल भिलाई के प्रबंध निदेशक यहां की चिकित्सा व्यवस्था को और भी अधिक सुगम बनाने में रुचि ले रहे हैं। यद्यपि इस अंचल में दूसरे सुविधायुक्त प्राइवेट हॉस्पिटल भी खुले हैं पर जब उनसे `केस` बिगड़ जाता है तब अंत में सेक्टर-९ हॉस्पिटल ही रिफर करते हैं।

इन चिकित्सा एवं शिक्षा सुविधाओं के बीच यहां निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व प्रकोष्ठ ने अपनी समाजसेवा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है और गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यापन करने वालों के लिए भिलाई कल्याण चिकित्सालय और भिलाई विकास विद्यालय की स्थापना की है। जहां निशुल्क शिक्षा एवं चिकित्सा व्यवस्था उपल्बध है। बीएसपी को उनकी समाजसेवाओं (सीएसआर एक्टीविटीज) के लिए अभी १५ फरवरी को गोल्डन पीकॉक अवार्ड पुर्तगाल में दिया गया। पुरस्कार लेने के लिए उप महाप्रबंधक सुनील जैन को आमंत्रित किया गया था। इन दिनों संयंत्र परिसर में शिशु संरक्षण का मानवीय कार्य हो रहा है। ठेके पर कार्यरत महिला श्रमिक जो अपने दुधमुंहें बच्चों के साथ कारखाने के भीतर काम पर आती हैं, उनके बच्चों की देखरेख के लिए संयंत्र परिसर में दो केन्द्र चलाए जा रहे हैं। ठेका श्रमिक प्रकोष्ठ के सद्प्रयासों से चल रहे इन शिशु संरक्षण केन्द्रों में छोटे बच्चों को प्रोटीनयुक्त आहार देने तथा झूले व अन्य खिलौनों से उनके मन बहलाने की संवेदनाभरी कोशिश जारी है।


दरअसल भिलाई छत्तीसगढ़ में एक ऐसा सुव्यवस्थित और सुन्दर शहर है जो राजधानी होने की तरह अहसास कराता है। छत्तीसगढ़ राज्य को चेतना सम्पन्न बनाकर उसे आधुनिक दृष्टि देने और विकास की नई पहल करने वाला नगर है भिलाई। इस स्वर्ण जयन्ती वर्ष पर भिलाई प्रबंधन के साथ साथ राज्य शासन तथा नगर पालिका निगम का भी दायित्व है कि वे इसके परिधीय क्षेत्र को उन्नति का कोई ऐसा उपहार दें कि इसे और भी अधिक जनोपयोगी शहर बनाया जा सके।

विनोद साव

मुक्तनगर, दुर्ग ४९१००१

मो. ९३०११४८६२६

11 (टिप्‍पणी) यहां क्लिक कर मुझे सुझाव देवें:

दिनेशराय द्विवेदी said...

भिलाई का ऐसा मनमोहक खाका खींचा है कि कोई भी एक बार तो इस शहर में जाना ही चाहेगा। फिर छत्तीस गढ़ पार्क में लगे नाम पढ़ कर तो इच्छा द्विगुणित हो गई। देखते हैं कब उधर पैर पड़ते हैं। हाँ 'अदालत' ब्लाग भी छत्तीसगढ़ से ही है।

Pramod Singh said...

भिलाई की अच्‍छी तस्‍वीर खींची. बुला कब रहे हैं?

अजय साहू said...

भिलाई सचमुच सुन्‍दर नगरी है, इधर कुछ समय से पटरी पार आपराधिक गतिविधियों ने कुछ चिंता बढाई है, जहां फूल होते हैं वहां कांटे अपना स्‍थान बना ही लेते हैं, लेकिन कांटों से फूलों की खूश्‍बू कम नहीं होती

Sanjeet Tripathi said...

नो डाउट इट्स ट्रू!!!
भिलाई अब छत्तीसगढ़ का एजुकेशनल हब भी बनता जा रहा है।
वहीं दूसरी ओर अन्य राज्यों के अपराधी अगर छत्तीसगढ़ के किसी एक शहर में सबसे ज्यादा हैं तो वह शहर है भिलाई, यह क्रिमिनल हब भी बनता जा रहा है यह जरुर एक चिंता का विषय है!!!

Piyush said...

really nice article!!

yunus said...

दिलचस्‍प पोस्‍ट । भिलाई आये हैं अपन । मनमोहक शहर है, वैसे आपको बता दें कि स्‍टील प्‍लांट की स्‍वर्ण जयंती है तो विविध भारती की भी स्‍वर्ण जयंती है । और आई आई टी मुंबई की भी स्‍वर्ण जयंती है । हमने आई आई टी और विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती के संयोग का कार्यक्रम तो तैयार कर लिया अब क्‍या स्‍टील प्लांट और विविध भारती की स्‍वर्ण जयंती के संयोग पर कुछ कर डालें ?????

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

यूनुस भाई स्वागत है आपका । विनोद साव जी भिलाई स्पात संयंत्र में ही अधिकारी हैं इनका फोन नम्बर भी यहां दिया गया है आप बात करके कार्यक्रम तय करें । हमें खुशी होगी आपको अपने बीच पाकर ।



संजीव

मीत said...

जले पर नमक छिड़कता हुआ पोस्ट. सर जी, मैं भी कभी भिलाई स्टील प्लांट में ही कार्यरत था. आह ! क्या दिन थे. अब पिछले ९ वर्षों से कलकत्ते में हूँ, लेकिन भिलाई अब तक system से निकली नहीं. बहुत सही पोस्ट भाई. धन्यवाद भिलाई की सैर करवाने के लिए.

गुरूप्रीत said...

भिलाई की अच्छी तसवीर पेश की है आपने।
वैसे क्या आपने भिलाई शहर की वेबसाईट पर नज़र मारी है?

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

भिलाई कहाँ है पता नही, हम तो भेलाई को जानते है। :)


यहाँ इतनी अधिक संख्या मे पेड लगाये गये है। यह देखकर खुशी होती है। पर यह भी लगता है कि एक ही तरह के पेड लगाने की बजाय देशी और विविध पेड लगाये जाते तो ज्यादा अच्छा होता। इसमे पैसे भी बहुत कम लगते।

सुबह-सुबह भिलाई न जाये। भिलाई-3 के पास वाले पुल से मैने प्रदूषण के चित्र लिये है। बहुत प्रदूषण होता है पर कोई कुछ नही बोलता।


देश मे बहुत कम शहर है जहाँ इतनी सारी गाजर घास देखने को मिलती है। सबसे अधिक पैसा भिलाई मे इसके नियंत्रण के लिये खर्च होता है। पर यह खतम ही नही होती। खतम हो गयी तो 15 अगस्त के दिन अधिकारी किसे उखाडेंगे और ठेकेदारो को ठेका कैसे मिलेगा?

Amma said...

सजीव चित्रण

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