ब्लॉग छत्तीसगढ़

24 March, 2008

क्या उल्लू का कपाल आपके दुश्मन का सर्वनाश कर सकता है?

13. हमारे विश्वास, आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक, कितने अन्ध-विश्वास?


- पंकज अवधिया


प्रस्तावना यहाँ पढे


इस सप्ताह का विषय



क्या उल्लू का कपाल आपके दुश्मन का सर्वनाश कर सकता है?


तंत्र से सम्बन्धित ज्यादातर साहित्यो मे यह दावा किया जाता है कि विधि-विधान से उल्लू के कपाल के प्रयोग से दुश्मन का सर्वनाश किया जा सकता है। इस दावे के समर्थन मे देश भर मे लेख छपते रहते है। इस दावे की सत्यता जानने के लिये मै सैकडो तांत्रिको से मिला और उनसे इस दावे को प्रमाण सहित सिद्ध करने का अनुरोध किया पर जवाब मे मुझे बडी-बडी बाते ही सुनने को मिली। ज्यादातर तांत्रिक उल्लू के कपाल को बेचने की फिराक मे नजर आये।


समय-समय पर अपने हिन्दी लेखो के माध्यम से मै खुले रुप से इन्हे चुनौती देता रहा पर आज तक नतीजा सिफर ही रहा। अन्धश्रद्धा निर्मूलन समिति, रायपुर के संस्थापको मे से एक माननीय चन्द्रशेखर व्यास सदा ही से अपने व्याख्यानो मे इस दावे को चुनौती देते रहे है। वे कहते है कि यदि उल्लू के कपाल मे इतनी ही शक्ति है तो तांत्रिक देश सेवा के लिये आगे आये। सरकार उनकी एक बटालियन बना दे और सीमा पर भेज दे ताकि बिना खर्च के दुश्मन को धूल चटाई जा सके। पर हम जानते है कि इस दावे मे कोई दम नही है।


यह कडवा सच है कि प्रतिवर्ष ऐसे आधारविहीन दावो के नाम पर असंख्य उल्लूओ को मारा जाता है। उल्लू से जुडे अन्ध-विश्वास पर आधारित ममता जी की पोस्ट पर सागर नाहर जी ने खुलासा किया कि दीपावली के आस-पास उल्लू की बलि चढाई जाती है और रंग और प्रजाति के हिसाब से डेढ लाख मे एक उल्लू बेचा जाता है। यह सब उस देश मे हो रहा है जहाँ उल्लू के शिकार पर प्रतिबन्ध है और कडे कानून है।


वर्तमान पीढी के बहुत कम लोग यह जानते है कि उल्लू की हमारे पर्यावरण मे अहम भूमिका है। ये किसानो के मित्र है। ये कीट-पतंगो के साथ चूहो को खा जाते है। इस तरह प्रतिवर्ष करोडो का खाद्यान्न चूहो से बच जाता है। आज कीटनाशको के बढते उपयोग से इनकी आबादी कम होने लगी है। बढते ट्रेफिक के कारण भी ये गाडियो से टकराकर मरते जा रहे है। इन सबसे अधिक खतरा इन्हे उन मनुष्यो से है जो तंत्र के नाम पर इन्हे पकडकर मार देते है। उल्लू हमारे आस-पास से बहुत तेजी से घटे है। हाल ही मे खेतो मे आमतौर पर पाये जाने वाले बार्न आउल को जाँजगीर क्षेत्र के गाँवो मे गरुड समझकर पूजा जाने लगा। दैनिक छत्तीसग़ढ ने यह खबर प्रमुखता से प्रकाशित की। किसानो के मित्र कहे जाने वाले बार्न आउल को सम्भवत: इस पीढी के लोगो ने नही देखा था इसलिये वे इसे गरुड मान बैठे। यह छोटी सी घटना दर्शाती है कि कैसे तेजी से जीव हमारे आस-पास से गायब हो रहे है और हम इन्हे भूलते जा रहे है।


अपने स्तर पर कुछ जानकार लोग जागरुकता अभियान चला रहे है पर जिस तेजी से उल्लू विलुप्त हो रहे है उसे देखते हुये व्यापक स्तर पर अभियान चलाने की जरुरत है। हम सब को जागना होगा और दूसरो को भी जगाना होगा। सरकार पर दबाव बनाना होगा ताकि गलत दावे करने वालो के हौसले पस्त किये जा सके और उल्लू को मारने वालो को सलाखो के पीछे भेजा जा सके।


अगले सप्ताह का विषय


यदि मैना बिल्कुल सामने दिखे तो क्या चोर-डाकुओ से धन की हानि होती है?

3 comments:

  1. पंकज जी आज और भी अधिक जानकारी मिल गई उल्लू के बारे मे। वाकई हम तो जानते ही नही थे की लोग उल्लू की बलि चढाते है ।

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  2. पंकज जी अन्ध-विश्वास अनपड ही नही बहुत पढे लिखे भी करते हे,मेने Dr,जेसे पढे लोगो को भी ऎसी बाते करते देखा हे नही अभी भी देखता हु

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  3. Something I am very much scared, is black magic at 36garh. There are making world records. Someone has to come forward and stop the magic behind the owl skull.

    - Sanjay Dewangan

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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