ब्लॉग छत्तीसगढ़

14 November, 2008

नया मेहमान

कल रात  को घर आकर फ्रेश होकर बैठा तो मेरा बालक नारियल हाथ में लेकर खडा हो गया ।  अगरबत्‍ती लगाकर इसे तोडे, हमने बिना त्‍यौहार कारण पूछा तो उसनें बतलाया । हमारे कालोनी के मकानों में गार्डनिग के लिए भरपूर जगह दिये गये हैं जिसमें कईयों नें बागवानी के अपने शौक को पूरा किया है जिसमें से किसी के गार्डन में एक बिल्‍ली नें चार बच्‍चे दिये थे और बच्‍चों के आंख खुलने के बाद से वह पूरे कालोनी में कभी यहां तो कभी वहां अपने बच्‍चों को छोड कर घूमती रही है ।

अब खबर यह थी कि बिल्‍ली अपने एक एक बच्‍चों को अलग अलग घरों के गार्डन में छोड आयी है और बच्‍चे दिन भर अपनी मॉं से मिलने की आश में चिल्‍ला रहे हैं ऐसा ही एक बच्‍चा पिछले दो दिन से हमारे घर के बाउंड्री में रखे कबाडों के पीछे छुपा चिल्‍ला रहा था, मेरा बालक इससे अतिआकर्षित व उत्‍साहित हो रहा था वहीं मेरी श्रीमतीजी को इस आवाज से काफी गुस्‍सा आ रहा था पर उसे बंद कराने का जरिया मात्र उसे उसकी मॉं से मिलाना था जो संभव नहीं दिख रहा था, अब उसके क्रोध नें भक्ति का सहारा लिया जो स्‍वाभाविक तौर पर महिलाओं में देखी जाती है, उसके मॉं से उसे मिलाने की मन्‍नत स्‍वरूप नारियल 'चढाया गया और चमत्‍कार स्‍वरूप अगले दिन उसकी मां शाम को पिछवाडे वाले खण्‍डेलवाल आंटी के गार्डन में आयी तो श्रीमतिजी नें हमारे घर में छूटे बच्‍चे को भी उसके पास पहुँचा दी । बच्‍चे को पूरे तीन दिन बाद मॉं का दूध व साथ मिला था ।
उमंग व उत्‍साह को मेरे घर में पाकर मैं मुदित था ।

मेरे संस्‍था प्रमुख की कृपा से मेरे दुर्ग निवास का लगभग संपूर्ण समय कम्‍पनी के द्वारा ही उपलब्‍ध कराए गए आवास में बीत रहा है । इस आवास से मेरा लगाव इसलिये कुछ ज्‍यादा है कि मैं जब गांव में रहता था तब भी शिवनाथ नदी मेरे घर के करीब बहती थी और यहां मीलों दूर शहर में भी शिवनाथ मेरे घर के करीब ही बहती है और बरसात के दिनों में जब वह अति उत्‍श्रृंखल हो जाती है तो उसी तरह मेरे इस शहर के घर में भी घुसती है जैसे वह गांव के घर में बेरोकटोक घुस आती है, पर यहां ऐसी स्थिति दो-तीन साल में एकाध बार ही होता है सो हम जैसे तैसे सामानों को सम्‍हालते हैं और उपर व्‍यवस्थित करने की जुगत में लगते हैं कभी कभी इस जुगत में लगने वाले समय तक शिवनाथ वापस चली जाती है और हमें इसी बहाने घर के सामानों को पुन: दीपावली के पूर्व ही व्‍यवस्थित करने का बहाना मिल जाता है ।

अब बरसात और दीपावली दोनों अपने उमंग की खुशबू बिखेरती हुई गुजर गई है पर मेरे कालोनी की गलियों में अब भी फटाकों की चुट-पुट जारी है । फटाका चलाते बच्‍चों और पटाकों से बचते बंचाते कल रात आफिस से घर पहुंचा, तो घर में उत्‍साह व उमंग के साथ एक नये मेहमान को देखकर मैं चकराया । मेरा पुत्र अति उत्‍साहित नजर आ रहा था किन्‍तु श्रीमतीजी कुछ चिंतित । मेहमान महोदय को जब हम देखे तो हमारा भी प्‍यार उमड पडा । हमने श्रीमतीजी से पालतू जानवरों से चिढने वाले अपने स्‍वभाव के बावजूद बिल्‍ली के बच्‍चे को अचानक अपने घर में पनाह देने का कारण पूछा तब उसनें बतलाया कि  बिल्‍ली आज भी अपने बच्‍चे को दूध पिलाने नहीं आई है और यह दिन भर चिल्‍लाई है मेरे कान पक गये हैं इसकी आर्तनाद सुनकर मुझसे नहीं रहा गया तो इसे घर के अंदर ले आई  । स्‍वाभाविक मानवीय भावनाओं को जीवंत देखने में आनंद आता है आज भी मोगैम्‍बो खुश हुआ ।

मैं अपने ग्रामीण पन को जीवित रखने के प्रयास में ठंड आते ही सुबह-सुबह गार्डन एरिया में इंटो को चूल्‍हे का शक्‍ल देकर आग 'तापता' हूं और उसका सदुपयोग करते हुए पत्‍नीश्री उसी से सभी के लिए नहाने का पानी भी गरम कर देती है । सुबह उठकर देखा तो श्रीमतीजी ड्रापर से उस बिल्‍ली के बच्‍चे को दूध पिलाने में मगन थी,चूल्‍हा ठंडा था । सो हमने सेल्‍फ सर्विस का मंत्र बुदबुदाते हुए चाय की गंजी उठाई पर उसकी आवाज ने श्रीमतीजी के तंद्रा को तोडा और हमारी चाय से लेकर सुबह के नास्‍ते की व्‍यवस्‍था हो पाई । ड्रापर में दूध पीने के बाद इस बिल्‍ली के बच्‍चे नें घर में खूब उधम मचाया । उसे खेलते देखकर बरबस चेहरे पर मुस्‍कान आ जाती थी । देर तक उसके खेल को देखने के बाद आज वोट डालकर लेट से आफिस के लिए निकला ।
रास्‍ते में उस बिल्‍ली के बच्‍चे की यादें छाई रही । लगता है लोग इसीलिये पालतू जानवर घर में रखते हैं,  व्‍यस्‍त जिन्‍दगी में अटैचमैंट के लिए भावनाओं का बयार मनुष्‍य को छूकर नहीं निकलती । पर इन भावनाओं को महसूस  मनुष्‍य ही करता है ................ 

संजीव तिवारी

18 comments:

  1. बहोत बढ़िया लिखा है आपने,
    अपनी ग्रामीण जीवन को जीवंत करने के लिए आप इंटों को जोड़ के उसे चूल्हा बना लेते है और आपकी श्रीमती (भाभी जी ,कह सकता हूँ अगर आप बुरा न माने तो )वो उसपे आप सबों के लिए सुबह ठंढ me पानी गरम कर देती है ..
    वह क्या खूब एक पूरी तरह से जीवन को उभरा है आपने ..
    बहोत बहोत आभार है ...
    शानदार..
    ढेरो साधुवाद ...

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  2. आनंद आ गया भाई।
    यह बच्चा बड़ा हो गया तो चूहों की तो मुसीबत ही आ गई।

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  3. संजीव जी,
    इस आपाधापी के समय में आपने पूरानी यादों को संजोये ही नहीं रखा है, बल्कि उन्हें मूर्त रूप देने की कोशिश भी करते हैं। काबिले तारीफ है।

    किसी भी पालतु के घर में रहने से बहुत हद तक तनाव से भी मुक्ति मिलती है।

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  4. इतनी सरलता से आपने अपनी बात कह दी व्यस्त जिन्दगी मे छोटी-छोटी बातों मे छिपी निश्चल सुख की आपको बहुत-बहुत बधाई/

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  5. bahut achcha lagaa aap ko aaj phir padh kar

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  6. जीवन का आनन्द है इस पोस्ट में संजीव। बहुत सुन्दर लेखन।

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  7. bahut hi achha lekh aur bili ka bachha bahut sundar

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  8. Good post ji

    Shyari is here plz visit karna ji

    http://www.discobhangra.com/shayari/romantic-shayri/

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  9. आज त गदगदा गे चोला !! मोगेम्बो सहीच्च मा खुश होगे !!खुब मजेदार हे ड्रापर ले दुध पीयाये के स्कीम हा !! दिल खुश होगे !! मियाऊ मियाऊ ...या कि मै आऊ !

    सुरेंद जी कस कहती जब दिल ले बात निकल्थे तब मेहर छ्त्तीसगढी मा लिखथव जब दिमाग ले निकलथे तब हिन्दी मा लिखथव अऊ जब झुठ बोलना रथे तब अंग्रेजी मा लिखथव !! अब आप जान गे होहु मेहर काबर छ्त्त्तीसगढी मा टिप्पा दे हो !!

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  10. bahut achcha likha hai sir :)

    padh ke mann karta hai ki kaash main bhi hostel mein ek billi ka bachcha paal sakti :D

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  11. Dear Sanjeev ji,
    sorry for not writing in hindi see this picture. cats are very nice pets. very clean. we have many.
    pl do not feed them pure milk that upset there stomach. dilute it by adding 30-40 % water.
    feed them in a separate bowl at a fixed time 2-3 times a day. they will never paster you but expect the food on that time.
    please provide him some soft soil somewhere in you garden for toilet and show it to him. once he knows than he will start using it for toilet. cats always cover their toilet.
    very small pices of roti like churma with milk should be fine to feed him. at this age they are very independent feeder so dont need to feed them with dropper just give them food and show them they will know it soon.
    regards. best wishes with your new guest.
    http://www.flickr.com/photos/satyendraphotography/2980356326/

    satyendra

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  12. बहुत अच्छा लगा सारा हाल पढ़कर!

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  13. बहुत सुन्दर वर्णन।

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  14. आप की कृति आनंद दायक है .एक बार शशांक एक बिल्ली के बच्चे के साथ गेंद खेलते रहे वो अपने पंजों से उसे पकड़ने का प्रयत्न करता और गेंद उससे दूर चली जाती !आपकी रचना पढ़ कर वो बिल्ली का बच्चा आज फ़िर याद आ गया !कुछ भी हो रचना का जो उद्देश्य था वो पूर्णतया मानवीय संवेदनाओं को उजागर कराने वाली है और चित्र भी सुंदर हैं

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  15. ham jahan rahte hain uskee ek-ek vastu aur parivesh se lagav ho jata hai.usr bhulana asambhav hai.apke is lekh see mujhe apne balykal ke din smaran ho ate hain jinhen mainen kaithal(haryana)mein bitaya tha.gaon/kasba/shahar jahan ham jeete hain yadon ke sang jeete hain . apne jevan-shailee ko bhee dhala yah prashansneeya hai.

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  16. प्रिय संजीव जी, बड़ा आनंद आया जी आपकी पोस्ट को पढ़कर. बिल्ली के बच्चों की बात, उन पर भाभीजी का स्नेह. और अंत में चूल्हे का वो गर्म पानी. अहा आज के दौर के गीज़र के गर्म पानी में वो सौंधी ख़ुशबू कहाँ. क्या कहते हैं.
    मैं भी आजकल चूल्हे का ही इस्तेमाल कर रहा हूँ. कम से कम अपने और श्रीमती जी के लिए. बच्चे गीज़र वाले हैं. और माँ-पिताजी गैस पर. पर शायद हम ज्यादा भाग्यशाली हैं. है ना. हा हा हा.

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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