ब्लॉग छत्तीसगढ़

10 September, 2010

कठफोडवा और ठेठरी खुरमी : कुछ चित्र

पिछले कुछ दिनों से मेरे घर के बागवानी के लिए सुरक्षित रखे गए स्‍थान में एक सूखी लकड़ी पर एक चिडि़या लगातार चोंच मार रही थी, मेरा पुत्र उसको उत्‍सुकता से देखता था और  उत्‍सुकता के कारण मुझसे उसके संबंध में जानकारी मांगता था। वह सुन्‍दर चिडि़या लकड़ी में छेद करने का प्रयास कर रही थी जिसके कारण यह माना जा सकता था कि वह कठफोड़वा ही होगी किन्‍तु छत्‍तीसगढ़ के गांवों में देखे मेरे आंखों और स्‍मृतियों में समाये कठफोड़वा से उसकी छवि कुछ अलग थी जिसके कारण मैं फैसला नहीं कर पा रहा था कि यह वही चिडि़या है। .. किन्‍तु यह दो-तीन दिनों में ही उसने उस लकड़ी में अपने घुसने लायक जगह बना ली तो यह विश्‍वास पक्‍का हो गया कि यह कठफोड़वा ही है। ... हालांकि उस लकड़ी के सहारे मेरी श्रीमती नें कपड़ा सुखाने का तार बांध रखा है जो अब कमजोर हो चला है फिर भी चिडि़या के लगातार मेहनत और सूखी लकड़ी को चोंच में अपने आकार से बड़ा छेद करने की लगन को देखकर मन प्रसन्‍न हुआ। क्रमिक रूप से उस चिडि़या के प्रयासों को हमारी श्रीमती जी नें कैमरे में कैद किया जिसे हम अपने ब्‍लॉग एल्‍बम में सुरक्षित रख रहे हैं ताकि सनत रहे वक्‍त पर काम आवे .......





हमारी श्रीमती ने इन चित्रों के साथ हमारे लिए छत्‍तीसगढ़ के पारंपरिक व्‍यंजन ठेठरी-खुरमी भी पेश किया, जिसे पाठकों और तिजहारिनों को ललचाने के लिए हम यहां लगा रहे हैं.
आप सभी का स्‍वागत है, ठेठरी-खुरमी मिलने की गारंटी ... टिल स्‍टाक.

22 comments:

  1. कई नमूना, कई जात के कठफोड़वा होथे. बेरा उगत ले सांझ तक ठक्‍-ठक सुनात रथे, खासकर गरमी चालू होत दिन मं, ते हर अयी चिराई के आय. ए हर दखथिे कम, सुनाथे जादा. अउ एकर माथा म तिलक, सेंदुर बुकाए कस लाल रथे. e-thethari, khurami भी मजेदार हय.

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

    हिन्दी का विस्तार-मशीनी अनुवाद प्रक्रिया, राजभाषा हिन्दी पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

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  3. बने हे ठेठरी-खुरमी हां। बने सवाद ले भैया।
    भौजी तीजा नई गे हे का? अइसने लगत हे मोला

    जोहार

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  4. ... behatreen ... laajavaab ... sugghar habay gaa !!!

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  5. इस पक्षी के कृत्य देखकर तो साफ़ लगता है की ये कठफोड़वा ही है. सुन्दर चित्र. हाँ आपकी ठेठरी देख कर बिहार के छट पर्व पर बनाने वाले ठेकुआ की याद आ गयी.

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  6. तस्वीरें बहुत अच्छी हैं मगर ये ठेठरी-खुरमी की पाक विधी भी भाभी जी से पूछ कर लिखते तो अच्छा था। धन्यवाद।

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  7. कतका बढ़िया पोस्ट डारे हस भईया. मेहनत हा रंग लानबेच करथे. चिरई अउ भौजी दूनू के मेहनत के रंग हा छिटके हवे ए पोस्ट म. बधाई.

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  8. सुंदर चित्र : बहुत दिनों बाद कठफोड़वा दिखा. धन्यवाद्

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  9. ham hu ha abhicche Thethri kkhurmi khaa ke bas aapke ye post la padhat han...

    bane laagis jhammo photo

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  10. व्यंजन देख कर मन ललचा गया।

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  11. शुक्र है कि पानी मुंह में ही आता है हाथों में नहीं वर्ना टिप्पणी करना मुश्किल होता :)

    वर्षों बाद कठफोडवा देखा है ! सोच रहा हूं कि उसे आपका घर क्यों भाया ?

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  12. ठेठरी-खुरमी का स्वाद आ गया......


    तस्वीरें बढ़िया रहीं.

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  13. .
    पहली बार देखा कठफोड़वा । और स्वादिष्ट व्यंजन ने तो मज़ा ला दिया। कभी आपके घर आना हुआ तो भाभी जी के हाथ के फरे खाऊँगी ।

    इस सुस्वादु पोस्ट के लिए आपका आभार।
    .

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  14. ये दे खवईया आगे
    ले अब रांध-बने जेवन खवा।

    हा हा हा

    जोहार ले

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  15. donon hi vynjanon ke leye bhabhi ko badhai...hamari or se bhabhee jee ko teez kee badhayon ke saath charn sprsh karna..

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  16. जय हो महराज अउ महराजिन के । गजानन महराज ए बछर ल सुघर राखे । गाड़ा-गाड़ा बधई ।

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  17. भगवान श्री गणेश आपको एवं आपके परिवार को सुख-स्मृद्धि प्रदान करें! गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें!
    बहुत सुन्दर तस्वीरें है! इतना स्वादिष्ट खाना देखकर मुँह में पानी आ गया!

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  18. भैया परनाम,
    आप मन हा पाछु के पोस्ट में फरा देखा के ललचा दे रहेव अउ ऐ खानी ठेठरी खुरमी.......कठफोड़वा के बिसे माँ भी आप मन ले बने जानकारी मिलिस हवे फोटू माँ ही सही फेर कठफोड़वा देखे बर त मिलिस............आप मन ला गणेश चतुर्थी के बधाई अउ गाडा गाडा जोहार !!

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  19. एक साल तक छत्तीसगढ़ में रहा हूँ बचपन में। उम्र थी लगभग 9-10 वर्ष की। पर इन व्यंजनों की याद नहीं है। लेकिन हैं ये ललचाने वाले।
    यहाँ इन्दौर में तो पक्षी, इंसानों के डर से गायब हो गए हैं।

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  20. देर से देखा ..अब तक तो स्टॉक समाप्त हो गया होगा । अगली बार कब बनेगा फोन करके बताना ।

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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