ब्लॉग छत्तीसगढ़

20 January, 2013

जी अरझना और जी कल्लाना

छत्तीसगढ़ी मुहावरे "जी अरझना" का भावार्थ इंतजार करना एवं "जी कल्लाना" का भावार्थ व्याकुल होना है। इन दोनों मुहावरे में ‘जी’ के साथ दो अलग अलग छत्तीसगढ़ी शब्द का प्रयोग हुआ है।

पहले मुहावरे में प्रयुक्त ‘अरझना’ छत्तीसगढ़ी अकर्मक क्रिया शब्द है। यह संस्कृत शब्द अवरूंधन के अपभ्रंश से बना है जिसका आशय फंसना, लटकना, अटकना, उलझना से है। इसी से बने शब्द ‘अरझाना’ का आशय फंसाना, लटकाना, अटकाना, उलझाना से है।

दूसरे मुहावरे मे प्रयुक्त छत्तीसगढ़ी शब्द ‘कल्लाना’ अकर्मक क्रिया है यह संज्ञाहीन होने के लिए प्रयुक्त संस्कृत शब्द ‘कल्’ से बना है। छत्तीसगढी में इस शब्द का प्रयोग रगड़ने, रगड़ाने, बाल आदि पकड़कर खींचने से त्वचा में दर्द होने, जलन होने, दुखदाई होने पर होता है। शब्दशास्त्री इसे संस्कृत शब्द ‘कल’ यानी चैन, सुख और हिन्दी शब्द ‘हरना’ यानी हरण से मिलकर बना मानते हैं। इस प्रकार से बेचैन, सुख ना रहने, परेशान होने, विलाप करने के लिए ‘कल्लाना’ शब्‍द का प्रयोग होने लगा होगा। केन्द्रीय छत्तीसगढ़ी भाषी क्षेत्र में ‘कल्लाना’ का सीधा अर्थ बाल को खीचने से होने वाले दर्द के रूप मे प्रचलित है।

इससे बने या इसके नजदीक के शब्दों में विलाप करने के लिए प्रचलित शब्‍द ‘कल्लई’, ‘कल्हरना’ व ‘कलपना’ है जो दुख के भाव को ही प्रकट करता है। कल नहीं पड़ने के भाव पर बने अन्य शब्दों में ‘कलबलाना’ का आशय व्याकुल होना या तिलमिलाना, दर्द के कराह के कारण जोर जोर से रोना है।

2 comments:

आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

loading...

Popular Posts