खुमान, मुक्तिबोध और दिवाकर


बात उन दिनों की है जब राजनांदगांव के नगर निगम द्वारा संचालित सर्वेश्वरदास उच्चतर माध्यमिक शाला में खुमान साव शिक्षक थे। दिवाकर नाम का एक बालक उसी स्कूल में पढ़ता था और खुमान सर उसके क्लास टीचर थे। अंग्रेजी के पहले पीरियड में खुमान साव जब भी दिवाकर का नाम हाजरी के लिए पुकारते वह अनुपस्थित रहता। दूसरा पीरियड हिन्दी का होता जिसे कोई और शिक्षक पढ़ाता था। तीसरे पीरियड में खुमान साव पुनः उसी क्लास में गणित पढ़ाने आते तब तक दिवाकर कक्षा में आ गया रहता।
यह क्रम कई कई दिनों तक चलता रहा, कभी-कभी दिवाकर पहले पीरियड के अंतिम समय में आता। खुमान साव उसे कक्षा में आने नहीं देते वह बाहर खड़े रहता। ऐसे ही एक दिन पहले पीरियड के अंतिम समय में जब दिवाकर कक्षा में आया और "मे आई कम इन सर" बोला, खुमान साव ने उसे डांटते हुए कहा कि तुम रोज-रोज देरी से कक्षा आते हो, अब मैं तुम्हें तभी स्कूल में घुसने दूंगा जब तुम अपने पिताजी को बुला कर लाओगे। पीरियड समाप्त हो गया इसके बाद खुमानसाव दूसरी कक्षा में पढ़ाने चले गए।
दिवाकर स्कूल से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर दौड़कर राजनांदगांव के दिग्विजय कालेज पहुंचा, जहां उसके पिता प्राध्यापक थे। उसने अपने पिता से कहा कि क्लास टीचर सर बुला रहे हैं, क्यों-क्या पूछने पर बालक ने सब बातें बताई।
साइकल में पिता-पुत्र मुनिसिपल स्कूल पहुंचे। स्कूल के टीचर्स रूम में पिता के पहुंचते ही वहां उपस्थित शिक्षक उठ खड़े हुए और बड़े सम्मान के साथ उन्होंने दिवाकर के पिता को बैठाया। टीचर्स रुम में उपस्थित शिक्षक प्रसन्न थे कि 'पिता' उनके स्कूल में आए हैं और उन्हें इनका सानिध्य मिल रहा है। इधर खुमान साव तीसरे पीरियड में बालक दिवाकर के क्लास में गणित पढ़ाने पहुंच गए। दिवाकर ने बताया कि उसने अपने पिताजी को बुला लिया है और वह टीचर्स रूम में बैठे हैं। तब तक चपरासी बुलाने भी आ गया।
खुमान साव जब टीचर रूम पहुंचे तब वहां उपस्थित शिक्षक अयोध्या प्रसाद शुक्ल ने दिवाकर के पिता का परिचय दिया कि ये दिवाकर के पिता गजानन माधव मुक्तिबोध हैं। यद्यपि, इतने बड़े व सम्माननीय व्यक्ति को इस तरह क्यूँ बुला लिया यह प्रश्न शुक्ल के चेहरे में उभरी खीझ से स्पष्ट झलक रही थी। शुक्ल के खीझ से परे, मुक्तिबोध को सामने पाकर खुमान साव के चेहरे पर खुशी और सम्मान का भाव उभर आया। मुक्तिबोध ने दोनों हाथ जोड़कर खुमान को नमस्कार किया। खुमान साव, मुक्तिबोध के नाम से परिचित थे, वे जानते थे कि मुक्तिबोध हिंदी के बड़े साहित्यकार हैं और राजनांदगांव में ही रहते हैं किंतु कभी उनसे प्रत्यक्ष मुलाकात नहीं हो पाई थी। हाजिरी रजिस्टर में बालक दिवाकर के पिता का नाम गजानन माधव लिखा था, किंतु कभी उस पर उनका ध्यान नहीं गया था। खुमान साव ने तो बालक के हित के लिए, बालक के रोज रोज देर से आने की सजा के तौर पर एक पिता को बुलाया था किंतु यहां तो पिता के रूप में मुक्तिबोध हाजिर था। लंबा मौन कमरे में पसर गया, आरोप पढ़े जाते उसके पहले ही सहजता से मुक्तिबोध ने अपने बच्चे की गलती स्वीकार कर ली, और खुमान साव से निवेदन किया कि आगे से बालक समय पर स्कूल आएगा। यह भी कहा कि कभी समय निकालकर उनके घर आयें। खुमान साव ने प्रत्युत्तर में अपने हाथ जोड़े उधर मुक्तिबोध साइकिल में पैडल मारते स्कूल कैंपस से बाहर निकल गए।
दिवाकर लगभग प्रत्येक दिन अंग्रेजी का एक पीरियड छोड़ रहा था जिससे उसकी पढ़ाई निश्चित रूप से प्रभावित हो रही थी फिर भी दिवाकर जान बूझकर रोज देर क्यों कर रहा है इस बात की चिंता खुमान साव को थी। दिवाकर पढ़ाई में तेज था, वह अन्य बच्चों के मुकाबले मेधावी था, मुक्तिबोध का पुत्र था इसके बावजूद वह देर से आकर अनुशासनहीनता क्यों कर रहा है यह प्रश्न भी उनको सता रही थी। खुमान साव उस रात सो न सके, दिवाकर और मुक्तिबोध उनके मानस में छाए रहे। अलसुबह वे पठान मोहल्ले में मुक्तिबोध के घर जा पहुंचे जहां मुक्तिबोध किराए से रहते थे। एक छोटा सा कमरा जिसमें एक पुराना खाट और एक चेयर पड़ा था। बाहर एक पुरानी सायकल खड़ी थी जिस पर ताला नहीं था, सायकल की हालत चुराने लायक भी नहीं थी। एक जोड़ी पजामा कुर्ता सूख रहा था जो अभी-अभी धोया गया था। एक छोटा किचन कमरे का ही हिस्सा था जिसमें नाम मात्र के बर्तन और चूल्हा अपनी कहानी खुद कह रहे थे। मुक्तिबोध ने हाथ जोड़कर खुमान साव का स्वागत किया। कमरे के अंदर उन्हें चेयर में बैठाया, खुद खाट में बैठे। राजनांदगांव की तत्कालीन परिस्थितियों और लोक संस्कृति व परंपराओं पर संक्षिप्त फिर दिवाकर की पढ़ाई के संबंध में विस्तृत बात हुई। खुमान साव सीमित उत्तर देते हुए मुक्तिबोध को तौलते रहे (शायद मुक्तिबोध भी खुमान को)।
मुक्तिबोध ने अपनी पारिवारिक स्थिति स्पष्ट करते हुए दिवाकर के रोज देर से स्कूल जाने का कारण बताया। मुक्तिबोध ने बताया कि उनकी पत्नी और छोटा बेटा एक साथ दूसरे गांव में रहते हैं। उनकी पत्नी अक्सर बीमार रहती है जिसका देखभाल छोटा बेटा करता है। उसके साथ उसका बड़ा बेटा दिवाकर रहता है। उनके स्वयं का स्वास्थ्य आजकल ठीक नहीं है और सुबह से उन्हें कॉलेज में पढ़ाने जाना होता है इसलिए घरेलू कामकाज के लिए समय थोड़ा कम पड़ जाता है। उन्होंने बिना हिचकिचाहट बताया कि उनके पास सिर्फ दो जोड़ी कपड़े हैं, कल पहने हुए दोनों के कपड़े सुबह दिवाकर धोता है, घर का झाड़ू पोछा करता है और नहा कर तैयार हो जाता है। रात का लिखा-पढ़ा-छूटा सुबह लिखकर वे खाना बनाते हैं, दोनों खाना खा कर तैयार होकर स्कूल और कॉलेज के लिए निकलते हैं। इसके चलते दिवाकर को रोज-रोज देर हो जा रही है इस बात का एहसास उन्हें नहीं था। उन्होंने खुमान साव को आश्वस्त किया कि आगे ध्यान रखेंगे और दिवाकर अब सही समय में स्कूल पहुंचेगा। मुक्तिबोध ने खुमान के मना करने के बावजूद स्वयं चाय बनाया और खुमान को पिलाया। कृशकाय मुक्तिबोध रुग्ण होने के बावजूद आत्मविश्वास से पूर्ण सधे शब्दों में बोलते रहे और खुमान साव इस महाकवि को निहारते रहे।
(खुमान साव के अवदानों पर संजीव तिवारी द्वारा लिखे जा रहे कलम घसीटी में से एक पाठ का ड्राफ्ट)

मोबाईल-मोबाईल

कल शाम बिलासपुर हाई कोर्ट से वापस दुर्ग आने के लिए स्टेशन पंहुचा। भगत की कोठी आने वाली थी, टिकट लिया, रात होने के कारण स्लीपर नहीं कट पाया, गाड़ी प्लेटफार्म नं. 3 में आ गई। स्टेशन में दाहिने तरफ की सीढ़ी रिपेयरिंग के लिए बंद है सो बाएं तरफ की सीढ़ी और एस्केलेटर से प्लेटफार्म आते तक गाड़ी छूट गई। अगले प्लेटफार्म पर शिवनाथ देरी हो जाने के बाद, नहा-धो के 15 मिनट में छूटने वाली थी। मैं उसमे बैठ गया, बेसमय चलने के कारण उसमे सवारी बहुत कम थे।
गाड़ी छूटने के पहले टीटी दल आया, मैंने टिकट उन्हें दिखाया और स्लीपर काट देने के लिए बोला। टीटी ने टिकट को देर तक देखा तब ध्यान आया कि मेरी टिकट तो मेल-एक्सप्रेस की है और यह सुपर फ़ास्ट है। टीटी ने अंतर का टिकट और जुर्माना लिया, स्लीपर के लिए कोच एस 6-7 में जाने के लिए बोला जिसमें स्लीपर चार्ज नहीं लगता।
एस 6 में कुल जमा 5 यात्री थे, खिड़की के तरफ वाले बर्थ पर एक लड़की बैठी थी और बाजू वाले बर्थ पर एक महिला बैठी थी। दो लड़के अलग-अलग बर्थ पर बैठे थे। मैं आगे बढ़ कर कोच के बीच वाले किसी बर्थ पर जाकर बैठ गया।
गाड़ी चली, अचानक आवाज आई 'चोर! चोर! जंजीर खींचो! चोर!' लड़की बदहवास चिल्ला रही थी। जंजीर खीचने पर भी गाड़ी रुकी नहीं, तब तक एक लड़का दूसरे कोच से आ गया और हम चारो उस लड़की के पास पहुँच कर कारण पूछने लगे।
सिसकियों के बीच लड़की ने बताया कि ट्रेन जब चलने लगी तो वह अपने पर्स से मोबाईल निकाली, अपने पिता को फोन लगाने को थी वैसे ही बाजु के बर्थ पर बैठे लड़के ने मोबाईल छीना और ट्रेन से कूद गया।
अपने नए मोबाईल, उसमे संग्रहित चित्र और ओपन आईडी की उसे चिंता थी। हम सबने उसको ढांढस बंधाया, बाद में स्क्रीन लॉक होने की बात पर वह कुछ नार्मल हुई। उसके छीन लिए गए मोबाईल नंबर पर मैंने रिंग किया तो उधर से किसी ने फोन उठाया, मैंने फोन रेलवे थाने में जमा करने कहा तो उसने हाँ कहा। मतलब छीनी गई मोबाईल फोन आन था, हम लोगों ने 182 में पुलिस को यह बात बताई। लड़की लगातार विलाप करते हुए रो रही थी, उसके हाँथ पैर अकड़ रहे थे। हमने उसकी माँ से बात कराई, उसकी माँ ने उसे भाटापारा तक सुरक्षित छोड़ने को कहा। बातें करते-करते भाटापारा आ गया जहाँ उसे लेने उसके पापा, बड़े पापा और भाई आ गए थे। गाड़ी चलते ही रेलवे पुलिस भी आ गई जिन्हें हमने उनके पास भेज दिया।
तो क्या हुआ, यह तो आये दिन होते रहता है इसे हमें पढ़वा कर, लिख कर हमारा और अपना समय क्यूँ ख़राब किया?
वो इसलिए कि, जब लड़की बदहवास विलाप कर रही थी तो उसे मैंने समझाते हुए कहा कि बेटा मोबाईल ही गया, शुक्र करो कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, वो आपका बैग, पर्स छीन सकता था, आपको शारीरिक क्षति पंहुचा सकता था जिससे तुम बच गई। तो उसने रोते हुए भोलेपन से कहा जो भी होता, मेरा मोबाईल तो बच जाता न।
.. यानि, मोबाईल के लिए इस कदर मोह?
आजकल के बच्चों के मोबाईल प्रेम का यह प्रत्यक्ष उदाहरण है।
... और यह भी कि, 182 में फोन करने पर अगले स्टेशन पर सहायता पहुँचती है।
©तमंचा रायपुरी के बक-बक

व्हाट्स-एपिया रोमांस


मुहब्बत का इज़हार, मुहब्बत के पैग़ाम और मुहब्बत की वो हसीन तकरारें वक्त के साथ अपना तरीका बदल लिया करती हैं !! आज सोशल मीडिया के दौर में वाट्स एप पर मुहब्बतें परवान चढ़ रही हैं ! तकनीकी दौर की इस मुहब्बत को बड़ी खूबसूरत कहानियों में गूंथकर समीर ने वाट्स एपिया रोमांस की शक्ल में इस किताब में पेश किया है ! समीर प्रेम कहानियां लिखते हुए सबसे सहज होते हैं ! हमारी जिंदगियों में रोमांस के जो छोटे छोटे लम्हे बिखरे रहते हैं , उन्हें समीर बेहद संवेदनाओं के साथ अपनी कहानियों में उकेरते हैं ! उनकी अपनी एक ख़ास शैली है जिससे आज के आधुनिक युवा अपने आप को एकदम से कनेक्ट कर पाते हैं ! समीर की कहानियां दरअसल पारम्परिक कहानियां नहीं बल्कि दृश्यों का एक बड़ा खूबसूरत कोलाज होती हैं ! समीर के वाट्स एपिया रोमांस में प्रतीक्षा हैं , तड़प है , चहकते इमोजीज़ हैं , इकरार है, इज़हार है , रूठना मनाना है और मुहब्बत के नीले हरे रंग हैं गोया मोबाइल की स्क्रीन एक चमकीला आसमान हो और उसमे मुहब्बत के परिंदे उड़ान भरते हों ! समीर की कहानियों की जो सबसे लाजवाब बात मुझे नज़र आती है वो रिश्तों के जटिल धागों की बुनावट को इस कदर सरलता से प्रस्तुत करते हैं कि हर पाठक कहीं न कहीं उन रिश्तों को जीने लगता है ! कथा का घटना क्रम हमें हमारी जिंदगी से रूबरू कराता हुआ दिखाई देता है ! सर्वथा मौलिकता के साथ कही गयी ये छोटी छोटी कहानियां हम सभी की कहानियां हैं ! इन कहानियों के चरित्र हमारे आसपास ही जी रहे हैं ! ये कहानियां हमारे ठीक बगल में उन स्क्रीनों पर घट रही हैं जिनके साथ हमारी स्क्रीन सेम सिग्नल शेयर कर रही हैं !
- पल्लवी त्रिवेदी
कुछ अलग प्रकार की पुस्‍तकों को शिवना प्रकाशन से प्रकाशित करने की योजना के तहत यह पुस्तक आई है। प्रेम के नये रूप का प्रस्तुत करती हुई इन कहानियों के लेखक हैं समीर यादव । इन कहानियों में नये युग का प्रेम है। नाम 'व्हाट्स-एपिया रोमांस' व्हाट्स अप पर जन्म लेनी वाली प्रेम कहानियाँ। लेकिन इन कहानियों में भी वही बेकरारी है, वही इंतज़ार है जो प्रेम में हमेशा से रहता है। पुस्तक में शामिल कहानियाँ
1) समझे बस वो... 2) एबाउट टू डाय 3) बट लीव इट 4) व्हाट्स-एपिया परवाने 5) पुरजा-पुरजा प्रेम पर्चियाँ 6) क्या यही प्यार है 7) WiFi Zone में लौट आओ 8) ग्रैंड सेल्यूट.. 9) इंद्रधनुषी और इंस्टेंट 10) आर यू देअर ? 11) दो काली टिक 12) मुहब्बत वाली जगह 13) आज मिल न.. 14) आख़िरी कश 15) नो स्टेटस 16) न सूखने देती हो, न भीगने 17) पिछली सदी का मैसेज 18) दोनों टिक नीली 19) गोल्डन रिट्रीवर 20) तारीख़ 21) उसे भी मालूम है .. 22) चपटी तिकोने वाली प्लेट 23) तुम बेवजह याद रहती भी कहाँ हो 24) इसमें मैं कहाँ ... 25) जा कुलच्छनी...... सब बरी हो गए।
यह पुस्‍तक आज से ऑनलाइन शॉपिंग स्टोर्स पर उपलब्‍ध रहेगी

जब भाषा ही नहीं रहेगी तो क्या .?


विगत एक वर्ष से मैंने छत्तीसगढ़ी वेब मैगज़ीन गुरतुर गोठ डॉट कॉम (www.gurturgoth.com) को सर्च इंजन से डिसेबल कर दिया था।  इसके पीछे मूल कारण एक व्यक्ति था जो गुरतुरगोठ और अन्य छत्तीसगढ़ी ब्लॉगों के आलेखों को कापी कर अपने ब्लॉग में लगातार लगा रहा था, इससे गूगल बोट को समझ में नहीं आ रहा था कि, डेटा पहले कहाँ पब्लिश हुआ है। इसके अतिरिक्त कारण यह था कि मुझे दूसरे आयामों में काम करना था और छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के इंटरनेट में हो रहे ब्लॉगिया-फेसबुकिया भण्डारण को सर्च में प्राथमिकता देना था। ताकि गूगल, नेट सर्च में छत्तीसगढ़ी भाषा के शब्दों के प्रति भी संवेदनशील (मशीनी) हो। यह मेरे आत्ममुग्ध मानस का भ्रम भी हो सकता है या मेरे अधकचरा तकनीकी ज्ञान का सत्य। 
जो भी हो, मुझे 'खुसी' है कि इस बीच एंड्राइड युक्त युवा साथियों ने अपनी भाषा को वैश्विक बनाने में सराहनीय कार्य किया और दर्जनों छत्तीसगढ़ी ब्लॉग व फेसबुक, व्हॉट्स एप ग्रुप बनाये। क्रांति सेना के 'संगी' लोग भी भाषा और संस्कृति के लिए लगातार अलख जगा रहे हैं।  
वरिष्ठ और आदरणीय अग्रजों में नंदकिशोर शुक्ला ने तो अपनी उम्र के तमाम 'सियानों' को पीछे छोड़ते हुए फेसबुक में छत्तीसगढ़ी अस्मिता को जगाने में अभूतपूर्व कार्य किया है। भाषा को बचाने और प्राथमिक स्तर से छत्तीसगढ़ी की शिक्षा अनिवार्य करने के लिए वे अपनी मांग प्रतिपल बुलंद करते रहते हैं। इसके बावजूद हम उनके पोस्टों को टैग करने की अनुमति देने के सिवाय, कुछ नही कर पा रहे हैं। हमारे पास न ही उनके सामान ज्ञान है और न ही वैसी ऊर्जा।  
बहरहाल हमने छत्तीसगढ़ी वेब मैगज़ीन गुरतुर गोठ डॉट कॉम (www.gurturgoth.com) को फिर से सर्च इनेबल कर दिया है। हम यहाँ व्हॉट्स एप, फेसबुक और दूसरे मीडिया में छत्तीसगढ़ी भाषा पर हो रहे उल्लेखनीय चर्चाओं को प्रकाशित भी करेंगे। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ी के ऐसे रचनाओं को पुनः आमन्त्रित कर रहे है जो इंटरनेट में पूर्व प्रकाशित न हो। ब्लॉ ब्लॉ ब्लॉ, इन सबके बावजूद हमारे द्वारा नेट पर जो कुछ भी किया जा रहा है उसकी उपादेयता पर इस सवाल का जवाब अब भी अनुत्तरित है कि, '.. .. जब भाषा ही नहीं रहेगी तो क्या??' 
-संजीव तिवारी

यात्रा वृत्तांत : थाईलैंड यात्रा और फेसबुक फ्रेंड्स के हवाई हमले

- विनोद साव 

‘दोस्तों.. हम कल १६ तारीख से थाईलैंड की यात्रा पर जा रहे हैं. बैंकाक और पटाया घूमते हुए वापस कोलकाता होकर रायपुर एअरपोर्ट पर २२ मार्च को उतरेंगे. आपको जानकर खुशी होगी कि मैं सपत्नीक जा रहा हूं.’ जाते समय फेसबुक पर दी गई मेरी इस जानकारी ने हडकंप मचा दी. सहसा लोगों को यह विश्वास नहीं हुआ कि मैं वाकई इस तरह से जा रहा हूं. कहीं कोई ‘मैच’ नहीं है. फेसबुक फ्रेंड्स ने अपनी आशंका रूपी ‘कमेंट्स’ की बौछारें लगा दी. कुंअर ठाकुर नरेंद्र प्रताप सिंह राठौर ने कहा कि ‘भाई साब.. पटाया गोवा से दस गुना ज्यादा रंगीन है ऐसे में आप भाभी जी ???' पत्रकार मनोज अग्रवाल ने कहा कि 'अच्छा किया साव जी आपने पहले बता दिया.. नहीं तो लोग गलत समझते.' रायपुर के प्रदीप कुमार शर्मा ने हमें 'हनीमून पर जाने की बधाई दे डाली.' व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने अग्रज की सदाशयता से कहा कि 'ये आप अच्छा काम कर रहे हैं आपकी यात्रा मंगलमय हो'. ब्राम्हणों ने 'शुभम् भवतु यात्रायाम' का आशीर्वाद दे दिया.

कोलकाता से जब हमने बैंकाक के लिए उड़ान भरी तब कथाकार कैलाश बनवासी, व्यंग्यकार गुलबीर सिंह भाटिया और रंगकर्मी राजेश श्रीवास्तव ने भी शुभकामनाएँ भेजीं. हाँ महिला मित्रों ने यथेष्ट दूरी बनाये रखी सिवाय मीता दास, वंदना केंगरानी और कुमकुम भाभी (श्रीमती उदयप्रकाश) के जिन्होंने हर पोस्ट को ‘लाइक’ कर अपने साहस का परिचय दिया. होली ठिठोली करते हुए उड़ान भरने से पहले एयरपोर्ट के स्मोकिंग जोन में सिगरेट पीते हुए मेरा चित्र देखकर व्यंग्यकार प्रभाकर चौबे जैसे बड़े-बुजुर्गों ने सिगरेट नहीं पीने की नसीहत दी. इंदौर के विद्वान साथी प्रदीप शर्मा ने स्मोकिंग जोन के अंदर ये काम कर हवा को प्रदूषित होने से बचा लेने की सराहना की. तो अंबिकापुर आकाशवाणी के उदघोषक शोभनाथ साहू ने समझाया कि 'कुछ बातें छुपकर छुपाकर करनी होती है, आपने देश क्या छोड़ा, एकदम उन्मुक्त हो गए । इस चेहरे से लौट आएं ।' व्यंग्यकार कैलाश मंडलेकर ने इस चेहरे की तारीफ की कि 'बहुत सुंदर फ़ोटो है. सिगरेट के बिना भी आप बढ़िया दिखते हैं विनोद जी.. यार इस उम्र में इतने स्मार्ट बने रहने का क्या नुस्खा है ?' कथाकार रमाकांत श्रीवास्तव ने ये जुमला फेंका 'पीलो यार.. पीलो .. बंगाली लोग तो सिगरेट खाते हैं.' नवीन कुमार तिवारी ‘अमर्यादित‘ ने 'हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया' का गीत गुनगुनाया'.
फेसबुक में समुद्र में पैराग्लाइडिंग करते हुए पिक्स के साथ जब यह टिप्पणी गई कि 'मुझसे पहले पत्नी ने उड़ान भर ली. मैं ज़मीन पर रह गया और वो आसमान में उड़न छू हो गई.' सतीशकुमार चौहान ने कहा कि ' जमीन से जुडे लोग जमीन पर ही रह जाते हैं.' हास्य-व्यंग्य के कवि परमेश्वर वैष्णव सबसे ज्यादा उत्तेजित रहे ' अभी तक आपने भाभी जी की ताकत हौसले किचन में देखे थे. अब बाहर ले आये तब पता चला आपको. ऐसे ही हर गृहणी का दर्द है.' कविताई सुर में नरेंद्र राठौर बोल उठे 'मतलब .. लुट गई जीवन भर की कमाई.. आप रह गए ज़मीन पर और भाभी हुई हवा हवाई.'

अल्काज़ार-शो के बाद उसके नर्तक कलाकार अपने उत्तेजक लिबास में हाल के बाहर आकर दर्शकों से मिलते हैं. हाथ मिलाने, गले मिलने और फोटो खिंचाने के अलग अलग रेट हैं. ये जानकर भिलाई की कथाकार मीता दास पूछती हैं कि 'कितना रोकड़ा लुटा आये?' रायपुर के पत्रकार गोकुल सोनी को संदेह है 'हाथ मिलाये, गले मिले बस !'

बैंकाक में संग्रहालय से बुद्ध के कुछ चित्र फेसबुक पर पोस्ट करता हूं जिन्हें सबसे ज्यादा 'लाइक' करते हैं भिलाई इस्पात संयंत्र के पूर्व कार्यपालक निदेशक गणतंत्र ओझा साहब. समुद्र तट पर पट्टाया की देशी बीयर 'चांग' पीते देखकर भिलाई के पूर्व जनसम्पर्क आधिकारी अरूण भट्ट भुवनेश्वर से उत्साह बढ़ाते हैं कहते हैं 'एन्जॉय लाइफ.' थाई सुंदरियों के चित्र देखकर यायावर सतीश जायसवाल लगातार अपनी 'लाइक' भेज कर उत्साह बनाये रखे हैं. बैंकाक में 'क्रूज' में सवार होते समय एक सुन्दरी से गर्मजोशी से स्वागत होता देख शब्दों के जादूगर कनक तिवारी से रहा नहीं गया और पूछ बैठे कि 'थाई ने क्या क्या ख़्वाब दिखाए ?'
बैंकाक में हमारे होटल 'इकोटेल' के पीछे आंध्रा रेस्टारेंट था. इसके मालिक हैं नौपदा विजया गोपाला. वे दुर्ग भिलाई अपने रिश्तेदारों के बीच आते जाते रहते हैं. वे अब मेरे फेसबुक फ्रेंड हो गए हैं. फेसबुक में सबसे ज्यादा तहलका मचाया है 'स्काई ट्रेन' के पिक्स ने. आसमान में उडती ‘स्काई ट्रेन’. इसमें ५० मिनट यात्रा की. यह ट्रेन ऊपर चलती है और शहर नीचे होता है. अंत में यह बैंकाक एयरपोर्ट के भीतर घुसकर सवारियों को उतारती है.
दोस्तों.. थाईलैंड की यात्रा पूरी कर एक सप्ताह बाद घर पहुंचा तो घर बच्चों से भरा था जिन्हें देखकर हम भाव-विभोर हुए. दिल्ली से के.के.अरोरा ने ‘वेलकम टू इंडिया’ कहा और कोरबा के सुरेश सोनी की हमारे आगमन पर तुकबंदियां देखिये :
आकर नाती पोती पाए !
क्या क्या लाए नही बताए !
स्काई ट्रेन में सफर कर आए !
चांग बीयर भी पीकर आए !
परदेश से आकर अपनों को पाए !
हम सबकी जानकारी बढ़ाए !


20 सितंबर 1955 को दुर्ग में जनमे विनोद साव समाजशास्त्र विषय में एम.ए.हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व विभाग में सहायक प्रबंधक हैं। fहंदी व्यंग्य के सुस्थापित लेखक विनोद साव अब उपन्यास, कहानियां और यात्रा वृतांत लिखकर भी चर्चा में हैं। उनकी रचनाएं हंस, पहल, अक्षरपर्व, वसुधा, ज्ञानोदय, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में छपी हैं। उनके दो उपन्यास, तीन व्यंग्य संग्रह और संस्मरणों व कहानियों के संग्रह सहित अब तक कुल बारह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें वागीश्वरी और अट्टहास सम्मान सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल के लिए भी चित्र-कथाएं उन्होंने लिखी हैं। वे उपन्यास के लिए डाॅ. नामवरfसंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से भी सम्मानित हुए हैं। उनका पता है: मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001 मो.9301148626 ई-मेलः vinod.sao1955@gmail.com

गढ़ कलेवा को बचा लो साहब

आज फिर रायपुर के छत्तीसगढ़ी कलेवा के ठीहा 'गढ़ कलेवा' जाने का अवसर मिला। बाहर बाइक और कार काफी संख्या में खड़े थे। वहां ग्राहकों के भीड़-भाड़ को देखकर दिल को सुकून मिला। बैठने के लिए बनाये गए परछी के अतिरिक्त बाहर खुले में बने पारंपरिक टेबलों में ग्राहक बैठे थे। खुले परिसर में चहल-पहल थी और काउंटर पर लोग स्वयं-सेवा करते हुए अपने पसंद का कलेवा खरीद रहे थे। कुछ दिगर-प्रांतीय सभ्रांत महिलाएं भी थी जो जाते समय छत्तीसगढ़ी डिस खरीद रही थीं, कुछ अपने बच्चों का गढ़ कलेवा के भित्ति आवरणों के साथ फोटो खींच रही थीं।
परिसर में घुसते हुए मुझे लगने लगा कि 'गढ़ कलेवा' हिट हो गया। देखकर आत्मिक आनंद आया कि हमारे प्रदेश की खान-पान परम्परा के प्रति शहरी लोगों में रूचि और सम्मान दोनों जागृत हुआ है।
हम (यानि अशोक तिवारी जी, शकुंतला तरार जी और मैं) छत्तीसगढ़ी के लब्ध प्रतिष्ठित संगीतकार खुमान साव जी के साथ थे। हमने आर्डर दिया, कलेवा परोसा गया, हमने खाया। कलेवा अपने पारंपरिक जायके के अनुसार स्वादिष्ट था।
अंदर प्लास्टिक के डिस्पोजलों में पानी और कलेवा सर्व करते वेटरों को देख कर खुमान साव जी ने चुटकी ली, वेटर सफाई मारने लगा। हमें काँसे के बर्तन में कलेवा सर्व किया गया किन्तु बर्तन गंदे थे, लग रहा था कि महीनो उसे मांजा नहीं गया है, तैलीयपन उन्हें छूते ही महसूस हो रहा था। जैसे किसी और का जूठा इस पवित्र बर्तन में समाया हुआ है। परछी के दीवारों में बने मोहक पारंपरिक भित्ति चित्र और झरोखों में धूल जमे थे, मकड़ी के जाले उभर आये थे। लग रहा था इसे महीनो से झाड़ा-पोंछा नहीं गया था। जमीन में मिट्टी जगह-जगह उखड़ी थी, गोबर से लिपी-पुती धरती गायब हो गई थी।
संस्कृति संचालनालय ने इसे अशोक तिवारी जी के मार्गदर्शन में, बड़ी आशा के साथ बनवाया था। मुख्य मंत्री ने इसका उद्घाटन किया था और इसकी प्रसंशा गाहे-बगाहे करते रहते थे। हमारी परम्परा को अक्षुण रखने के उद्देश्य से स्थापित इस केंद्र की इस कदर दुर्दशा देखकर अच्छा नहीं लगा। मेरा मानना है कि संस्कृति विभाग के साथ ही 'गढ़ कलेवा' का संचालन कर रही महिला समूह को भी ध्यान देना चाहिए, इसी परिसर के बदौलत वे अच्छा-खासा आय प्राप्त कर रहे हैं तो उनका कर्तव्य बनता है कि परिसर की पारंपरिकता को सहेज कर रखें।
नहीं तो, जिस परिकल्पना के साथ गढ़ कलेवा का निर्माण किया गया था वह कुछ महीनो में क्षीण पड़ने लगेगा और यही हाल रहा तो इसे समाप्त होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
-संजीव तिवारी

छत्तीसगढ़ में लोक संगीत के नागरी प्रस्तुति का बीजारोपण

प्रतिवर्ष की भांति 1948 में राजनांदगांव में गुजराती समाज के द्वारा दुर्गोत्सव मनाया जा रहा था। उस समय बीड़ी के व्यापारी मीरानी सेठ के घर के सामने दुर्गा रखा हुआ था। दुर्गा पंडाल में इस वर्ष भी शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम रखा गया था जिसमें रायपुर के प्रसिद्द संगीतकार अरुण सेन आमंत्रित थे। कार्यक्रम के बीच में सुगम और फ़िल्मी संगीत भी रखा गया था ताकि दर्शक शास्त्रीय संगीत से बोर न हों। इसमें खुमानसाव को फिल्मी संगीत की प्रस्तुति के लिए बुलाया गया था। इस कार्यक्रम में खुमान साव ने कुछ फिल्मी गीत प्रस्तुत किए जिसमें 'घर आया मेरा परदेसी' जैसे गाने प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रम सुनने वालों ने खुमान संगीत को बहुत पसंद किया। उसी दिन खुमान साव ने यह निश्चय किया कि महानगरों की भांति राजनांदगांव में भी एक आर्केस्ट्रा पार्टी का निर्माण किया जाए। इस कार्यक्रम से ही छत्तीसगढ़ में आर्केस्ट्रा पार्टी की परिकल्पना ने पहली बार पंख पसारा।

इसी वर्ष दुर्गा पक्ष के बाद ही खुमान साव ने खुमान एण्ड पार्टी के नाम से आर्केस्ट्रा पार्टी का गठन किया। उस समय महिलाएं आर्केस्ट्रा में नहीं गाती थीं। जो पुरुष गायक पार्टी में थे उनमे सुंदर सिंह ठाकुर जो बाद में ट्राइबल के सीओ हुए वे सहगल के गीत गाते थे। जयराम शुक्ल जो किशोरीलाल शुक्ला के भतीजे थे और बाद में तहसीलदार हुए वे और संतोष शुक्ला अन्य फिल्मी गीत गाते थे।

खुमान साव के आर्केस्ट्रा पार्टी ने तब धूम मचा दिया था। पूरे छत्तीसगढ़ में 'खुमान एण्ड पार्टी' की मांग आने लगी थी। उनकी पार्टी में धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए और 1948 से 50 तक खुमान आर्केस्टा का पूरे छत्तीसगढ़ में काफी धूम रहा। जब संगीत कलाकार बढ़ते गए तब उन्होंने 1952 में 'शारदा संगीत समिति' की स्थापना की जिसमें भी वो संगीत देने लगे। कलाकारों के बढ़ने के बाद 1959 में उन्होंने 'सरस्वती संगीत समिति' का गठन किया और आर्केस्ट्रा पार्टी अनवरत चलती रही। 1954 में जब वे जनपद स्कूल राजनांदगांव में शिक्षक नियुक्त हो गए उसके बाद उन्होंने अंतिम आर्केस्ट्रा पार्टी का जो संचालन किया उसका नाम 'राज भारती संगीत समिति' था, जिसे बाद में उनके शिष्य नरेंद्र चौहान जी चलाने लगे। 1962 में प्रसिद्द लोकसंगीतकार गिरजा सिन्हा और भैयालाल हेडाऊ के साथ मिल कर भी उन्होंने एक संगीत समिति का गठन किया जिसमे फ़िल्मी गीतों के साथ ही छत्तीसगढ़ी गीत भी प्रस्तुत किये जाने लगे। इस प्रकार से छत्तीसगढ़ में लोक संगीत के नागरी प्रस्तुति का बीजारोपण हुआ।
(खुमान साव पर संजीव तिवारी द्वारा लिखे जा रहे कलम घसीटी के अंश)
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