छत्तीसगढ़ की पहचान देश के बाहर इसके लोक कलाकारों के कारण भी बनी है । देश भर में छत्तीसगढ़ के कलाकार प्रदर्शन देकर यश अर्पित करते हैं । प्रदर्शनकारी मंचीय विधाओं में अधिकांश आदिवासी संस्कृति से जुड़ी है ।
छत्तीसगढ़ भर के मैदानी गांवों में भई गौरा-गौरी पूजन होता है । सुरहुती अर्थात् दीपावली के दिन गौरा-गौरी की पूजा होती है । यह गोड़ों का विशेष पर्व है । इस दिन वे अपनी बेटियों को उसकी ससुराल से विदा कर मायके लाते है । इसी तरह शैला, करमा आदि नृत्य हैं । अब तो मैदानी इलाके में कलाकार भी शैला करमा नृत्य में प्रवीण हो चुके हैं । आदिवासियों के देवता हैं बूढ़ादेव । बूढ़ादेव भगवान शंकर के ही स्वरूप है ।
रायपुर
का बूढ़ा तालाब वस्तुत: आदिवासी राजा द्वारा निर्मित है । बूढ़ापारा भी वहां बसा है । लेकिन यह दुर्भाग्यजनक स्थिति है कि बूढ़ा तालाब का नाम बदल कर विवेकानंद सरोवर कर दिया गया है । स्वामी विवेकानन्द रायपुर में कुछ वर्ष छुठपन में रहे । स्वाभाविक ही है कि उनकी मूर्ति रायपुर में लगायी गई । लेकिन सरोवर का नाम बूढ़ा तालाब था । यह भगवान शंकर के स्वरूप बूढ़ा देव के भक्तों की भावना से जुड़ा तालाब है । धीरे-धीरे इसी तरह आदिवासी स्मृतियों के साथ अगर छेड़छाड़ की जाएगी तो छत्तीसगढ़ का इतिहास विरूपीत होगा । आदिवासी संस्कृति, मंचीय कला आदि के संरक्षण की चिंता अब और आवश्यक है ।
कंगला मांझी ने जीवन भर अपनी शक्ति भर आदिवासी स्वाभीमान के लिए काम किया । लेकिन समय-समय पर आदिवासी हकों पर हमले होते हैं और कोई प्रतिकार के लिए उठ खड़ा नहीं होता ।
छत्तीसगढ़ के दम पर मध्यप्रदेश शासन ने आदिवासी लोककला परिषद का गठन किया । मध्यप्रदेश में आज भी आदिवासी लोककला परिषद विधिवत काम कर रहा है । लेकिन छत्तीसगढ़ में आदिवासी लोककला परिषद नहीं है ।
दिल्ली में छत्तीसगढ़ के कलाकारों के द्वारा निर्मित लोहे का वैसा ही द्वार बना है जैसा रायपुर के संस्कृति विभाग में है । द्वार तो हर कही नहीं बनेंगे लेकिन द्वारों के निर्माता आदिवासी कलाकार उन लौह द्वारों को पार कर संस्कृति विभाग के भीतर की मायावी दुनिया तक भी पहुंच सकें यह कोशिश जरूरी है ।
छत्तीसगढ़ राज्य बना । मुख्यमंत्री की आसंदी पर एक आदिवासी नेता बैठे । लेकिन उनके पूरे कार्यकाल में असली नकली की लड़ाई छिड़ी रही । आज जबकि आदिवासी हितों की रक्षा के सवाल पर गौर करना अधिक जरूरी है, नकली लड़ाईयों में आदिवासी समाज को उलझा दिया जाता है । आदिवासी का तात्पर्य ही है मूल निवासी । आदिवासी कभी किसी का हक मारकर अपना हित नहीं साधता । नाहक हिंसा भी नहीं करता लेकिन अन्याय करने वाला जब मर्यादा तोड़ देता है तब वह जान की परवाह किए बगैर समर में कूद पड़ता है ।
छत्तीसगढ़ का आदिवासी हीरा कंगला मांझी जब तक इनके बीच रहा, नक्सली समस्या छत्तीसगढ़ में नहीं आई । कितने दुर्भाग्य की बात है कि उनके अवसान के बाद उनकी परंपरा का भरपूर पोषण नहीं किया गया और धीरे-धीरे नक्सली गतिविधियां समूचा प्रांत कुछ इस तरह असुरक्षित माना जाने लगा कि पर्यटक तक यहां आने से घबराने लगे ।
समय अब भी है । आहत आदिवासियों को उचित महत्व देकर पुन: वह दौर लौटाया जा सकता है । जब सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ का आदिवासी एक स्वर में यह गीत गाता था ................
देवगनों का देश हमारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा ।।
छेड़ छाड़ अप्रिय है। मुझे बोकारो में चौक पर बिरसा मुण्डा की प्रतिमा देख कर बहुत अच्छा लगा था। आदिवासी सांस्कृतिक विरासत की इज्जत होनी चाहिये।
ReplyDeleteachchhi posting ke liye bhai sanjeeva ko aur achchha vichar ke liye bhai dr.pardeshiram verma ko hardik badhai
ReplyDeletei am very proud to joine site
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