ब्लॉग छत्तीसगढ़

06 May, 2010

आनलाईन भारतीय आदिम लोक संसार

हिन्‍दी साहित्‍य की बहुत सी किताबें पीडीएफ फारमेट में पहले से ही उपलब्‍ध हैं जिसके संबंध में समय समय पर साथियों के द्वारा जानकारी प्रदान की जाती रही है. हम सब अब इनका उपयोग भी करने लगे हैं, मेरी रूचि जनजातीय सांस्‍कृति परंपराओं में रही है जिससे संबंधित पुस्‍तकें क्षेत्रीय पुस्‍तकालयों में लगभग दुर्लभ हो गई हैं किन्‍तु डिजिटल लाईब्रेरी योजना नें इस आश को कायम रखने का किंचित प्रयास किया है. पिछले कुछ दिनों से पोस्‍ट लेखन से दूर,  लोककथाओं के आदि संदर्भों की किताबों के नामों की लिस्‍ट मित्रों से जुगाड कर हमने नेट के महासागर में उन्‍हें खंगालने का प्रयास किया तो जो जानकारी हमें उपलब्‍ध हुई वह हम आपके लिये भी प्रस्‍तुत कर रहे हैं.

डिजिटल लाईब्रेरी परियोजनाओं के संबंध में लोगों, साहित्‍यकारों व लेखकों की सोंच जैसे भी हो, हमारे जैसे नेटप्रयोक्‍ताओं के लिए यह बडे काम की है. शोध छात्रों के लिए तो यह और भी महत्‍वपूर्ण साधन है, इससे शोध विषय सामाग्री के लिए अलग अलग स्‍थानों के विश्‍वविद्यालयीन व अन्‍य पुस्‍तकालयों में चुनिंदा पुस्‍तकों को पढने के लिए जाकर समय व धन खपाने की अब आवश्‍यकता नहीं रही. भारतीय विश्‍वविद्यालयों द्वारा कुछ शोध पत्रों के डिजिटल किए जाने एवं अमेरिकन डिजिटल लाईब्रेरी, गूगल व अन्‍य संस्‍थाओं के द्वारा इस संबंध में उल्‍लेखनीय कार्य किये जाने से अब अहम किताबे आनलाईन हो गई है. जिसके कारण हमें अपनी रूचि के आदि संदर्भों की किताबें नेट पर सुलभ रूप से उपलब्‍ध हो रही हैं. हांलाकि अधिकांश पुस्‍तकें अपने मूल अंगेजी भाषा में उपलब्‍ध हैं किन्‍तु धीरे धीरे हिन्‍दी में भी ये पुस्‍तकें उपलब्‍ध होंगी इस बात का अब भरोसा हो चला है। 
छत्‍तीसगढ़ की लोकगाथाओं व लोककथाओं पर गिनती के लोगों नें काम किया है उनके कुछ प्रकाशन भी सामने आये हैं किन्‍तु वे पुस्‍तकें बाजार में उपलब्‍ध नहीं होने के कारण हमारे और आपके काम की नहीं हैं. ऐसे में देशबंधु लाईब्रेरी रायपुर और शहीद स्‍मारक रायपुर की लाईब्रेरी के शरण के अतिरिक्‍त हमारे पास कोई चारा नहीं है. हममें से अधिकांश नें अपने ग्रामीण परिवेश जीवन में पारंपरिक गाथाओं व कहानियों को वाचिक रूप से सुना होगा. मेरी सोंच के अनुसार वर्तमान वैज्ञानिक परिवेश वाचिक परंपराओं के प्रवाह का उतार है, अब हम अपनी अगली पीढी को कहानियां नहीं सुनाने वाले. अगली पीढी कथा-गाथा-परंपराओं को नेट में देखकर पढ ले तो हमारी खुशनसीबी है.

आईये संदर्भ ग्रंथों का प्रकाशन अवधि के क्रम से उपलब्‍ध नेट झलकिंयां देखें -
   
आदिम छत्‍तीसगढ़ की परंपराओं व मानवशास्‍त्रीय अध्‍ययन के लिए प्रसिद्ध सन् 1916 में प्रकाशित रचना रसैल (R.V. Russell) व हीरालाल (Rai Bahadur Hira Lāl) की ट्राईब्‍स एण्‍ड कास्‍ट आफ सेन्‍ट्रल प्रोविन्‍सेस (The Tribes and Castes of the Central Provinces of India) रही है जिसमें क्षेत्र के परंपराओं के साथ ही लोककथाओं की झलकें चित्रमय उपलब्‍ध हैं. इस ग्रंथ के तीन भाग I, II, IV आनलाईन उपलब्‍ध हैं. रसेल की यह प्रसिद्ध किताब The Tribes and Castes of the Central Provinces of India--Volume I (of IV) एक अन्‍य लिंक पर आनलाईन उपलब्‍ध है.
जनजातीय समाज के संबंध में दूसरा महत्‍वपूर्ण ग्रंथ सन् 1938 में आक्‍सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, मुम्‍बई से प्रकाशित डब्‍लू.बी.ग्रिग्‍सन (W. V. Grigson) का मोनोग्राम मारिया गोंड्स ऑफ बस्‍तर (The Maria Gonds of Bastar) है किन्‍तु यह आनलाईन पढने के लिए नहीं बल्कि अमेजन डाट काम से खरीदने के लिये उपलब्‍ध है.
मध्‍य प्रदेश के आदिम जनजातियों से संबंधित लोक कहानियों के संग्रह का प्रथमत: गम्‍भीर प्रयास सर रिचर्ड टेम्‍पल और एस.हिलस्‍य द्वारा किया गया था जिसके किताब का नाम हमें ज्ञात नहीं है संदर्भों में इनका उल्‍लेख आता है कि यह लेख संग्रह 1866 में प्रकाशित हुआ था. अंतरजाल में यह हमें नहीं मिल पाया.
सुश्री मेरी फेरे (Mary Frere) द्वारा लोककथाओं के संग्रह की किताब ओल्‍ड डेकन डेज (Old Deccan Days) सन् 1868 में प्रकाशित हुई थी. यह किताब आनलाईन है, यह कृति तद समय के मानवशास्त्रियों में बहुत चर्चित रही इससे प्रभावित होकर भारत में लोककथाओं के संग्रह पर गंभीरतापूर्वक अंग्रेजी खोजी मनीषियों द्वारा प्रयास किये गये जिसके बाद सन् 1871 में कोलकाता से प्रकाशित 'डाल्‍टन की डेस्‍क्रेप्टिव टेक्‍नालाजी आफ बंगाल' आई किन्‍तु यह आनलाईन उपलब्‍ध नहीं है.
दामंत की बंगाली लोककथाओं की सिरीज  द इंडियन एन्‍टीक्‍वेरी (The Indian Antiquary) सन् 1871 से आरंभ हुई इसके अधिकांश आनलाईन उपलब्‍ध है. इस सिरीज में क्रमश: भारत के विभिन्‍न क्षेत्र की लोककथाओं का सन् 1879 तक प्रकाशन होते रहा. दामंत के बाद पंडित एस.एन.नताशा शास्‍त्री ने सन् 1884 में इंडियन एन्‍टीक्‍वेरी में पुन: लोककथाओं का संग्रह प्रस्‍तुत किया. पंडित एस.एन.नताशा शास्‍त्री के संग्रह के तरीकों के संबंध में कई स्‍थान पर पढनें को मिलता है कि मूल लोककथाओं को लिपिबद्ध करने व अंग्रेजी में अनुवाद करने में पंडित एस.एन.नताशा शास्‍त्री सिद्धस्‍थ रहे हैं किन्‍तु इसकी भी आनलाईन प्रति उपलब्‍ध नहीं है.
  
इन्‍हीं विषयों पर लाल बेहारी डे नें स्‍वयं एवं अन्‍य अंग्रेज लेखकों के साथ मिलकर कई ग्रंथ लिखे हैं उनकी एक  कृति सन् 1883 में फोक टेल्‍स आफ बंगाल (FOLK TALES OF BENGAL) आई यह कृति विक्रय के लिए आनलाईन उपलब्‍ध है. सन् 1884 में प्रथम तीन खण्‍डों में प्रकाशित आर.सी.टेम्‍पल की लीजेंड आफ पंजाब (THE LEGENDS OF THE PUNJAB) के अधिकांश पन्‍ने गूगल बुक्‍स में आनलाईन उपलब्‍ध है.
  
सन् 1890 में क्रुक नें 'नार्थ इंडियन नोट्स एण्‍ड क्‍वेरीज' नाम से एक सामाजिक पत्रिका प्रकाशित करवाई थी जिसमें भी लोककथाएं संग्रहित थी. भारत आये अंग्रेज ईसाई पादरियों नें भी अपने अपने क्षेत्र में लोककथाओं को लिपिबद्ध किया जिसमें ए.कैम्‍पवेल नें संथाल कथाओं को एवं जे.एच.नोल्‍स नें काश्‍मीरी कथाओं को लिपिबद्ध किया. कोलकाता से प्रकाशित आर.एस.मुखर्जी की इंडियन फोकलोर (Indian folklore), सन् 1903 में गुजराती लोकथाओं का जे.जेठा भाई द्वारा लिखित 'इंडियन फोक लोर' आदि महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकें आनलाईन उपलब्‍ध नहीं हैं.

सन् 1906 में श्रीमती ए.ई.ड्राकोट की प्रसिद्ध  शिमला विलेज टेल्‍स (Simla Village Tales) व स्‍वेरटन की रोमांटिक टेल्‍स फ्राम द पंजाब ( Romantic tales from the Panjab) एवं फ्लोरा अनी स्‍टील की  टेल्‍स आफ पंजाब (TALES OF THE PUNJAB), इंडियन फेबल्‍स (Indian fables) रामा स्‍वामी राजू  व फोक टेल्‍स आफ हिन्‍दुस्‍तान (Folk-tales of Hindustan) शेख चिल्‍ली आनलाईन उपलब्‍ध हैं. फोक टेल्‍स ऑफ हिन्‍दुस्‍तान के नाम से  डे व ड्रेकोट नें भी शोधपरक ग्रंथ लिखा था कहते हैं इस कृति की अहमियत संदर्भ सामागी के अनुसार शेखचिल्‍ली से ज्‍यादा है, किन्‍तु डे व ड्रेकोट लिखित किताब आनलाईन उपलब्‍ध नहीं है.

सन् 1909 में सी.एच.बोम्‍पस आईसीएस द्वारा संथाल लोककथाओं का अनुवाद प्रकाशित हुआ था, पारकर कृत तीन खण्‍डों में 'विलेज टेल्‍स आफ सीलोन',  दस भागो में पेंजर कृत 'कथा सरित सागर', ब्‍लूमफील्‍ड लिखित 'जनरल आफ बिहार एण्‍ड उडीसा रिसर्च सोसायटी' व  'मेन एन इंडिया', जी.आर.सुब्रमैया की 'फोक लोर आफ तेलगू' , ए.वुड की 'इन एण्‍ड आउट आफ चांदा', ब्रेडले की 'बंगाली फेरी टेल्‍स', मेंकेंजी की 'इंडियन फेरी स्‍टोरीज',  1940 से 1947 के बीच लिखी गई  वेरियर एल्विन (1902-1964) की किताबें  'द फोक टेल्‍स आफ महाकौशल' व अन्‍य आनलाईन उपलब्‍ध नहीं है. वेरियर की किताबें अमेजन से आनलाईन खरीदी जा सकती हैं.

इन किताबों को खोजते हुए मुझे वेरियर एल्विन के नाम से एक वीडियो मिली जिसमें वेरियर के पुस्‍तकों के कुछ बस्‍तर बालाओं के अधोवस्‍त्र विहीन चित्रों को एनीमेट कर वेरियर गाथा कही गई है. आप भी देखें  यूट्यूब

नये प्रकाशनों की नेट उपलब्‍धता - Tribes of India : The Struggle for Survival. Berkeley: University of California Press 1982,  The Gonds of Vidarbha By S.G. Deogaonkar गुगल बुक्‍स में उपलब्‍ध आदिम संदर्भ की हिन्‍दी पुस्‍तकें - जंगल से शहर तक - राजेन्‍द्र अवस्‍थी, छत्‍तीसगढ़ की आदिम जनजातियां - अनिल किशोर सिन्‍हा, गढ़ छत्‍तीस - विनोद वर्मा,  मुरिया और उनका घोटुल - वेरियर एल्विन,  आदिवासी समाज में आर्थिक परिर्वतन - राकेश कुमार तिवारी, भारत की जनजातियां - डॉ.शिव कुमार तिवारी, विन्‍ध्‍य क्षेत्र की लोक चित्रकला - नंदिता शर्मा, जनजातीय मिथक - वेरियर एल्विन, मध्‍य प्रांत और बरार में आदिवासी समस्‍यायें - डब्‍लू.बी.ग्रिग्‍सन, झारखण्‍ड के आदिवासियों के बीच - वीर भारत तलवार, मानव और संस्‍कृति - श्‍यामाचरण दुबे, निज घरे परदेशी (झारखण्‍ड के आदिवासियों पर केन्द्रित) - रमणिक लाल गुप्‍ता, द अगरिया - वेरियर एल्विन, केरल की सांस्‍कृतिक विरासत - गोपीनाथन, वृहद आधुनिक कला कोश - विनोद भारद्वाज, आदिवासी कौन - रमणिक गुप्‍ता, झारखण्‍ड एन्‍साईक्‍लोपीडिया (हुलगुलानो की प्रतिध्‍वनिंयां) - रणेन्‍द्र व सुधीर पाल, मध्‍य भारत के पहाड़ी इलाके - कैप्‍टन जे. फोरसिथ,  आदि.

यदि आप इससे लाभान्वित होते हैं तो टिप्‍पणियों के द्वारा हमें अवगत करावें, हम और जानकारी देने का प्रयास करेंगें. इसके साथ ही यदि आपको इस विषय से संबंधित कोई आनलाईन किताबों का लिंक मिले तो टिप्‍पणियों के द्वारा मुझे सूचित करें, हो सकता है ये संदर्भों के लिंक किसी के काम आवे.


शेष फिर कभी ....

संजीव तिवारी

फोटो साभार श्री रूपेश यादव 

17 comments:

  1. बहुत काम की उपयोगी जानकारी आपने मुहैया की है।

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  2. आप ने तो पढ़ने वालों के लिए खजाना खोल दिया।

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  3. bade kaam ki soochanaayen mili. issmehanat ke liye badhai....

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  4. vakai aapne khajana de diya hai.
    shukriya is mehnat k liye

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  5. जानकारियों का खजाना।
    बहुत बढ़िया।

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 08.05.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  7. कमाल का काम कर रहे हैं आप ! शुभकामनायें !

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  8. आपको साधुवाद!
    इतने काम की व इतने संसाधनों की जानकारी आपने जुटाई है को कमाल है.
    ऐसे और प्रयासों के लिए आग्रह और निवेदन है.

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  9. तिवारी साहब, अग्रिम आभार स्वीकार करें क्योंकि एक बार मुझे मनपसंद सामग्री मिल गई तो मैं शायद धन्यवाद देना भूल जाऊं।
    धन्यवाद।

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  10. संजीव भाई ,
    एक अच्छी और जरुरी पहल के लिए साधुवाद !

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  11. ई मेल से प्राप्‍त टिप्‍पणी -

    Tribal research Institute Bhoplal has a good library. But they dont issue books as in the process they quite a few valuable books. You can go and consult them, and get photocopies on payment.
    Vanya Prakashan has published a number of books which wee out of print for a lon time. Dr. r.s.SRIVASTAVA A RETIRED OFFICER HAS GOOD KNOWLEDGE OF books on tribal subjects.

    Anand Kumar Bhatt
    http://anandkbhatt.blogspot.com

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  12. निश्चित रूप से यह एक बेहतर और उपयोगी प्रयास है. साधुवाद

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  13. छात्रो के लिए विशेष

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  14. छात्रो के लिए विशेष

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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