जब भाषा ही नहीं रहेगी तो क्या .?


विगत एक वर्ष से मैंने छत्तीसगढ़ी वेब मैगज़ीन गुरतुर गोठ डॉट कॉम (www.gurturgoth.com) को सर्च इंजन से डिसेबल कर दिया था।  इसके पीछे मूल कारण एक व्यक्ति था जो गुरतुरगोठ और अन्य छत्तीसगढ़ी ब्लॉगों के आलेखों को कापी कर अपने ब्लॉग में लगातार लगा रहा था, इससे गूगल बोट को समझ में नहीं आ रहा था कि, डेटा पहले कहाँ पब्लिश हुआ है। इसके अतिरिक्त कारण यह था कि मुझे दूसरे आयामों में काम करना था और छत्तीसगढ़ी भाषा साहित्य के इंटरनेट में हो रहे ब्लॉगिया-फेसबुकिया भण्डारण को सर्च में प्राथमिकता देना था। ताकि गूगल, नेट सर्च में छत्तीसगढ़ी भाषा के शब्दों के प्रति भी संवेदनशील (मशीनी) हो। यह मेरे आत्ममुग्ध मानस का भ्रम भी हो सकता है या मेरे अधकचरा तकनीकी ज्ञान का सत्य। 
जो भी हो, मुझे 'खुसी' है कि इस बीच एंड्राइड युक्त युवा साथियों ने अपनी भाषा को वैश्विक बनाने में सराहनीय कार्य किया और दर्जनों छत्तीसगढ़ी ब्लॉग व फेसबुक, व्हॉट्स एप ग्रुप बनाये। क्रांति सेना के 'संगी' लोग भी भाषा और संस्कृति के लिए लगातार अलख जगा रहे हैं।  
वरिष्ठ और आदरणीय अग्रजों में नंदकिशोर शुक्ला ने तो अपनी उम्र के तमाम 'सियानों' को पीछे छोड़ते हुए फेसबुक में छत्तीसगढ़ी अस्मिता को जगाने में अभूतपूर्व कार्य किया है। भाषा को बचाने और प्राथमिक स्तर से छत्तीसगढ़ी की शिक्षा अनिवार्य करने के लिए वे अपनी मांग प्रतिपल बुलंद करते रहते हैं। इसके बावजूद हम उनके पोस्टों को टैग करने की अनुमति देने के सिवाय, कुछ नही कर पा रहे हैं। हमारे पास न ही उनके सामान ज्ञान है और न ही वैसी ऊर्जा।  
बहरहाल हमने छत्तीसगढ़ी वेब मैगज़ीन गुरतुर गोठ डॉट कॉम (www.gurturgoth.com) को फिर से सर्च इनेबल कर दिया है। हम यहाँ व्हॉट्स एप, फेसबुक और दूसरे मीडिया में छत्तीसगढ़ी भाषा पर हो रहे उल्लेखनीय चर्चाओं को प्रकाशित भी करेंगे। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ी के ऐसे रचनाओं को पुनः आमन्त्रित कर रहे है जो इंटरनेट में पूर्व प्रकाशित न हो। ब्लॉ ब्लॉ ब्लॉ, इन सबके बावजूद हमारे द्वारा नेट पर जो कुछ भी किया जा रहा है उसकी उपादेयता पर इस सवाल का जवाब अब भी अनुत्तरित है कि, '.. .. जब भाषा ही नहीं रहेगी तो क्या??' 
-संजीव तिवारी

यात्रा वृत्तांत : थाईलैंड यात्रा और फेसबुक फ्रेंड्स के हवाई हमले

- विनोद साव 

‘दोस्तों.. हम कल १६ तारीख से थाईलैंड की यात्रा पर जा रहे हैं. बैंकाक और पटाया घूमते हुए वापस कोलकाता होकर रायपुर एअरपोर्ट पर २२ मार्च को उतरेंगे. आपको जानकर खुशी होगी कि मैं सपत्नीक जा रहा हूं.’ जाते समय फेसबुक पर दी गई मेरी इस जानकारी ने हडकंप मचा दी. सहसा लोगों को यह विश्वास नहीं हुआ कि मैं वाकई इस तरह से जा रहा हूं. कहीं कोई ‘मैच’ नहीं है. फेसबुक फ्रेंड्स ने अपनी आशंका रूपी ‘कमेंट्स’ की बौछारें लगा दी. कुंअर ठाकुर नरेंद्र प्रताप सिंह राठौर ने कहा कि ‘भाई साब.. पटाया गोवा से दस गुना ज्यादा रंगीन है ऐसे में आप भाभी जी ???' पत्रकार मनोज अग्रवाल ने कहा कि 'अच्छा किया साव जी आपने पहले बता दिया.. नहीं तो लोग गलत समझते.' रायपुर के प्रदीप कुमार शर्मा ने हमें 'हनीमून पर जाने की बधाई दे डाली.' व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने अग्रज की सदाशयता से कहा कि 'ये आप अच्छा काम कर रहे हैं आपकी यात्रा मंगलमय हो'. ब्राम्हणों ने 'शुभम् भवतु यात्रायाम' का आशीर्वाद दे दिया.

कोलकाता से जब हमने बैंकाक के लिए उड़ान भरी तब कथाकार कैलाश बनवासी, व्यंग्यकार गुलबीर सिंह भाटिया और रंगकर्मी राजेश श्रीवास्तव ने भी शुभकामनाएँ भेजीं. हाँ महिला मित्रों ने यथेष्ट दूरी बनाये रखी सिवाय मीता दास, वंदना केंगरानी और कुमकुम भाभी (श्रीमती उदयप्रकाश) के जिन्होंने हर पोस्ट को ‘लाइक’ कर अपने साहस का परिचय दिया. होली ठिठोली करते हुए उड़ान भरने से पहले एयरपोर्ट के स्मोकिंग जोन में सिगरेट पीते हुए मेरा चित्र देखकर व्यंग्यकार प्रभाकर चौबे जैसे बड़े-बुजुर्गों ने सिगरेट नहीं पीने की नसीहत दी. इंदौर के विद्वान साथी प्रदीप शर्मा ने स्मोकिंग जोन के अंदर ये काम कर हवा को प्रदूषित होने से बचा लेने की सराहना की. तो अंबिकापुर आकाशवाणी के उदघोषक शोभनाथ साहू ने समझाया कि 'कुछ बातें छुपकर छुपाकर करनी होती है, आपने देश क्या छोड़ा, एकदम उन्मुक्त हो गए । इस चेहरे से लौट आएं ।' व्यंग्यकार कैलाश मंडलेकर ने इस चेहरे की तारीफ की कि 'बहुत सुंदर फ़ोटो है. सिगरेट के बिना भी आप बढ़िया दिखते हैं विनोद जी.. यार इस उम्र में इतने स्मार्ट बने रहने का क्या नुस्खा है ?' कथाकार रमाकांत श्रीवास्तव ने ये जुमला फेंका 'पीलो यार.. पीलो .. बंगाली लोग तो सिगरेट खाते हैं.' नवीन कुमार तिवारी ‘अमर्यादित‘ ने 'हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया' का गीत गुनगुनाया'.
फेसबुक में समुद्र में पैराग्लाइडिंग करते हुए पिक्स के साथ जब यह टिप्पणी गई कि 'मुझसे पहले पत्नी ने उड़ान भर ली. मैं ज़मीन पर रह गया और वो आसमान में उड़न छू हो गई.' सतीशकुमार चौहान ने कहा कि ' जमीन से जुडे लोग जमीन पर ही रह जाते हैं.' हास्य-व्यंग्य के कवि परमेश्वर वैष्णव सबसे ज्यादा उत्तेजित रहे ' अभी तक आपने भाभी जी की ताकत हौसले किचन में देखे थे. अब बाहर ले आये तब पता चला आपको. ऐसे ही हर गृहणी का दर्द है.' कविताई सुर में नरेंद्र राठौर बोल उठे 'मतलब .. लुट गई जीवन भर की कमाई.. आप रह गए ज़मीन पर और भाभी हुई हवा हवाई.'

अल्काज़ार-शो के बाद उसके नर्तक कलाकार अपने उत्तेजक लिबास में हाल के बाहर आकर दर्शकों से मिलते हैं. हाथ मिलाने, गले मिलने और फोटो खिंचाने के अलग अलग रेट हैं. ये जानकर भिलाई की कथाकार मीता दास पूछती हैं कि 'कितना रोकड़ा लुटा आये?' रायपुर के पत्रकार गोकुल सोनी को संदेह है 'हाथ मिलाये, गले मिले बस !'

बैंकाक में संग्रहालय से बुद्ध के कुछ चित्र फेसबुक पर पोस्ट करता हूं जिन्हें सबसे ज्यादा 'लाइक' करते हैं भिलाई इस्पात संयंत्र के पूर्व कार्यपालक निदेशक गणतंत्र ओझा साहब. समुद्र तट पर पट्टाया की देशी बीयर 'चांग' पीते देखकर भिलाई के पूर्व जनसम्पर्क आधिकारी अरूण भट्ट भुवनेश्वर से उत्साह बढ़ाते हैं कहते हैं 'एन्जॉय लाइफ.' थाई सुंदरियों के चित्र देखकर यायावर सतीश जायसवाल लगातार अपनी 'लाइक' भेज कर उत्साह बनाये रखे हैं. बैंकाक में 'क्रूज' में सवार होते समय एक सुन्दरी से गर्मजोशी से स्वागत होता देख शब्दों के जादूगर कनक तिवारी से रहा नहीं गया और पूछ बैठे कि 'थाई ने क्या क्या ख़्वाब दिखाए ?'
बैंकाक में हमारे होटल 'इकोटेल' के पीछे आंध्रा रेस्टारेंट था. इसके मालिक हैं नौपदा विजया गोपाला. वे दुर्ग भिलाई अपने रिश्तेदारों के बीच आते जाते रहते हैं. वे अब मेरे फेसबुक फ्रेंड हो गए हैं. फेसबुक में सबसे ज्यादा तहलका मचाया है 'स्काई ट्रेन' के पिक्स ने. आसमान में उडती ‘स्काई ट्रेन’. इसमें ५० मिनट यात्रा की. यह ट्रेन ऊपर चलती है और शहर नीचे होता है. अंत में यह बैंकाक एयरपोर्ट के भीतर घुसकर सवारियों को उतारती है.
दोस्तों.. थाईलैंड की यात्रा पूरी कर एक सप्ताह बाद घर पहुंचा तो घर बच्चों से भरा था जिन्हें देखकर हम भाव-विभोर हुए. दिल्ली से के.के.अरोरा ने ‘वेलकम टू इंडिया’ कहा और कोरबा के सुरेश सोनी की हमारे आगमन पर तुकबंदियां देखिये :
आकर नाती पोती पाए !
क्या क्या लाए नही बताए !
स्काई ट्रेन में सफर कर आए !
चांग बीयर भी पीकर आए !
परदेश से आकर अपनों को पाए !
हम सबकी जानकारी बढ़ाए !


20 सितंबर 1955 को दुर्ग में जनमे विनोद साव समाजशास्त्र विषय में एम.ए.हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व विभाग में सहायक प्रबंधक हैं। fहंदी व्यंग्य के सुस्थापित लेखक विनोद साव अब उपन्यास, कहानियां और यात्रा वृतांत लिखकर भी चर्चा में हैं। उनकी रचनाएं हंस, पहल, अक्षरपर्व, वसुधा, ज्ञानोदय, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य में छपी हैं। उनके दो उपन्यास, तीन व्यंग्य संग्रह और संस्मरणों व कहानियों के संग्रह सहित अब तक कुल बारह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें वागीश्वरी और अट्टहास सम्मान सहित कई पुरस्कार मिल चुके हैं। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल के लिए भी चित्र-कथाएं उन्होंने लिखी हैं। वे उपन्यास के लिए डाॅ. नामवरfसंह और व्यंग्य के लिए श्रीलाल शुक्ल से भी सम्मानित हुए हैं। उनका पता है: मुक्तनगर, दुर्ग छत्तीसगढ़ 491001 मो.9301148626 ई-मेलः vinod.sao1955@gmail.com

गढ़ कलेवा को बचा लो साहब

आज फिर रायपुर के छत्तीसगढ़ी कलेवा के ठीहा 'गढ़ कलेवा' जाने का अवसर मिला। बाहर बाइक और कार काफी संख्या में खड़े थे। वहां ग्राहकों के भीड़-भाड़ को देखकर दिल को सुकून मिला। बैठने के लिए बनाये गए परछी के अतिरिक्त बाहर खुले में बने पारंपरिक टेबलों में ग्राहक बैठे थे। खुले परिसर में चहल-पहल थी और काउंटर पर लोग स्वयं-सेवा करते हुए अपने पसंद का कलेवा खरीद रहे थे। कुछ दिगर-प्रांतीय सभ्रांत महिलाएं भी थी जो जाते समय छत्तीसगढ़ी डिस खरीद रही थीं, कुछ अपने बच्चों का गढ़ कलेवा के भित्ति आवरणों के साथ फोटो खींच रही थीं।
परिसर में घुसते हुए मुझे लगने लगा कि 'गढ़ कलेवा' हिट हो गया। देखकर आत्मिक आनंद आया कि हमारे प्रदेश की खान-पान परम्परा के प्रति शहरी लोगों में रूचि और सम्मान दोनों जागृत हुआ है।
हम (यानि अशोक तिवारी जी, शकुंतला तरार जी और मैं) छत्तीसगढ़ी के लब्ध प्रतिष्ठित संगीतकार खुमान साव जी के साथ थे। हमने आर्डर दिया, कलेवा परोसा गया, हमने खाया। कलेवा अपने पारंपरिक जायके के अनुसार स्वादिष्ट था।
अंदर प्लास्टिक के डिस्पोजलों में पानी और कलेवा सर्व करते वेटरों को देख कर खुमान साव जी ने चुटकी ली, वेटर सफाई मारने लगा। हमें काँसे के बर्तन में कलेवा सर्व किया गया किन्तु बर्तन गंदे थे, लग रहा था कि महीनो उसे मांजा नहीं गया है, तैलीयपन उन्हें छूते ही महसूस हो रहा था। जैसे किसी और का जूठा इस पवित्र बर्तन में समाया हुआ है। परछी के दीवारों में बने मोहक पारंपरिक भित्ति चित्र और झरोखों में धूल जमे थे, मकड़ी के जाले उभर आये थे। लग रहा था इसे महीनो से झाड़ा-पोंछा नहीं गया था। जमीन में मिट्टी जगह-जगह उखड़ी थी, गोबर से लिपी-पुती धरती गायब हो गई थी।
संस्कृति संचालनालय ने इसे अशोक तिवारी जी के मार्गदर्शन में, बड़ी आशा के साथ बनवाया था। मुख्य मंत्री ने इसका उद्घाटन किया था और इसकी प्रसंशा गाहे-बगाहे करते रहते थे। हमारी परम्परा को अक्षुण रखने के उद्देश्य से स्थापित इस केंद्र की इस कदर दुर्दशा देखकर अच्छा नहीं लगा। मेरा मानना है कि संस्कृति विभाग के साथ ही 'गढ़ कलेवा' का संचालन कर रही महिला समूह को भी ध्यान देना चाहिए, इसी परिसर के बदौलत वे अच्छा-खासा आय प्राप्त कर रहे हैं तो उनका कर्तव्य बनता है कि परिसर की पारंपरिकता को सहेज कर रखें।
नहीं तो, जिस परिकल्पना के साथ गढ़ कलेवा का निर्माण किया गया था वह कुछ महीनो में क्षीण पड़ने लगेगा और यही हाल रहा तो इसे समाप्त होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
-संजीव तिवारी

छत्तीसगढ़ में लोक संगीत के नागरी प्रस्तुति का बीजारोपण

प्रतिवर्ष की भांति 1948 में राजनांदगांव में गुजराती समाज के द्वारा दुर्गोत्सव मनाया जा रहा था। उस समय बीड़ी के व्यापारी मीरानी सेठ के घर के सामने दुर्गा रखा हुआ था। दुर्गा पंडाल में इस वर्ष भी शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम रखा गया था जिसमें रायपुर के प्रसिद्द संगीतकार अरुण सेन आमंत्रित थे। कार्यक्रम के बीच में सुगम और फ़िल्मी संगीत भी रखा गया था ताकि दर्शक शास्त्रीय संगीत से बोर न हों। इसमें खुमानसाव को फिल्मी संगीत की प्रस्तुति के लिए बुलाया गया था। इस कार्यक्रम में खुमान साव ने कुछ फिल्मी गीत प्रस्तुत किए जिसमें 'घर आया मेरा परदेसी' जैसे गाने प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रम सुनने वालों ने खुमान संगीत को बहुत पसंद किया। उसी दिन खुमान साव ने यह निश्चय किया कि महानगरों की भांति राजनांदगांव में भी एक आर्केस्ट्रा पार्टी का निर्माण किया जाए। इस कार्यक्रम से ही छत्तीसगढ़ में आर्केस्ट्रा पार्टी की परिकल्पना ने पहली बार पंख पसारा।

इसी वर्ष दुर्गा पक्ष के बाद ही खुमान साव ने खुमान एण्ड पार्टी के नाम से आर्केस्ट्रा पार्टी का गठन किया। उस समय महिलाएं आर्केस्ट्रा में नहीं गाती थीं। जो पुरुष गायक पार्टी में थे उनमे सुंदर सिंह ठाकुर जो बाद में ट्राइबल के सीओ हुए वे सहगल के गीत गाते थे। जयराम शुक्ल जो किशोरीलाल शुक्ला के भतीजे थे और बाद में तहसीलदार हुए वे और संतोष शुक्ला अन्य फिल्मी गीत गाते थे।

खुमान साव के आर्केस्ट्रा पार्टी ने तब धूम मचा दिया था। पूरे छत्तीसगढ़ में 'खुमान एण्ड पार्टी' की मांग आने लगी थी। उनकी पार्टी में धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए और 1948 से 50 तक खुमान आर्केस्टा का पूरे छत्तीसगढ़ में काफी धूम रहा। जब संगीत कलाकार बढ़ते गए तब उन्होंने 1952 में 'शारदा संगीत समिति' की स्थापना की जिसमें भी वो संगीत देने लगे। कलाकारों के बढ़ने के बाद 1959 में उन्होंने 'सरस्वती संगीत समिति' का गठन किया और आर्केस्ट्रा पार्टी अनवरत चलती रही। 1954 में जब वे जनपद स्कूल राजनांदगांव में शिक्षक नियुक्त हो गए उसके बाद उन्होंने अंतिम आर्केस्ट्रा पार्टी का जो संचालन किया उसका नाम 'राज भारती संगीत समिति' था, जिसे बाद में उनके शिष्य नरेंद्र चौहान जी चलाने लगे। 1962 में प्रसिद्द लोकसंगीतकार गिरजा सिन्हा और भैयालाल हेडाऊ के साथ मिल कर भी उन्होंने एक संगीत समिति का गठन किया जिसमे फ़िल्मी गीतों के साथ ही छत्तीसगढ़ी गीत भी प्रस्तुत किये जाने लगे। इस प्रकार से छत्तीसगढ़ में लोक संगीत के नागरी प्रस्तुति का बीजारोपण हुआ।
(खुमान साव पर संजीव तिवारी द्वारा लिखे जा रहे कलम घसीटी के अंश)
फेसबुक पर यह प्रस्‍तुति-

भट्ट ब्राह्मण कैसे

यह आलेख प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट जी नें इस ब्‍लॉग में प्रकाशित आलेख 'चारण भाटों की परम्परा और छत्तीसगढ़ के बसदेवा' की टिप्‍पणी के रूप में लिखा है। इस आलेख में वे विभिन्‍न भ्रांतियों को सप्रमाण एवं तथ्‍यात्‍मक रूप से दूर किया है। सुधी पाठकों के लिए प्रस्‍तुत है टिप्‍पणी के रूप में प्रमोद जी का यह आलेख -


झांसी की रानी थी भट्ट ब्राह्मण  
लोगों ने फिल्म बाजीराव मस्तानी और जी टीवी का प्रसिद्ध धारावाहिक झांसी की रानी जरूर देखा होगा जो भट्ट ब्राह्मण राजवंश (Bhatt Brahmin Dynasty) की कहानियों पर आधारित है। फिल्म में बाजीराव पेशवा (Bajirao Peshwa) गर्व से डायलाग मारता है कि मैं जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय हूं। उसी तरह झांसी की रानी (Queen of Jhansi) में मणिकर्णिका (रानी का बचपन का नाम) को काशी में गंगा घाट पर पंड़ितों से शास्त्रार्थ करते दिखाया गया है। देखने पर ऐसा नहीं लगता कि यह कैसा राजवंश है जो क्षत्रियों की तरह राज करता है तलवार चलता है और खुद को ब्राह्मण भी कहता है। अचानक यह बात भी मन में उठती होगी कि क्या राजा होना ही गौरव के लिए काफी नहीं था, जो यह राजवंश याचक ब्राह्मणों से सम्मान भी छीनना चाहता है। पर ऊपर की आशंकाएं निराधार हैं वास्तव में यह राजवंश ब्राह्मणों का है और इस राजवंश की स्थापना भी दक्षिण से हुई है।
 
पंडित विश्वेक्ष्वर भट्ट नें शिवाजी को दी थी छत्रपति की उपाधि
मराठा साम्राज्य के संस्थापक मराठा शासक शिवाजी भोसले के 1674 में छत्रपति की उपाधि ग्रहण करने के समय उनके क्षत्रिय होने पर विवाद हुआ था तब काशी के महान पंडित विश्वेक्ष्वर भट्ट (जिन्हें गागा भट्ट भी कहा जाता है) ने शास्त्रार्थ कर शिवाजी को क्षत्रिय प्रमाणित किया था और उनका राज्याभिषेक करवाया था। उस समय विश्व की सबसे बड़ी दक्षिणा पं.गागा भट्ट Gaga Bhatt को दी गई थी। यह दक्षिणा ही अपने आप में एक छोटे राज्य के बराबर थी। दक्षिणा से स्थापित हुआ यह देश का पहला छोटा ब्राह्मण राज्य था। मराठा राज्य के आधीन रहते हुए इसी छोटे राजवंश ने अपने को विकसित किया। तत्कालीन समय में उत्तर भारत से भट्ट ब्राह्मणों का बड़ी संख्या में महाराष्ट्र माइग्रेशन हुआ। इसी राजवंशी ब्राह्मणों में सन 1700 से 1740 के बीच बाजी राव पेशवा (Baji Rao Peshwa) मराठा सेनापति हुए जो अपनी बहादुरी के लिए बहुत प्रसिद्ध थे।  उन्होंने 41 लड़ाइयां लड़ीं जिसमें एक में भी वे पराजित नहीं हुए। इसी राजवंश ने आगे चलकर अपना विस्तार किया और उसकी एक शाखा में आगे चलकर  बुंदेलखंड के राजा गंगाधर राव नेवालकर की पत्नी (1828-1858) झांसी की रानी लक्ष्मी बाई हुईं जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध सन 1857 की लड़ाई लड़़ी और वीरगति को प्राप्त हुईं। आज पूरा विश्व उन्हें नारी सशक्तिकरण का प्रतीक मानता है। उनकी विद्वता की मिसाल यह थी कि उन्होंने न केवल अंग्रेजों को सामान्य शास्त्रार्थ में परास्त किया था बल्कि खुद अंग्रेजों की अदालत में भी उनके शासन को चुनौती दी थी।

आखिर भट्ट ब्राह्मण कैसे (Bhatt are Brahmin)
अब हम अपने मूल प्रश्न पर आते हैं कि आखिर भट्ट ब्राह्मण कैसे (Bhatt are Brahmin) जिन पर कई लेखों में विपरीत टिप्पणियां अंकित हैं। संस्कृत-हिन्दी कोश (वामन शिवराम आप्टे) में भट्टों की उत्पत्ति (bhatt brahmin ki utpatti) के बारे में एक सूत्र दिया गया है- क्षत्रियाद्विप्रकन्यायां भट्टो जातो..नुवाचकः। इसकी व्याख्या में आगे पढ़ने पर पता चलता है कि विधवा ब्राह्मणी और क्षत्रिय पिता से उत्पन्न जाति भट्ट हुई। अगर इसे सत्य मान लिया जाए तो इस संयोग से उत्पन्न जाति ब्राह्मण नहीं बल्कि क्षत्रिय होगी। जबकि ऐसा कदापि नहीं है सभी भट्ट स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं और तदानुसार आचरण भी करते हैं। वास्तव में भट्टों की उत्पत्ति के लेख से दुर्भावना पूर्वक छेड़छाड़ की गई है। ऊपर दिए गए सूत्र का क्रम परिवर्तित किया गया है जिसके कारण भ्रम की स्थिति निर्मित हुई है और जिससे उसके बाद की कड़ियां नहीं जुड़ती हैं। भट्ट ब्राह्मण वंश में पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होने वाली जानकारी में यह क्रम ब्राह्मण पिता और क्षत्रिय माता का है। इसके ऐतिहासिक प्रमाण भी हैं। 

एतिहासिक पृष्‍टभूमि 
वंशानुगत जानकारी के अऩुसार प्राचीन काल में युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में क्षत्रिय मारे जाते थे। उनकी युवा विधवाओं को ब्राह्मणों को उपपत्नी के रूप में दे दिया जाता था। इस तरह इस जाति का प्रादुर्भाव युद्धों की त्रासदी से हुआ है। यह परंपरा किस सदी तक जारी रही इस बारे में जातीय इतिहास मौन है। जबकि उपरोक्त छेड़छाड़ के बाद जो स्थितियां बन रहीं है इसका कोई प्रमाणिक ऐतिहासिक घटनाक्रम से कोई जुड़़ाव नहीं है। इतिहास में कभी भी ऐसी कोई घटना दर्ज नहीं है जिसमें युवा ब्राह्मणों की बड़ी संख्या में मृत्यु हुई हो और बड़ी संख्या में युवा ब्राह्मणियां विधवा हुई हों जिन्हें क्षत्रियों ने पत्नियों के रूप में स्वीकारा हो तथा नई जाति विकसित हुई हो। वैसे भी प्राचीन भारतीय समाज में प्रतिलोम विवाह वर्जित थे। इसके अलावा मान भी लें कि एकआध घटनाएं किसी कारणवश हुईं भी हों तो उससे कम से कम जाति विकसित नहीं हो सकती है।

शब्दकोश के अनुसार भट्ट के अर्थ 
1. प्रभु ,स्वामी (राजओं को संबोधित करने के लिए सम्मान सूचक उपाधि) 
2. विद्वान ब्राह्मणों के नामों के साथ प्रयुक्त होने वाली उपाधि 
3. कोई भी विद्वान पुरुष या दार्शनिक 
4. एक प्रकार की मिश्र जाति जिनका व्यवसाय भाट या चारणों का व्यवसाय अर्थात राजाओं का स्तुति गान है। 
5. भाट, बंदीजन। 
उपरोक्त अर्थ में देखते हैं कि एक ही शब्द के अर्थ में चार जातियों को एक साथ लपेट दिया गया है भट्ट, भाट, चारण और बंदीजन। भट्ट स्वयं को कुलीन ब्राह्मण घोषित करते हैं वे सम्पन्न हैं उनमें डाक्टर, इंजीनियर,वैज्ञानिक से लेकर मंत्रियों तक के पद पर लोग सुशोभित हैं, दूसरी तरफ चारण जाति मुख्यतः राजस्थान में रहती है। ये चारण जाति स्वयं को क्षत्रिय कुल से संबंधित बताती है, इसके अलावा वे स्वयं को विद्वान बताते हैं तथा उनका अपना इतिहास bhatt brahmin history है। बंदीजन नामक जाति वर्तमान में दिखाई नहीं पड़ती है और रहा सवाल भाट का तो वह पिछड़ी जाति में शामिल पाई जाती है  तथा कहीं-कहीं इसके याचक वर्ग से होने के तो कहीं पर उनके द्वारा खाप रिकार्ड रखने की जानकारी मिलती है। यह जाति छोटे-मोटे व्यवसाय धंधे करती है। इसके अलावा इसके पास बड़ी जमीनें भी नहीं हैं। भाट स्वयं के ब्राह्मण होने का कोई दावा तक प्रस्तुत नहीं करते हैं। अब सवाल उठता है कि जब भट्ट का मतलब विद्वान ब्राह्मणों की उपाधि है तो फिर उस नाम की जाति निम्नतर कैसे हो गई। वास्तव में भट्टों को षड़यंत्रपूर्वक भाट में शामिल बता कर अपमानित करने का प्रयास किया जाता है ताकि उन्हें बदनाम कर उनके समाज में वास्तविक स्थान से पद्-दलित किया जा सके।

भट्टों की जातीय अस्मिता को कैसे तोड़ा मरोड़ा गया है इसका प्रमाण स्वयं शब्द कोश में ही मिलता है। शब्दकोश में भट्टिन शब्द के अर्थ देखें 1. (अनभिषिक्त) रानी, राजकुमारी  (नाटकों में दासियों द्वारा रानी को संबोधन करने में बहुधा प्रयुक्त) 2. ऊंचे पद की महिला 3. ब्राह्मण की पत्नी। उसी प्रकार शब्दकोश का एक और शब्द को लें ब्राह्मणी अर्थ है- 1. ब्राह्मण जाति की स्त्री 2. ब्राह्मण की पत्नी 3. प्रतिभा (नीलकंठ के मतानुसार बुद्धि). ४. एक प्रकार की छिपकली ५. एक प्रकार की भिरड़  ६. एक प्रकार की घास। ऊपर के दोनों शब्दों से ज्ञात होता है कि भट्टिन ऐसी रानी है जो वर्तमान में राजकाज से बाहर है या राजकुमारी है और वो ब्राह्मण की पत्नी है। जबकि ब्राह्मणी का सीधा अर्थ ब्राह्मण की पत्नी से है। अब आप भट्टिन का कितना भी अर्थ निकालने की कोशिश करिए भट्टिन भट्ट की पत्नी नहीं है अगर वह भट्ट की पत्नी है तो पदच्युत रानी नहीं है न राजकुमारी है और न आपके भट्ट की उत्पत्ति सूत्र के अनुसार ब्राह्मण की पत्नी है। जबकि आप किसी भी ब्राह्मण की पत्नी को आज भी भट्टिन नाम से नहीं पुकार सकते हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि भट्ट ब्राह्मणों के पारंपरिक वाचिक इतिहास में जो भट्टों की उत्पत्ति (origin of bhatt brahmin) की बात कही जाती है वह सतप्रतिशत सत्य है और शब्दकोश में जो भट्टिन शब्द के अर्थ आए हैं वास्तव में वो प्राचीन काल के ब्राह्मण की दूसरी-पत्नी के संबंध में है। इस प्रकार राजवंशी भट्टिन से उत्पन्न जातक ही भट्ट कहलाए। चूंकि भट्टों का मातृपक्षा राजवंशी रहा है इसलिए यह जाति स्वयं के नाम के साथ राज सूचक शब्द राव लगाना अपनी शान समझती है। इस तरह कहा जा सकता है कि भट्ट अपनी उत्पत्ति से ही कुलीन, सम्पन्न व राजवंशी ब्राह्मण जाति है जिनका भाटों से दूर-दूर का संबंध नहीं है। केवल दो ब्राह्मण समुदायों के बीच चले सत्ता संघर्ष के कारण इस तरह का भ्रम फैलाया गया है।

भट्टों को अपमानित करने के लिए फैलाया गया एतिहासिक भ्रम
आइए देखते हैं भट्टों के विरुद्ध वो ऐतिहासिक कारण क्या हैं जिनके कारण उन्हें अपमानित करने के लिए भ्रम फैलाया गया। वास्तव में प्राचीन काल में विधवा राजकन्याओं और ब्राह्मण पिता से उत्पन्न राजवंशी ब्राह्मण जाति ने बाद में पिता की वृत्ति में अपना उत्तराधिकार मांग लिया। तब समाजिक बंटवारे में उन्हें पुरोहिती कर्म से पृथक करते हुए वेदों का अध्ययन, ज्योतिष, धर्मशास्त्रों का प्रचार और केवल शिव तथा शिव-परिवार के मंदिरों में पुजारी बनने का अधिकार दिया गया। इसके वर्तमान उदाहरण में नेपाल के पशुपतिनाथ के प्रमुख पुजारी परिवार विजेन्द्र भट्ट तथा इंदौर के खजरानें गणेश मंदिर भट्ट पुजारियों का नाम लिए जा सकते है। महाराष्ट्रीय देशस्थ भट्ट ब्राह्मणों का गणेश उपासना के प्रति आकर्षण भी इसी ऐतिहासिक सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है। इस परंपरा के अन्य अवशेष देखें तो उज्जैन महाकाल मंदिर में भी भट्ट ब्राह्मणों की पुरोहितों की भीड़ में तख्तियां भी देखीं जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त इस बात की जानकारी पुरानी पीढ़ी से या फिर कई पुराने रिकार्ड से भी मिल सकती है।

भट्ट ब्राह्मणों का समाज में योगदान  World famous prominent Bhatt Brahmins and their works  प्रमुख भट्ट महापुरूष

राजवंशी भट्ट ब्राह्मणों ने वेदों के अध्ययन के अलावा आगे चलकर वेदों की मीमांसा (वैदिक वाक्यों में प्रतीयमान विरोध का परिहार करने के लिये ऋषि-महर्षियों द्वारा की गई छानबीन ) में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जिन प्रमुख आचार्यो ने टीकाओं या भाष्यों की रचना की उनमें हैं-

1. सूत्रकार जैमिनि, 2. भाष्यकार शबर स्वामी 3. कुमारिल भट्ट 4. प्रभाकर मिश्र 5. मंडन मिश्र,6. शालिकनाथ मिश्र 7. वाचस्पति मिश्र 8. सुचरित मिश्र 9. पार्थसारथि मिश्र, 10. भवदेव भट्ट,11 भवनाथ मिश्र, 12. नंदीश्वर, 13. माधवाचार्य, 14. भट्ट सोमेश्वर, 15. आप देव,16. अप्पय दीक्षित, 17. सोमनाथ 18. शंकर भट्ट, 19. गंगा भट्ट, 20. खंडदेव, 21. शंभु भट्ट और 22. वासुदेव दीक्षित शामिल हैं। इस तरह हम देखते हैं कि 22 में से 6 भट्ट आचार्यों ने वेदों की मीमांसा की है।

भट्ट ब्राह्मणों के महापुरुषों की उपस्थिति ईसा पूर्व 5 वीं शताब्दी से मिलनी शुरू हो जाती है जिसमें सर्वप्रथम आते हैं-
आर्यभट्ट (476-550 सीई)- नक्षत्र वैज्ञानिक जिनके नाम से भारत का प्रथम उपग्रह छोड़ा गया।
वाग्भट्ट (6वीं शताब्दी)- आयुर्वेद के प्रमुख स्तंभ दिनचर्या, ऋतुचर्या, भोजनचर्या, त्रिदोष आदि के सिद्धान्त उनके गढ़ हुए हैं।
बाण भट्ट (606 ई. से 646 ई.)-संस्कृत महाकवि इनके द्वारा लिखित कादंबरी संस्कृत साहित्य की प्रथम गद्य रचना मानी जाती है।
कुमारिल भट्ट (700 ईसापूर्व)- सनातन धर्म की रक्षा के लिए जिन्होंने आत्मोत्सर्ग किया।
भवभूति (8वीं शताब्दी)- संस्कृत के महान कवि एवं सर्वश्रेष्ठ नाटककार। 
आचार्य महिम भट्ट  (11 वीं शताब्दि)- भरतमुनी के नाट्यशास्त्र के प्रमुख टीकाकार आचार्य।
चंद बरदाई (1149 – 1200)- पृथ्वीराज चौहान के मित्र तथा राजकवि जिन्होंने चौहान के साथ आत्मोत्सर्ग किया।
जगनिक (1165-1203ई.)- विश्व की अद्वतीय रचना आल्हा के रचयिता जिन्होंने ऐतिहासिक पात्रों को देवतातुल्य बना दिया।
भास्कराचार्य या भाष्कर द्वितीय (1114 – 1185)- जिन्होंने अंक गणित की रचना की।
वल्लभाचार्य (1479-1531)- पुष्टिमार्ग के संस्थापक तथा अवतारी पुरुष।
सूरदास  (14 वीं शताब्दी)- साहित्य के सूर्य, साहित्य में वात्सल्य रस जोड़ने का गौरव।
राजा बीरबल  (1528-1586)-असली नाम महेश दास भट्ट मुगल बादशाह अकबर के नौ रत्नों में प्रमुख।
गागा भट्ट (16 वीं शताब्दी)- छत्रपति शिवाजी महराज के राजतिलक कर्ता।
पद्माकर भट्ट (17 वीं शताब्दी)-रीति काल के ब्रजभाषा के महत्वपूर्ण कवि।
तात्या टोपे (1814 - 1859)-1857 क्रांति के प्रमुख सेनानायक।
बाल गंगाधर तिलक (1856-1920)-प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतन्त्रता सेनानी।
पं. बालकृष्ण भट्ट (1885-1916)-भारतेंदु युगीन निबंधकारों में विशिष्ट स्थान।
श्री राम शर्मा आचार्य (1911-1990)- गायत्री शक्तिपीठ के संस्थापक।
पं.राधेश्याम शर्मा ( दद्दा जी, 20 वीं शताब्दी)- पथरिया मध्यप्रदेश निवासी पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. विद्याचरण शुक्ल के गुरु जिनके नाम से उनके फार्म हाउस का नाम है। 


आज पूरे भारत में भट्ट ब्राह्मणों की उपस्थिति कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर बंगाल तक है। ब्राह्मणों में भट्टों जाति सबसे बड़ी है। रही बात राजनैतिक स्थिति की तो कई राज्यों में भट्ट ब्राह्मणों को बिना मंत्रिमंडल में शामिल किए मंत्रिमंडल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है उसमें उत्तराखंड, गुजरात, पं.बंगाल शामिल हैं जबकि महाराष्ट्र में स्थिति इसके ठीक उलट है वहां भट्ट ब्राह्मणों का मंत्रिमंडल में वर्चस्व होता है और बाकी की जातियां विरोध में ऩजर आती हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि भट्ट जन्म से ही कुलीन एवं सम्पन्न ब्राह्मण थे और हैं। हमे गर्व है कि हम भट्ट हैं जिनका इतना चमकदार इतिहास है।
प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट
(प्रमोद ब्रम्‍हभट्ट जी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, वर्तमान में रायपुर के प्रतिष्ठित दैनिक अखबार 'जनता से रिश्‍ता' से जुड़े हैं)

फिर याद आये सीता शरण जोशी

आज हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. उरगावकर के पास मैं अपने कंधे की चेकअप के लिए गया था। वहां इंतजार करते मरीजों के बीच एक लड़का मिला जिसके हाथ में ताजा प्लास्टर बंधा था। वहां बैठे अधिकांश मरीज छत्तीसगढ़ में रहने वाले गैर छत्तीसगढ़िया नजर आ रहे थे। मने छत्तीसगढ़ का खाने और छत्तीसगढ़ का ही बजाने वाले।
मैंने बच्चे से छत्तीसगढ़ी में हाथ टूटने का कारण पूछा। उसने लजाते हुए जवाब दिया कि आम तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ गया था वहां से गिर गया। मैंने पूछा किसके साथ आए हो तो उसने कहा, मां के साथ। पढाई, भाई-बहन, मां-बाप अदि के बारे में पूछने पर वह संक्षिप्त उत्तर दे रहा था। उसने कहा कि पिताजी नहीं है, मैंने पूछा, क्या पिता की मृत्यु हो गई? तो उसने उत्तर नहीं दिया। जब दो-तीन बार पूछा, कुरेदा तो वह खीझ से बोला '*दरो के ह भाग गे हे!'
अचानक उसके मुह से निकले वाक्य को सुनकर वहां बैठे मरीज हंस पड़े। उसी समय उसकी मां ने डिस्पेंसरी में प्रवेश किया, उसकी हाथों में दवाइयाँ थी। अपने बच्चे से बात करते देख कर वह महिला मेरे बाजू में बैठ गयी। लगभग 40 साल की उस ग्रामीण महिला ने चर्चा में बताया कि, उसके दो बच्चे हैं, एक लड़की इससे एक साल छोटी है। इनका बाप ठेकेदार था, मुझे 'बनाकर' रखा था, चार साल पहले हमें छोड़ कर भाग गया। लहुट के नहीं आया भडवा, बिहारी था रोगहा, अब इतने बड़े इंडिया में उसे कहाँ खोजूं।
मैंने सुना था कि जवान लड़कियां घर छोड़ कर भाग जाती हैं किसी लड़के के साथ। औरतें पति छोड़कर भाग जाती हैं किसी मर्द के साथ पर ये पुरुष ...?
मैं ज्यादा कुछ सोचता तब तक कंपाउंडर ने मुझे डॉक्टर के केबिन में बुला लिया। मेरे कंधे का दर्द और बढ़ गया था, लुटी छत्तीसगढ़ बच्चे को कंधे में उठाकर डिस्पेंसरी से बाहर निकल रही थी।
-तमंचा रायपुरी

सम्मान खरीदने के लिए रहीसी और बीमार साथी के लिए गरीबी

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया में दो विरोधाभाषी साहित्यिक संवेदनशीलता को देख रहा हूं। पिछले दिनों दुर्ग के सभी समाचार पत्रों में एक समाचार प्रकाशित हुआ जो लगभग चौथाई पेज का समाचार था। जिसमें दुर्ग के पास स्थित एक गांव में वृहद साहित्य सम्मेलन का समाचार, विस्तार से छापा गया था। जिसमें 8 प्रदेशों के साहित्यकारों के दुर्ग आगमन का समाचार था एवं 95 साहित्यकारों को पुरस्कार दिए जाने के संबंध में जानकारी दी गई थी। इस कार्यक्रम के संबंध में पिछले दिनों कुछ साहित्यकार मित्रों ने मुझसे, दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य समिति के सचिव होने के कारण, जानकारी चाही थी। तब मैंने इस कार्यक्रम के आयोजक और इस कार्यक्रम के संबंध में अपनी अनभिज्ञता जताई थी, क्योंकि कार्यक्रम के आयोजक के संबंध में या उनके साहित्य के संबंध में ज्यादा कुछ जानकारी मुझे नहीं थी। बल्कि साहित्य की राजनीति से कुछ लोग अपना रोजगार चलाते हैं ऐसी जानकारी मुझे प्राप्त थी। जिसे मैंने अपने मित्रों को दी, तो उनमें से कुछ लोगों का दलील था कि पंद्रह सौ रुपया ही तो मांगे हैं। पंद्रह सौ रुपया में एक स्मारिका प्रकाशित करवा रहे हैं और हमें बड़े साहित्यिक कार्यक्रम में पुरस्कृत कर रहे हैं, तो 15 सौ रुपया देना वाजिब है, बिचारा मुफ्त में थोड़ी कार्यक्रम करवाएगा?
95 लोगों को पुरस्कार देने में कितना समय लगा होगा, इसका आकलन कर रहा हूं। एक व्यक्ति को पुरस्कार देने उसके बाद पोज देकर फोटो खिंचवाने में लगभग 1 मिनट का समय तो लगना ही है। इस प्रकार से 95 लोगों को पुरस्कार देने में कम से कम 2 घंटे लगे ही होंगे। बाकी अखिल भारतीय साहित्य सम्मलेन क्या हुआ होगा यह समझ से परे है। खैर ....
इधर पिछले चार-पांच दिनों से, छत्तीसगढ़ के एक आर्थिक रूप से विपन्न साहित्यकार के गंभीर रुप से बीमार होने एवं इलाज के लिए वित्तीय सहायता के संबंध में एक ग्रुप चलाया जा रहा है। जिसमें लगातार उस साहित्यकार के स्वास्थ्य की स्थिति और सहायता पहुंचाने के माध्यमों की जानकारी दी जा रही है। इस ग्रुप के कई सदस्य अन्य ग्रुपों में भी सहायता हेतु अनुरोध कर रहे हैं। इस प्रकार से उस साहित्यकार को सहायता के लिए हजारों साहित्यकारों तक संदेश पहुंचाया जा चुका है। आज सुबह उस साहित्यकार को पहुंचाए जाने वाले कुल सहयोग राशि रु. 25000 तक पहुची थी।
मुझे आश्चर्य हो रहा है कि, कितना अपील करने के बावजूद इस गरीब साहित्यकार के लिए आवश्यक पैसे की व्यवस्था नहीं हो पा रही है।
दूसरी तरफ अपने कचरा साहित्य को विश्व का महानतम साहित्य मानते हुए, ₹1500 खर्च कर, घुरुवा पुरस्कार लेने (मने खरीदने) के लिए पिले पड़े हैं। उसके साथ ही ₹1000 का यात्रा व्यय अलग। उस आयोजक ने ₹1500 प्रति साहित्यकार के हिसाब से लाखों कमाई किया होगा। हालांकि यह भी ज्ञात हुआ कि वह तथाकथित वसुलीवाला साहित्यकार सभी 95 लोगों से रुपया नहीं लिया है, नए और उखलहा साहित्यकारों से ही पैसा लिया है जो लगभग 50 की संख्या में है। इस प्रकार से लगभग 75000 का पुरस्कार-सम्मान व्यवसाय हो गया है। दूसरी तरफ गरीब साहित्यकार को इलाज के लिए ₹ 50000 भी इकट्ठे नहीं हो पा रहे हैं।
-तमंचा रायपुरी

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