ब्लॉग छत्तीसगढ़

24 May, 2007

नारद कुछ तो है पर सबकुछ नही है

हिन्दी चिट्ठाकारों की फौज कुल जमा 1000 जिसमें से सक्रिय चिट्ठे 500, पाठक इन्ही मे से संख्या अंजान, जिनके सहारे पूरा हिन्दी अंतरजाल संसार टिका है । विगत दिनो हिन्दी चिठ्ठो को बढाने के उद्देश्य से छत्तीसगढ मे मेरे द्वारा जो आंशिक प्रयाश किये गये उसमे यह बात खुल कर आयी कि भारतीय आग्ल चिठ्ठाकार यह सोचता है कि हम हिन्दी चिठ्ठाकार अपनी लेखनी को पढवाने के लिये हिन्दी व हिन्दी चिठ्ठाजगत की बात करते है क्योकि उनका चिंतन है हिन्दी चिठ्ठो के पाठक कम है और जो हिन्दी चिठ्ठा लिखेगा वो दूसरो के चिठ्ठो को पढेगा ही यदि उनकी बातो को माने तो हमारे पाठक सक्रिय चिट्ठे 500 के चिट्ठाकार ही है जो एक दूसरे के चिठ्ठो को पढते है यानी चटका लगाते है ।

हमारी जानकारी के अनुसार हिन्दी चिट्ठाकारों के मानक फीड एग्रगेटर दो हैं नारद महाराज व हिन्दी ब्लाग डाट काम इनके सहारे ही 500 ब्लाग के धमनियों में रक्त का प्रवाह हो पाता है । नारद महाराज के यहा विवाद के बावजूद यह देखने सुनने को मिलता है कि किसके व्लाग में कितना चटका लगा, यह चटका ही उस लेख की लोकप्रियता का आधार है । नारद में बाकायदा चटकों के रिकार्ड के साथ इस दिन, सप्ताह, माह, वर्ष के सर्वाधिक चर्चित चिट्ठों की सूची ‘लोकप्रिय लेख’ उपलव्ध कराई जाती है । जो नारद से होकर गुजरने वाले पाठकों के आधार पर होती है । . . . . और नारद को कौन देखता है, स्वाभाविक तौर पर वही जो हिन्दी व्लागिंग करता है और नारद में पंजीकृत है । तो क्या नारद से होकर चटका लगने को ही उस लेख की लोकप्रियता की कसौटी माना जा सकता है । खैर नारद जाने व उसके तारनहार जाने । श्रृजन शिल्पी के कहने पर लेखों के सामने दर्शित हिट्स की संख्या को हटा दिया गया वैसे ही नित नये प्रयोग होते रहेंगे ।

नारदहिन्दी ब्लाग के सहारे आने वालों के अतिरिक्त भी हिन्दी चिट्ठाकारों के चिट्ठों में आने के दूसरे रास्ते भी हैं जो विभिन्न सेवाप्रदाताओं द्वारा समान विचारधारा वाले व्यक्तियों के समूह और चिट्ठाकारों के व्यक्तिगत संबंधों से निर्मित होते हैं जो बिना किसी फीड एग्रीगेटर के माध्यम से स्वमेव ही चिट्ठे में विचरण करते हैं और चिट्ठों को पढते हैं । इस संबंध में विस्तृत चर्चा श्री रवि रतलामी जी पूर्व में भी कर चुके हैं । ऐसी स्थिति में लोकप्रियता की कसौटी के मानक चटके सही प्रतीत नही होते ।

हमारे जैसे अल्प ज्ञानी चिट्ठाकार अपनी दो टूक बाते कहने के लिए लम्बी लम्बी लेखनी लिखता है बार बार वही बात कहता है जो चिट्ठे का सार है, इस प्रकार चिट्ठा लम्बा होता जाता है पर चटके व टिप्पणियां दो चार से ज्यादा नही चिपक पाते । वही परमजीत बाली जी एवं मेरा चुंतन वाले सन्तोष जी जैसे शव्दों के शिल्पी चार लाईनों में ही अपनी पूरी बातें कह जाते हैं और उन पर चटका भी खूब लगता है व टिप्पणियां दस से ज्यादा चिपक जाते हैं, क्यू न लगे इससे पाठक को और भी चिट्ठों को पढने का समय भी मिल जाता है ।

रवि रतलामी जी नें पिछले दिनों विश्व के सर्वाधिक चर्चित २५ चिट्ठों के संबंध में लिखा था मैं उन चिट्ठों में से पहले क्रम के चिट्ठे पर गया तो देखा उस दिन के उक्त विश्व के महत्वपूर्ण चिट्ठे के पोस्ट में एक भी टिप्पणी नही की गयी थी उसमें मैनें पहली टिप्पणी की । मायने यह कि विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय चिट्ठे की कसौटी, टिप्पणियॉं तो हरगिज नही है ।

हिन्दी के ही स्थापित चिट्ठाकारों के चिट्ठे पर नजर दौडायें श्री रवि रतलामी जी हमेशा थोडा लिखते हैं पर पूरा लिखते हैं । उनकी लोकप्रियता हिन्दी चिट्ठाजगत में सर्वविदित है । क्या हमें स्थापित होने के लिए लम्बा चौडा लेख लिख लिख कर, पहले एक घंटे पन्नों पर कलम घिसकर फिर उसके बाद दो घंटे हिन्दी टायपिंग के पचडों से निबटते हुए कम्प्यूटर पर समय खर्चने की आवश्यकता है वो भी इस संबल पर कि हमारी हिन्दी अंतरजाल में स्थापित हो रही है या हमारा चिट्ठा स्थापित हो रहा है । ऐसा करके न हम हिन्दी को स्थापित कर रहे हैं न ही अपने आप को स्थापित कर पा रहे हैं पर अपने भीतर कोने में बैठे दमित इच्छाओं की जीजीविषा को उजागर कर रहे हैं और पोस्ट करने के बाद बार बार अपने चिट्ठे व मेल को रिफ्रेश कर टिप्पणियों व चटकों को देख देख कर प्रफुल्लित हो रहे हैं कि हमारी कचरा अधकचरा सामाग्री को कितने लोगों ने झेला। मेरा यह मानना है कि चिट्ठे की ‘लोकप्रियता’ हम चिट्ठाकारों का आधार नही होना चाहिए, हमारा उद्देश्य हिन्दी को अंतरजाल में स्थापित करना है । इसके साथ ही अपने हृदय में छुपे लेखक, कवि मन को उजागर करना है, रचना ऐसी, पूर्णतया मौलिक जिसमें सुधार की संभावनायें अपनी बाहें फैलाये खडी हो को सीधे पाठक के सामने ले जाने की मन्शा को प्रदर्शित करना है ।

जहां रवि रतलामी जी जैसे शार्ट एण्ड स्वीट शव्दों के चिट्ठाकार हैं जिनके चिट्ठों पर चटकों का अंबार लगता है तो दूसरी ओर श्री रामचरित मानस जैसे सामुदायिक सहयोग से निर्मित चिट्ठे भी हैं जिसमें अत्यधिक श्रम लगने के बावजूद चटकों व लोकप्रियता की लिप्सा गायब है, एसे कइ चिट्ठाकार भाइ है, हमारे छत्तीसगढ के ही भाइ जय प्रकाश मानश जी को देखें उन्होंने छत्तीसगढ के साहित्यकारों की रचनाओं को अंतरजाल में डालने के लिए पता नही कितना श्रम किया होगा किन्तु उनके दो चिट्ठे श्रृजन गाथा व उनके स्वयं के नाम वाले चिट्ठे को छोड दिया जाये तो बाकी चिटठों में लोकप्रियता दर्शित ही नही होती जबकि उनका प्रयास काफी श्रमसाध्य व काबिले तारीफ है । उनके स्वयं के चिट्ठे में उनकी लम्बी लम्बी शोधपरख लेखनी यह सिद्व करती है कि वे लोकप्रियता के मानकों को भुनाने के लिए चिट्ठाकारी नहीं करते उनका उद्देश्य स्पष्ट है हिन्दी का विकास ।

इस हिन्दी के विकास के यज्ञ के लिये हमे जो आहुति देनी पडती है वह है प्रति माह ३०० से ९०० रूपये ब्राड बैंड का बिल व लगभग तीन से पांच घंटे प्रतिदिन की तनमयता, यदि इसका वित्तीय आंकलन करें तो हिन्दी को स्थापित करने मात्र के सनक के कारण भारत मे निवासरत प्रायः सभी चिठ्ठाकारो का लगभग १०००० रूपये प्रतिमाह खर्च हो रहा है । इसके अतिरिक्त परिवार के लिए नियत समय को खराब करने का अपराधबोध, दिन के बाकी के कार्य के समय में हावी चिट्ठाकारिता के भूत से चलते द्वंद से निबठना अलग । अब इसके बाद भी चटके की लिप्सा न रखा जाये यह तो सम्भव नही है पर लोकप्रियता के वीणा या गीटार का तार कमान जो नारद मुनि के पास है तो एसे मे दिन मे सीधे कम से कम 100 चटके लगने के बावजूद आपका लेख अलोकप्रिय बना रह सकता है और नारद के द्वारा 18 चटके वाला लेख लोकप्रिय के सुनहरे हर्फो मे शोभा पा सकता है इसलिये मेरे चिट्ठाकार दोस्तो नारद को सबकुछ मत समझ बैठो नारद कुछ तो है पर सबकुछ नही है लिखते रहो, लिखते रहो ! आपका लेख भी लोकप्रिय है ।

16 comments:

  1. आपने पूरा लेख तो लिख दिया, लेकिन लोकप्रियता वाले उस लिंक पर लिखा डिसक्लेमर नही पढा:

    साथियों हम पेश है लोकप्रिय लेख की कडियों के साथ। लेकिन इसके पहले हम कुछ कहना चाहेंगे। लोकप्रिय लेख का पैमाना नारद के हिट्स काउन्टर कभी नही हो सकता, हम यहाँ पर सिर्फ़ वही दिखा रहे है जो कम्पयूटर के गणना के अनुसार हमारे पास है। इस गणना का आधार नारद के हिट्स काउन्टर है, अर्थात नारद की साइट से आपके लेखों पर भेजे गए लोगों की संख्या के अनुसार लोकप्रिय लेख।


    अगली बार आप किसी विषय पर लेख लिखें, तो पूरी जानकारी अवश्य लें, किसी पूर्वाग्रह या कुंठा से लेख मत लिखें।

    ReplyDelete
  2. इसे कहते है अलग हट के सोचना। तिवारी जी, लिखते रहें।

    ReplyDelete
  3. अच्छी बात कही आपने ...आशा करते हैं लोग भी लोकप्रियता के चक्कर में ना पड़ अच्छा लिखते रहेंगे...

    ReplyDelete
  4. अच्‍छा लिखा है सार्थक लेख बधाई

    ReplyDelete
  5. आदरणीय चौधरी जी आपके प्रयाशो को हिन्दी चिठ्ठाजगत भुला नही सकता
    मैने इस लेख मे नारद के लोकप्रिय लेख का लिन्क भी दिया है यानी लोग उस पेज को पूरा पढ सके . मेरा उद्देश्य गलत कतइ नही है . रही बात ‘पूरी जानकारी’ ‘पूर्वाग्रह’ या ‘कुंठा’ की तो मै हठधर्मिता से ही सही कहुन्गा कि इनकी समझ मुझे है और विनम्रता से यदि कहू तो यही सब तो सीखने और सुधरने का प्लेटफार्म है ब्लाग
    आपका अग्यानी

    ReplyDelete
  6. "लिखते रहो, लिखते रहो ! आपका लेख भी लोकप्रिय है ।"

    इहै लाईन हमका सबसे सही लगा भैया!

    अच्छा लेख!

    ReplyDelete
  7. संजीव तिवारी जी नारद तो हमारे समय को बचाने का कार्य करता है. रही टिप्पणियों की बात तो अंग्रेजी चिट्ठों पर तो लोग घूम घूम कर ही आते जाते हैं और प्रतिक्रिया देते हैं। लोकप्रियता से ज्यादा अहम मुद्दा है कि जब कोई पोस्ट आप लिखते हैं

    १. तो क्या आपको आनंद मिलता है।
    २. क्या आप का लिखा लोगों की किसी जरुरत को पूरा करता है।
    ३. क्या आपके लिखे विचार लोगों को उद्वेलित करते हैं।

    अगर आप अपने आत्मअवलोकन से इन सब बातों का उत्तर हाँ में पाते हैं तो समझिए आप एक अच्छे ब्लॉगर हैं। टिप्पणियों की संख्या से ज्यादा जरूरी उनमें व्यक्त उद्गार होते हैं जो दिखाते हैं कि आपने अपने लेखन से कितनी गहराई तक किसी के मन को छुआ है और यकीन मानिए वही ब्लागिंग की सच्ची पूँजी है।

    ReplyDelete
  8. अच्छा लिखा है, हिट्स को भूल कर लिखते रहें।

    ReplyDelete
  9. मुझे इस लेख में न तो कोई पूर्वाग्रह दिखा और नही कोई कुण्ठा.. बल्कि बहुत सारे ऐसे लो्गों के प्रति सम्मान की भावना दिखी जिन्होने निस्वार्थ भाव से हिन्दी की सेवा की है, और जिनमें जितेन्द्र चौधरी स्वयं भी शामिल हैं(रामचरितमानस तैयार करने वाला दल).. डिसक्लेमर ना पढ़ने की गलती ज़रूर हुई हो सकती है.. पर यह डिसक्लेमर वैसा ही है जैसे सिगरेट के पैकेट पर वैधानिक चेतावनी.. कमोबेश हभी लोग नारद की हिट्स संख्या को लोकप्रियता का पैमाना मानते हैं..और नारद स्वयं भी.. नहीं तो 'पिछले हफ़्ते के लोकप्रिय लेख' कहने का क्या औचित्य है? खैर.. तिवारी जी आप का लेख बड़ी अच्छी नीयत से लिखा गया लेख है.. ऐसा मेरा मानना है.. अब हो सकता है कि कोई मेरे इस समर्थन को 'तिवारीवाद' समझ ले.. तो ऐसे पूर्वाग्रहों का कोई क्या कर सकता है..?

    ReplyDelete
  10. मनीष भाई की बात से पूरी तरह सहमत हूँ.

    ReplyDelete
  11. संजीव तिवारी जी,आपने जिस विषय पर लिखा और जो विचार लिखे मै उस से पूरी तरह सहमत हूँ।

    "मेरे चिट्ठाकार दोस्तो नारद को सबकुछ मत समझ बैठो नारद कुछ तो है पर सबकुछ नही है लिखते रहो, लिखते रहो ! आपका लेख भी लोकप्रिय है ।"

    ReplyDelete
  12. अमाँ जीतू भाई, काहे को नाराज़ होते हो। संजीव जी ने कहीँ भी यह दावा नहीँ किया कि नारद का लेखा-जोखा लोकप्रियता की कसौटी है या कि नहीँ, या फिर यह भी नहीँ कहा कि नारद के शिल्पी भी यह दावा करते हैं, उन्होंने भी वही लिखा कि नारद पर उन्हीं लेखों का लेखा-जोखा है, जो नारद से होकर गुजरते हैं। यही बात तो आप भी कहते हो और सच भी है तो काहे की नाराज़गी। इन सबके ऊपर तकनीकी सत्यता तो यह है कि शत-प्रतिशत सही हिसाब तो रखा ही नहीँ जा सकता।

    ReplyDelete
  13. संजीव जी,आपकी लेखन के प्रति आस्था ही आपकी सबसे बड़ी उपलब्धी है..अधिक टिप्पणी वाले बोल्ग जरुरी नही की इस कबिल हो कि उन्हे लेखन के आधार पर टिप्पणी दी जा रही हो..जबकि कभी-कभी तो मुझे लगता है की वो सिर्फ़ अदले का बदला ही देने आते है..जैसे की एक बार मैने पढा था एक ब्लोग पर तू मेरी पीठ खुजला मै तेरी खुजलाता हूँ....

    आपका लेख सबसे अलग हट कर है आपकी कलम ही आपका हथियार है...
    सुनीता चोटिया

    ReplyDelete
  14. संजीव भाई, आपने सब कुछ बहुत अच्छा लिखा। बधाई। लेकिन नारद के बारे में जैसा जीतेंन्द्र ने बताया कि केवल नारद के हिट काउंटर का मतलब
    ही लोकप्रियता नहीं होता। नारद इसलिये है कि ब्लाग हैं। इसलिये नारद बहुत कुछ है लेकिन सब कुछ नहीं है वाली बात आपकी सही है। लेकिन नारद की लोकप्रियता का कारण भी जानने का प्रयास कीजिये। हालांकि नारद की तरह दूसरे एग्रीगेटर भी हैं लेकिन नारद से जुड़े लोग ही तमाम दूसरे सामूहिक कामों में जुड़े हैं। जैसे परिचर्चा और हाल में जुड़ा प्रतिबिम्ब भी। नित नये प्रयोग भी इसे जीवन्त रखते हैं। जहां तक रही टिप्पणी की बात तो आप खुद समझेंगे कि लोग टिप्पणी कैसे ब्लागों पर करते हैं। अन्य तरह की बातों के अलावा यह एक तरह का व्यवहार भी है। आप दूसरों के ब्लाग पर जायेंगे उनके बारे में अपने विचार रखेंगे तो वे भी आपके बारे में कुछ लिखेंगे। लिखते रहें। शुभकामनायें।

    ReplyDelete
  15. लोकप्रियता हिन्दी की हो सब का प्रयास इस दिशा मे
    हो

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

loading...

Popular Posts