संजीव तिवारी का ब्लॉग

20 June, 2007

नउवा : संस्मरण



रमउ हमारे पिताजी से चार पांच साल बडे थे हमारे दादा जी नें इसे पास के गांव से लाकर हमारे गांव में बसाया था दस एकड जमीन और जुन्‍ना बाडा को देकर । रमउ हमारे परिवार का हजामत बनाया करता था और उसकी पत्‍नी छट्ठी छेवारी उठाती थी । रमउ स्‍वभाव से बहुत बातूनी था यही मेरे सभी चाचा, बुआ सहित पिताजी के लिए लडकी देखने गया था और इसी नें शादी लगाने की समस्‍त दायित्‍वों को डाट काम कंपनियों के सी ई ओ की भंति भली भंति निबटाया था ।

रमउ का बेटा जो हमारे साथ ही पढा है, कोरबा कालेज में समाजशास्‍त्र का प्रोफेसर है पिछले दिनों पेपर में पढा था कि वह पी एच डी भी कर लिया है । रमउ की सभी आदतें उसे विरासत में मिली हुई है । हमारे बचपन का दोस्‍त है दोस्‍त क्‍या हमारे एहसानों के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करता हुआ एक आदर्श नमक हलाल । मैट्रिक के बाद से हम रायपुर भिलाई आ गये वह पता नहीं कहां कहां फूफा मोसा के यहां पढता रहा फिर प्रोफेसर भी बन गया।

हम विगत दिनों कोरबा प्रवास में थे उनसे मिलने की इच्‍छा हुई । मोबाईल से फोन किये तो बोला “बालको चौक में संतोष केंस कर्तनालय है वहीं संझा कन आ जाना वहां से घर चलेंगे ।“
चौंक पहुच कर हमने सोंचा पांन ठेले से पान खाकर दुकानदार से संतोष केश कर्तनालय का पता पूछा जाय । पान ठेले में पहले से दो नव धनाड्य किशोर सिगरेट पी रहे थे उनमें हंसी ठिठोली चल रही थी वो दाढी नही बनवाने के संबंध में ही कुछ कह रहे थे । मैंनें उनसे ही पूछ लिया “भाई संतोष केश कर्तनालय कहां पर है ?”
लडके फिर हंसने लगे ।
मैनें पूछा “क्‍या हुआ ?”
कहने लगे “अंकल वो देखें वो है ।“
मैं ठेले से सीधे कर्तनालय पहुच गया । अंदर देखकर मैं हतप्रभ हो गया हमारा पी एच डी प्राध्‍यापक हांथ में उस्‍तरा लिये किसी का दाढी बना रहा था । हमें देखते ही दाढी बनाना छोड के हमारे दोनो जूतों को छू कर प्रणाम किया “दाउ पाय लागौं ।“
“थोरिक बैठव मैं हजामत बना लेथव तहां ले आप संग गोठियाहूं ।“
उसके दाढी बनाते तक मैं भाव शून्‍य हो उसे देखते रहा ।
मुझे अपनी ओर अपलक ताकते हुए देखकर वह बोला
”का करबे दाउ पुरखौती धंधा ये करबे नही त सबके हजामत कौन बनाही ।“
”सबके मेछा दाढी तो साधु संत असन बाढ जाही, जउन करही शरम तेखर फूटे करम ।“
हा हा हा कह कर वह हंसने लगा ।
आज तक मेरे स्‍मृति में उसका उस्‍तरा पकडे हुए मुस्‍कुराता चेहरा घूमता है । भंगी मैला ढोना छोड दिये, धोबी कपडा चुरोना छोड दिये । वाह रे नउवा तोर दिन कब फिरही । तुम आदर्श हो समाज के ।

2 comments:

  1. अच्छा लगा आपका संस्मरण पढ़कर.

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  2. गज़ब!!!
    पी एच डी करने, प्राध्यापक होने के बाद भी हाथों में कैंचीं-कंघा!!
    मानना पड़ेगा इन जनाब को!!

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