ब्लॉग छत्तीसगढ़

27 September, 2016

दोस्ती

लोटा लेके मारवाड़ के किसी बीहड़ गांव से आये नाई और बाम्हन, मॉर्निंग वाक करते हुए लड़ रहे हैं, पता नहीं क्यों? हालाँकि साथ चलने वालों का कहना है कि वे लड़ नहीं रहे हैं, मज़ाक कर रहे हैं। जो भी हो, सुबह-सुबह गन्दी गालियों का मंगलाचरण चल रहा है, स्वस्ति वाचन चारो तरफ बिखर रहा है। 'तमंचा' को आश्चर्य हो रहा है कि यह वही पंडित है जिसका पांव छू कर सेठ लोग हजार का नोट चढ़ाते हैं।
30-32 साल पहले दोनों छत्तीसगढ़ आये, बमुस्कल चौंथी कक्षा पढ़े इन दोनों में से, एक ने टपरे में सेलून खोला और दूसरे ने झुग्गी में रहते हुए पंडिताई शुरू की। दोनों ने आधा-आधा दर्जन बच्चे पैदा किये जो उनके धंधे में लग गए। मारवाड़ी भाषा को सीढ़ी बनाकर इन्होंने अपने प्रान्त के प्रति वफ़ादारी रखने वालों से सहयोग (?) प्राप्त किया।
नाइ कैंची चलाते हुए अक्षर को भूल गया और बाम्हन ने उसे साधा। दोनों का धंधा परवान चढ़ा और वे गाड़ी-बंगला टिका के नगर के श्रेष्ठि कोटि के जीव बन गए।
दोनों आये थे तब भी उनकी परिस्थिति एक थी आज भी एक है, .. किन्तु कल मुफलिसी की दोस्ती थी, आज रहीसी का रंज।
-तमंचा रायपुरी

1 comment:

  1. गंदी गारी जो बकै / जो लोटा सो पार ;)

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

Popular Posts