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21 May, 2007

मेरी तीन अधूरी कवितायें

आज मैं अपनी १९९० की डायरी के पन्नों में जीवंत मेरे कवि मन को पाकर काफी खुश हुआ उसमें दस बारह कवितायें बार बार काट छांट के साथ लिखी गयी हैं । मेरी व्यक्तिगत सोंच है कि यदि व्यक्ति अपनी लेखनी में, एक बार लिख लेने के बाद उस पर सुधार करता है तब वो लम्हे वो परिस्थितियां व्यक्ति के हार्डडिस्क के किसी कोने में फारमेटिंग के कुप्रभाव से दूर लंबे समय तक सेव्ड हो जाता है । जैसे ही उस पल की कोई निशानी सामने आती है तो वरसों पुरानी कहानी जीवंत हो जाती है। मेरी डायरी के पन्नों में लिखी कुछ कविताओं के कुछ अंश आपको अर्ज करता हूं इसके बीच के हिस्सों में कुछ व्यक्तिगत पद हैं इसलिए उन्हें मैं यहां प्रस्तुत नही कर रहा हूं -

१. प्रियतम

घूंघट निकारे आंचल सजाये,
चली जा रही हो वो किस ठांव है प्रिय ।
xxx xxx xxx

स्वप्नों में शाश्वत का श्रृंगार कर के
मेंहदी रचाई हो, किस ठांव है प्रिय ।
xxx xxx xxx

तेरी हर खुशी ही तो संबल था मेरा
तू खुश है जहां, वो किस ठांव है प्रिय ।
xxx xxx xxx

भावों को शव्दों का आधार देकर
मुझे छोड आई हो, किस ठांव है प्रिय ।
xxx xxx xxx

२. कविता

मेरा रूप सलौना है ना अर्थों से मैं हूं परिपूर्ण
“शरद” का जीवन कुठित जीवन कुंठा है यौवन संपूर्ण ।

कौन बनेगा साथी मेरा कौन चलेगा मेरे साथ
कलुष अमंगल दीप यहां पर यौवन की मतवारी रात ।

किंचित मेरे छंद तुम्हारे मानस में होंगे दृष्टव्य
तब होगी ये पूर्ण साधना होंगे तभी गीत सब श्रव्य ।

यें मेरे शव्दों की अर्थी या मेरे आंसू का गान
शाश्वत हो सरद की कविता दे दो इन्हे स्वरों का दान ।
xxx xxx xxx


व्योम परिधान सांवरी सूरत कविता के शव्दों की मूरत
मूक छुपी थी मेरे मन में खोज रहा था जिसे गगन में ।

गीत तुम्ही हो मीत तुम्ही हो जग जीवन की रीत तुम्ही हो
आलिंगन बन द्वय स्पंदन सांसों के मंदिर का धडकन ।
xxx xxx xxx


मन मंदिर की देवी तुम हो भाव शव्द की सेवी तुम हो
“शरद” बना दो पतझड वन को गीत बना दो तुम जीवन को ।

अपनी भाव भंगिमा देकर शव्दों की पंखुडियां देकर
गति दो मेरे प्रीत कलम को भर दो मेरे रीत कलम को ।

मन चाहा है प्यार तुम्हारा जीत नही बस हार तुम्हारा
गीत वही जो तुम्हे सुनाउ गान वही जो तेरा गांउ ।


३. चाहत

क्यूं चपल मन पा के मधुबन पास आना चाहता है
क्यूं तृषित गुंजन कली का गंध पाना चाहता है
कौन मावस में दिये का लौ जलाना चाहता है
या कुमुदनी को निशा में ही लजाना चाहता है
क्यूं किसी के याद में जीवन जलाना चाहता है
क्योंकि तेरा प्यार है दुर्लभ, धरा से दूर है
और मेरा दिल तुझी से दिल लगाना चाहता है ।

(१९८७ से १९९५ तक मैं संजीव “शरद” के नाम से बोरिंग कवितायें लिखता था
इसलिए उपर कही कही शरद शव्द का उपयोग हुआ है ।)

3 comments:

  1. संजीव जी,आप तो कवि भी है..:) चिट्ठाकार और कवि दोनो हमारे बस की बात नही..मगर आपने कर दिखाया है..एसा लगता है किसी के लिये लिखी गई कविताएं है भावुकता से परिपूर्ण।
    बुरा ना माने तो एक बात कहूँ...कुछ शब्द कि गलती है जैसे किस ठांव है प्रिय नही होगा हे प्रिये होना चाहिए..या शायद मै समझ नही पाई हूँ कृपया कुछ रोशनी डाले...
    व्योम परिधान सांवरी सूरत कविता के शव्दों की मूरत
    मूक छुपी थी मेरे मन में खोज रहा था जिसे गगन में ।
    ये पक्तिंयाँ बेहद पसंद आई...
    मन मंदिर की देवी तुम हो भाव शव्द की सेवी तुम हो
    “शरद” बना दो पतझड वन को गीत बना दो तुम जीवन को ।
    मन को छू लेने वाली है बहुत-बहुत बधाई।
    निवेदन है आप कविता लिखना मत छोड़ीये..हमे आपसे चिट्ठा लिखना सीखना है मगर आप कवि भी अच्छे है..
    सुनीता चोटिया(शानू)

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  2. सत्य कहा आपने, "बोर" करने में कोई कसर नही छोडी; कृपया करते रहें।

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  3. सन्तोष जी सही कहा आपने बोरिग, कविताओ का लेखन इसीलिये ज्यादा दिन चल नही सका और मैने कविता लिखना छोड दिया, दरसल मे साहित्य मे जिसे लिखना कहते है उसे मै पकड ही नही पाया तो छोडना कैसा ?

    सुनीता जी सन्तोष जी जैसे आलोचक से हमे सीख लेनी ही चाहिये वर्तनी व व्याकरण की अशुद्धिया मेरे प्रायः सभी पोस्ट मे आप देख रही होन्गी, आपने याद दिलाया उसके लिये धन्यवाद ! आगे मै ध्यान रखून्गा. कविता लेखन और तुकबन्दी मे फर्क होता है मैने तुकबन्दी की
    है, कविता लेखन मेरे बस की बात नही . लेखनी को आगे कायम रखुन्गा किन्तु गद्य मे, हा कभी कभार मेरी पुरानी डायरियो की बोरिन्ग तुकबन्दी भी आप लोगो को झेलनी पडेगी. आपने मेरा साहस बढाया इसके लिये धन्यवाद .

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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