ब्लॉग छत्तीसगढ़

11 September, 2016

निंदा सबद रसाल


बात कड़वी जरूर लगेगी, किन्तु आंचलिक साहित्य के विकास और प्रतिष्ठा के लिए यह आवश्यक है। सो, राजन सुनें! हमारे बीच वैचारिक मतभेद जरूर हो सकते हैं किन्तु मनभेद न रहे अतः अंगन्यास करते हुए यह लिख रहा हूँ। हिमांशु देव सहाय करें और देवाधि देव विनय-विवेक देवें।

हरिभूमि द्वारा प्रदेश की भाषा, साहित्य और संस्कृति का सम्मान करते हुए चार पृष्ठों का, पाक्षिक परिशिष्ठ 'चौपाल' निकाला जा रहा है। प्रदेश के लोक अंचलों में इसकी विशाल पाठक संख्या है। इस परिशिष्ट में छपने वाला लेखक अपार लोकप्रियता प्राप्त कर, आर्यावर्त के लेखन बिरादरी में पूजे जाते हैं। तद् अस्मिन् पत्रम्-पुष्पम्-पुंगीफलम् के अधिकारी होते हुए, छपने-छपाने 200-500 का दक्षिणा भी प्राप्त करने लग जाते हैं। साहित्यिक गोष्ठियों में माई पहुना बनाये जाते हैं और तमंचा जैसे ठोठक-ठोठक कर गोठियाने पर भी, प्रखर वक्ता बुलाये जाते हैं।

ऐसे परिशिष्ट के पुस्तक चर्चा (समीक्षा?) स्तम्भ में, पिछले सप्ताह विवेक तिवारी जी द्वारा लिखी चर्चा जैसे कुछेक लेखकों की चर्चाओं को अपवाद मान ले तो, बहुधा चर्चा, स्तरीय नहीं लगती हैं। यहाँ तक कि परिशिष्ठ संपादक के द्वारा लिखी गई चर्चा भी, ऐसा मेरा मानना "था"। किन्तु ..

आज के हरिभूमि के रविवारीय परिशिष्ठ में डॉ. दीनदयाल साहू द्वारा पुस्तक दीर्घा स्तम्भ में साहित्य अमृत पत्रिका के स्वाधीनता विशेषांक का परिचय पढ़ा, दिल खुश हो गया। कुल जमा ग्यारह लाइनों में दीनदयाल की भाषा, शब्द सामर्थ्य, दृष्टी और मेधा झलक रही है। यानि कि, निंदा की कोई गुंजाइस नहीं। सच्ची में .. बधाई ले ले मेरे यार। अब से चौपाल में तुम खुद पुस्तक चर्चा लिखो, ताकि नए प्रकाशित साहित्य से हम परिचित हो सकें।

हालाँकि, हिन्दी भाषा, भाषागत-व्याकरणिक त्रुटि और उच्चारण दोष तमंचा में विद्दमान है फिर भी, चौपाल परिशिष्ठ या उसके संपादक के सम्बन्ध में तंज कसने का कोई मौका मैं चूकता नहीं हूँ ???? .. आप सही हैं।

लेखक बिरादरी में निंदा-पुराण में तमंचा जैसे बिरले उजबक लोगों को ही रूचि होती है। जिसमे से कुछ मात्र लेखन में तो कुछ वाक् में निंदा-गॉसिप करते हैं, तो कुछ लोग अपने घर में जुरिया कर निंदा करते-कराते हैं। कुछ लोग फेसबुक-व्हॉट्सएप में तुतारी-कोचक कर या आभा-मारकर निंदा करने का मौका भी लपकते हैं। मैं इस आखिरी श्रेणी का निंदक हूँ। .. और तब से हूँ जब से यह ज्ञात हुआ है कि, हमारे जैसे लोगों के आँगन-कुटी को छवाने का टेंसन दूसरों का रहता है।
-तमंचा रायपुरी

4 comments:

  1. सच्चाई हमेशा कडबी होती है
    Seetamni. blogspot. in

    ReplyDelete
  2. कुछ लोग फेसबुक-व्हॉट्सएप में तुतारी-कोचक कर या आभा-मारकर निंदा करने का मौका भी लपकते हैं। मैं इस आखिरी श्रेणी का निंदक हूँ ..

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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11 September, 2016

निंदा सबद रसाल


बात कड़वी जरूर लगेगी, किन्तु आंचलिक साहित्य के विकास और प्रतिष्ठा के लिए यह आवश्यक है। सो, राजन सुनें! हमारे बीच वैचारिक मतभेद जरूर हो सकते हैं किन्तु मनभेद न रहे अतः अंगन्यास करते हुए यह लिख रहा हूँ। हिमांशु देव सहाय करें और देवाधि देव विनय-विवेक देवें।

हरिभूमि द्वारा प्रदेश की भाषा, साहित्य और संस्कृति का सम्मान करते हुए चार पृष्ठों का, पाक्षिक परिशिष्ठ 'चौपाल' निकाला जा रहा है। प्रदेश के लोक अंचलों में इसकी विशाल पाठक संख्या है। इस परिशिष्ट में छपने वाला लेखक अपार लोकप्रियता प्राप्त कर, आर्यावर्त के लेखन बिरादरी में पूजे जाते हैं। तद् अस्मिन् पत्रम्-पुष्पम्-पुंगीफलम् के अधिकारी होते हुए, छपने-छपाने 200-500 का दक्षिणा भी प्राप्त करने लग जाते हैं। साहित्यिक गोष्ठियों में माई पहुना बनाये जाते हैं और तमंचा जैसे ठोठक-ठोठक कर गोठियाने पर भी, प्रखर वक्ता बुलाये जाते हैं।

ऐसे परिशिष्ट के पुस्तक चर्चा (समीक्षा?) स्तम्भ में, पिछले सप्ताह विवेक तिवारी जी द्वारा लिखी चर्चा जैसे कुछेक लेखकों की चर्चाओं को अपवाद मान ले तो, बहुधा चर्चा, स्तरीय नहीं लगती हैं। यहाँ तक कि परिशिष्ठ संपादक के द्वारा लिखी गई चर्चा भी, ऐसा मेरा मानना "था"। किन्तु ..

आज के हरिभूमि के रविवारीय परिशिष्ठ में डॉ. दीनदयाल साहू द्वारा पुस्तक दीर्घा स्तम्भ में साहित्य अमृत पत्रिका के स्वाधीनता विशेषांक का परिचय पढ़ा, दिल खुश हो गया। कुल जमा ग्यारह लाइनों में दीनदयाल की भाषा, शब्द सामर्थ्य, दृष्टी और मेधा झलक रही है। यानि कि, निंदा की कोई गुंजाइस नहीं। सच्ची में .. बधाई ले ले मेरे यार। अब से चौपाल में तुम खुद पुस्तक चर्चा लिखो, ताकि नए प्रकाशित साहित्य से हम परिचित हो सकें।

हालाँकि, हिन्दी भाषा, भाषागत-व्याकरणिक त्रुटि और उच्चारण दोष तमंचा में विद्दमान है फिर भी, चौपाल परिशिष्ठ या उसके संपादक के सम्बन्ध में तंज कसने का कोई मौका मैं चूकता नहीं हूँ ???? .. आप सही हैं।

लेखक बिरादरी में निंदा-पुराण में तमंचा जैसे बिरले उजबक लोगों को ही रूचि होती है। जिसमे से कुछ मात्र लेखन में तो कुछ वाक् में निंदा-गॉसिप करते हैं, तो कुछ लोग अपने घर में जुरिया कर निंदा करते-कराते हैं। कुछ लोग फेसबुक-व्हॉट्सएप में तुतारी-कोचक कर या आभा-मारकर निंदा करने का मौका भी लपकते हैं। मैं इस आखिरी श्रेणी का निंदक हूँ। .. और तब से हूँ जब से यह ज्ञात हुआ है कि, हमारे जैसे लोगों के आँगन-कुटी को छवाने का टेंसन दूसरों का रहता है।
-तमंचा रायपुरी
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