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15 December, 2007

होता प्रेम अंधा : कविता






14 comments:

  1. वाह! उर्वशी और पुरुरवा की याद आ गयी।

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  2. प्रेम और सौन्दर्य से परिपूर्ण काव्य... प्रेम अन्धा होते हुए भी अंर्तमन के चक्षुओं से देखता है...

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  3. बहुत सुंदर लयबद्ध रचना…गुनगुनाने को मन हो उठा।
    आभार

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  4. संजीव, बहुत बढ़िया लिखा है भैया...सचमुच...वाह!

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  5. बहुत बढिया संजीव भाई ॥

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  6. अच्छी! बहुत अच्छी!
    अति सुंदर कविता. गहरे भाव और सुंदर शब्दों का अद्भुत सम्मिश्रण.
    बधाई.

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  7. प्रेम मूक, अँधा ही सजीव होता है.....मूक प्रेम का सजीव वर्णन ,बहुत सुन्दर .........

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  8. वाह क्या बात है!! सुंदर!!
    तो अब आपका खजाना धीरे-धीरे सामने आ रहा है।
    बधाई!

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  9. वाह क्या लिखते है। मजा आ गया। वाह, वाह।

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  10. संजीव भैया,
    अच्छी कविता है, आपसे सदा ही कुछ न कुछ सिखाने को मिलता है.

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  11. बहुत सुन्दर रचना

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  12. बहुत सुंदर कविता, सब्द सब्द भावों को प्रकट करता हुआ और भाव ह्रुदय में उतरते हुए। पहले भाग की आखरी लाइन देखिये, सृजन होना चाहिये न श्रृजन के बदले।

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  13. संजीव जी,
    आपके ब्लाग को अक्सर देखता हूं। हम सभी के साथ समस्या यह है कि हिन्दी जानने और इंटरनेट पर देखने की इच्छा रखने वाले करोड़ों लोग आपस में कैसे जुड़े रहें। हमारा लिखा एक दूसरे तक कैसे पहुंचे।
    आपकी कोशिश जारी रहे, शुभकामनाएं।
    आप मेरे ब्लाग sarokaar.blogspot.com पर समय निकालकर जाने का कष्ट करें।
    सादर

    राजेश अग्रवाल
    स्थानीय सम्पादक
    प्रतिदिन
    बिलासपुर

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  14. Rakesh Khandelwal

    बहुत बढिया भाव, शुक्रिया ।

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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