क्या पीले पुष्प वाले पलाश से सोना बनाया जा सकता है?
7. हमारे विश्वास, आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक, कितने अन्ध-विश्वास?
इस सप्ताह का विषय
क्या पीले पुष्प वाले पलाश से सोना बनाया जा सकता है?
पलाश (परसा, ढाक, टेसू या किंशुक) को हम सभी जानते है। इसके आकर्षक फूलो के कारण इसे ‘जंगल की आग’ भी कहा जाता है। प्राचीन काल ही से होली के रंग इसके फूलो से तैयार किये जाते रहे है। अब पलाश के वृक्षो मे पुष्पन आरम्भ हो रहा है। देश भर मे इसे जाना जाता है। लाल फूलो वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है। पहले मै एक ही प्रकार के पलाश से परिचित था। बाद मे वानस्पतिक सर्वेक्षण के दौरान मुझे लता पलाश देखने और उसके गुणो को जानने का अवसर मिला। लता पलाश भी दो प्रकार का होता है। एक तो लाल पुष्पो वाला और दूसरा सफेद पुष्पो वाला। सफेद पुष्पो वाले लता पलाश को औषधीय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है। वैज्ञानिक दस्तावेजो मे दोनो ही प्रकार के लता पलाश का वर्णन मिलता है। सफेद फूलो वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है जबकि लाल फूलो वाले को ब्यूटिया सुपरबा कहा जाता है।
मुझे सबसे पहले पीले पलाश के विषय मे छत्तीसगढ के पारम्परिक चिकित्सको से पता चला। ज्यादातर पारम्परिक चिकित्सको ने अपने पूरे जीवन मे कुछ ही पेड देखे थे। मुझे नागपुर यात्रा के दौरान वर्धा सडक मार्ग पर इसे देखने का सौभाग्य मिला। वहाँ लोगो ने बताया कि हाल ही मे किसी तांत्रिक ने पूरे पेड की कीमत लाखो मे लगायी और जड सहित इसे उखाडा गया। तब मुझे इसके तंत्र सम्बन्धी महत्व के बारे मे पता चला। मैने वैज्ञानिक दस्तावेजो को खंगाला पर कुछ खास नही मिला। मैने अपने अनुभवो को शोध आलेखो के रुप मे प्रकाशित किया।
इन शोध आलेखो का जब मैने हिन्दी मे अनुवाद कर कृषि पत्र-पत्रिकाओ मे प्रकाशित करना आरम्भ किया तो देश भर से पत्र आने लगे। पंजाब से आये एक विस्तृत पत्र मे दावा किया गया था कि पीले पलाश से सोना बनाया जा सकता है। बाद मे मुझे फोन पर बताया गया कि यह जानकारी प्राचीन भारतीय साहित्यो मे लिखी है। उन्होने इसकी फोटोकापी भी भेजी। इसे पढकर लगा कि यह जानकारी आधी-अधूरी है। बाद मे जब मैने पारम्परिक चिकित्सको से चर्चा की तो उन्होने बताया कि इससे सोना बनने की बात ने ही इस दुर्लभ वृक्ष के लिये खतरा पैदा कर दिया है। लोग वनो मे इसे खोजने जी-जान लगा दे रहे है। चूँकि पुष्पन के समय ही इसकी पहचान होती है इसलिये इस समय बडी मारामारी होती है।
पारम्परिक चिकित्सा मे पीले पलाश का प्रयोग बहुत सी जटिल बीमारियो के उपचार मे होता है। पारम्परिक चिकित्सक आम पलाश के औषधीय गुणो को बढाने के लिये इसका प्रयोग करते है। वे सोने से अधिक अपने रोगियो की जान की परवाह करते है। यही कारण है कि पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद ही वे इन्हे दिखाते है। अधिक्तर वृक्ष घने जंगलो मे है। मुझे लगता है कि इनकी चिंता जायज है। पीले पलाश से सोना बनता है या नही इसके लिये प्राचीन साहित्यो मे वर्णित जानकारियो के आधार पर आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोग कर सकते है। पहले तो यह जरुरी है कि जो लिखा गया है उसका सही अर्थ समझा जाय। हो सकता है कि किसी दूसरे सन्दर्भ मे सोने की बात कही गयी हो। पहले भी कई प्रकार की वनस्पतियो पर ऐसी ही गलत जानकारियो के कारण संकट आते रहे है। पीले पलाश की वैज्ञानिक पहचान स्थापित की जाये। और यदि पारम्परिक चिकित्सक चाहे तो इनकी रक्षा मे उनकी मदद की जाये। तंत्र से जुडे लोगो के लिये टिशू कल्चर तकनीक की सहायता से पुराने वृक्षो से नये असंख्य पौधे तैयार करने शोध हो ताकि इन्हे बचाते हुये माँग की पूर्ती की जा सके। पीढीयो से पीले पलाश के विषय मे चर्चा है। इसका सत्य जानने के लिये अब और देर करने की जरुरत नही है।
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5 (टिप्पणी) यहां क्लिक कर मुझे सुझाव देवें:
जैसे फार्मास्युटिकल क्म्पनियां अपने और स्टॉक होल्डर्स के लिये आरोग्य की दवाओं से सोना बना रही हैं, वैसे यह पलाश भी बनाता है।
आवश्यकता सीधे अर्थ पर नहीं लक्षण वाले अर्थ पर जाने की है! :-)
अपन को ये जानकारी थी ही नई, अपन सिर्फ़ पलाश से रंग तैयार किए जाने को जानते रहे हैं
रोचक.........
हमने भी अपने अभी तक के जीवन काल में पीले पलास को नहीं देखा किन्तु पूर्व में संभवत: आपके लिखने के बाद संपर्कों से पता चला था । आपकी चिंता जायज है इसका संरक्षण व संर्वधन होना चाहिए ताकि पारंपरिक चिकितसा में इसका व्यापक प्रयोग संभव हो सके । धन्यवाद ।
मैं भाई संजीव जी के विचारो से सहमत हूँ इसका जनहित मे संवर्धन और सरक्षण किया जाना चाहिए . बहुत बढ़िया जानकारी देने के लिए आभार
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