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23 May, 2007

अश्लीलता शब्द की अवधारणा

अश्लीलता शब्द की अवधारणा के संबंध में सदैव विवाद रहा है समय काल व परिस्थितियों के अनुसार इसकी परिभाषा बदलते रही है अभी पिछले वर्ष दिसम्बर २००६ में अजय गोस्वामी बनाम भारत सन्घ व अन्य के वाद से संबंधित एक महत्वपूर्ण मुकदमें में सुप्रीम कोर्ट नें इसके विभिन्न पहलुओं पर विचार किया एवं वकीलों के तर्क वितर्क के पश्च्यात निर्णय सुनाया । अश्लीलता के संबंध में भारत के न्यायालयों में चल रहे व निर्णित वादों एवं वर्तमान परिवेश में इस संबंध में चल रहे अटकलों एवं समाज में व्याप्त चिंतन पर स्पष्ट प्रकाश डालने में यह न्याय निर्णय अगले कुछ बरसो तक सक्षम साबित होगा .

इस वाद में वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं अश्लीलता का विस्तृत विवेचन किया गया है । जिसमें अश्लीलता के उस पहलू पर विचार किया गया है जो विज्ञापनों के द्वारा बाल व किशोर मन में अश्लीलता को जगाता है । इस वाद का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें प्रतिवादी के रूप में भारत के दो जाने माने पत्र समूह हिन्दुस्तान टाईम्स व टाईम्स आफ इंडिया के साथ ही प्रेस कौंसिल आफ इंडिया का नाम भी है ।

इस वाद में अश्लीलता को परिभाषित करने के लिये समसामयिक लोकाचार एव राष्ठ्रीय मानको के मुद्दों पर विचार किया गया . वाद मे दिये गये पूर्व न्याय दष्ठान्तो व सन्दर्भो मे रन्जीत उसेडी विरुद्ध महारास्ट्र राज्य के वाद मे न्यायालय ने यह अवधारित किया था कि यह विनिश्चय करने का, कि क्या कलात्मक है और क्या अश्लील, नाजुक कार्य न्यायालयो द्वारा ही किया जाना चाहिये और अन्तिम आश्रय के रूप मे इसे उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाना है और इसलिये अश्लीलता के प्रश्न पर साहित्यकार या कलाकार या अन्य के साक्षय को सुसन्गत नही माना गया . यानी नगी स्त्री का चित्र बनाओ समाज मे लाओ और कह दो कला है . इ ना चलिबे . . . .

महिलाओ का अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम 1986, भारतीय दण्ड सन्हिता 1860, प्रेस परिषद अधिनियम 1978, पत्रकरिता आचरण के सन्नियम , सुचना व तकनिकि अधिनियम 2000 मे उल्लखित अश्लीलता शब्द की अवधारणा के सबन्ध मे किसी भी विधि के अस्पष्ट व भ्रामक शव्दों पर जब जब विवाद हुआ है न्यायपालिका नें हल निकाला है क्योंकि विधि सम्मत मामलों में वही सवोच्च है ।

हालाकि प्रस्तुत वाद मे देश काल व परिस्थितियो के अनुसार न्यायपालिका ने अश्लीलता शब्द की अवधारणा को सुसन्गत माना है और हिन्दुस्तान टाईम्स व टाईम्स आफ इंडिया के विवादित तथाकथित विज्ञापनों को अश्लीलता की श्रेणी मे ना मानते हुए वाद निरस्त किया है . पर इस न्याय निर्णय की कन्डिकाओ के अन्दर अश्लीलता की वही परिभाषा समझाइ गयी है जो हम सब चिठठाकार समझ रहे है कला के नाम पर नगी तस्वीरो को झेलो . 1997 मे सरस्वती की ‘नग्न’ तस्वीर और 2008 मे . . . कोइ हमारी मा बहनो की ‘नग्न’ तस्वीर बनाकर कहेगा महिलाओ का अशिष्ट रूपण (प्रतिषेध) अधिनियम 1986, भारतीय दण्ड सन्हिता 1860, प्रेस परिषद अधिनियम 1978, पत्रकरिता आचरण के सन्नियम , सुचना व तकनिकि अधिनियम 2000 इन सभी मे और तो और सविधान ने भी अभिब्यक्ति की स्वतन्त्रता दी है कला के लिये अश्लीलता परोशने की छूट है . नग्नता और अश्लीलता कुल मिलाकर नजर और समझ का ही खेल है चित्र आपकी मा बहनो से मिलती है तो मै क्या करू ।

अश्लीलता सम्बन्धी तथ्यपरक लेख और पढे ः
राष्ट्रीय सहारा 22 मइ
विश्लेषण : सार्वजनिक अभिव्यक्ति बनाम अश्लीलता (अभय कुमार दुबे )
असमय : अश्लील समस्या न उठाएं (मुद्राराक्षस)

1 comment:

  1. मेरे विचार से शालीनता से परे होना ही अश्लीलता है दीपक भारतदीप

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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