ब्लॉग छत्तीसगढ़

07 October, 2015

सामयिक प्रश्‍न: कोजन का होही

धर्मेंद्र निर्मल छत्तीसगढ़ी भाषा के साहित्य मे एक जाना पहचाना युवा नाम है। धर्मेंद्र निर्मल आजकल व्यंग, कहानी, कविता और छत्तीसगढ़ी के अन्यान्य विधाओं पर लगातार लेखन कार्य कर रहे है। उन्होंनें लेखनी की शुरुआत छत्तीसगढ़ी सीडी एल्बमों मे गाना लेखन के साथ आरंभ किया था। बाद में उन्‍होंनें नुक्कड़ नाटक एवं टेली फिल्मों में मे भी कार्य किया और स्क्रिप्ट रायटिंग में भी हाथ आजमाया। संभवत: रचनात्मकता के इन राहों नें उन्हें साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र का सहज ज्ञान उपलब्ध कराया। छत्तीसगढ़ी साहित्य में कुछ गिने चुने युवा सार्थक व गंभीर लेखन कर रहे हैं उसमें से धर्मेंद्र निर्मल अहम हैं। धर्मेंद्र निर्मल सिर्फ छत्तीसगढ़ी में ही नहीं, हिन्दी के सभी विधाओं में निरंतर लेखन कर रहे हैं। उनकी लेखनी में हिन्दी साहित्य संस्कार का दर्शन होता है। जिससे यह प्रतीत होता है कि वे स्वयं बेहतर पाठक है और हिन्दी के साहित्य का लगातार अध्ययन करते रहते हैं। उन्हें साहित्य की नई विधाओं, आलोचना के बिन्दु और नवाचार का ज्ञान है। वे हिन्दी के नवाचारों का प्रयोग छत्तीसगढ़ी लेखन में करते नजर आते हैं। मैं उनकी व्यंग लेखनी का कायल रहा हूँ और मेरी अभी अभी प्रकाशित छत्तीसगढ़ी व्यंग के सिद्धांत और आलोचना से संबंधित किताब में मैंनें उस पर काफी कुछ लिखा भी है।

अभी हाल ही में उनकी एक छत्तीसगढ़ी गजल संग्रह ‘कोजन का होही’ प्रकाशित हुई है। इस किताब की भूमिका लिखते हुए गजल कार डॉ. संजय दानी नें लिखा है कि ‘... उनकी सारी कविताओं के चेहरे गजल का मुखौटा लगाए हुए हैं, वैसे तो काफियों और रदीफों की उन्हें अच्छी समझ है फिर भी रचनाएँ पूर्णरुपेण गजलों का भेष धारण नहीं कर पाये हैं।‘ डॉ.संजय दानी नें इस संग्रह में संग्रहित रचनाओं की प्रशंसा करते हुए इसे काव्‍य संग्रह स्‍वीकार किया है। इस लिहाज से इस काव्य संग्रह के संबंध में मैं कुछ बातेँ करना चाहूंगा।

आजकल लोक भाषा छत्तीसगढ़ी में दना-दन गजल सग्रह छप रहे हैं और उस्ताद इन संग्रहों को गजल की कसौटी से परे बता रहे हैं। अब पाठकों के लिए उहापोह की स्थिति है कि इन संग्रहों को गजल मानें या ना माने। धर्मेंन्द्र के इस संग्रह को भी गजल मानें कि ना मानें यह एक अलग मुद्दा है किन्तु इस संग्रह में संग्रहित काव्य की पूर्णता को आप नकार नहीं सकते। कवि हम सब के बीच उपस्थित इसी प्रकार के सार्वभौम दुविधा की स्थिति को पकड़ रहा है। सही मायनों में यही अभिव्यक्ति की चिंता है, यह समय और समाज की भी चिंता है। वर्तमान मे जो वि‍कृत समाज है वह विद्रूपों से भरा हुआ है। लगातार बद से बदतर होती परिस्थितियों में हर कोई कह उठेगा कि, ‘..पता नही क्या होने वाला है।‘ (‘..कोजन का होही..’) अभिव्यक्ति कैसे होने वाली है, समाज किस दिशा मे जाने वाला है, या यह जो स्थिति है वह और कितना विभत्स , दुखमय और असह होने वाला है। यह चिंता और प्रश्न ही इस किताब का मूल है।

इस संग्रह की रचनाओं में धर्मेंद्र निर्मल गवई मिट्टी के फलेवर और संस्कृति से ओत प्रोत नजर आते हैं। जिसमें जन सामान्य को समाज में बेहतर स्थान दिलाने की जिजीविषा कूट कूट कर भर हुई है। धर्मेंद्र निर्मल की इस कविता संग्रह में 67 रचनाएँ समाहित है। इन रचनाओं में धर्मेंद्र लगातार एक आम आदमी की बातोँ को रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत करते नजर आते हैं उनकी अनेक रचनाओं में प्यार, श्रृंगार, दुख-दर्द और लोक आकांक्षाओं का विश्लेषण है। प्रत्येक रचनाकार संवेदनशील होता है। वह समाज के बीच ही आगे बढ़ता है और अपने आस-पास को ही रचता है परंतु अपनी विशिष्ठ संवेदना के कारण ही वह दूसरे रचनाकारोँ से अलग प्रतिष्ठित होता है। धर्मेन्द्र की यह संवेदना उसकी रचनाओं में नजर आती है। संग्रह को आप शीघ्र ही गुरतुर गोठ में पढ़ पायेंगें। धर्मेन्द्र निर्मल की कुछ हिन्दी कविताओं और कुछ छत्तीसगढ़ी गजलों को यहॉं प्रस्तु़त कर रहे हैं।

-संजीव तिवारी


धर्मेन्‍द्र निर्मल की हिन्‍दी कवितायें-

साहसी

तुम साहसी हो साहेब
लड़ते नहीं थकते
सोते - जागते
उठते - बैठते
खड़े हो - होकर
बैठने के लिए
समाज से, देश से , जिंदगी से
जिंदगी भर।

जिंदगी से जिंदगी भर
हम लड़ते हैं
बालिश्‍त पेट के लिए
सो जाते हैं
जब थकते हैं।

भीड़

ये भीड़ है बाबू, नासमझ भीड़
भीड़ जानती हैं
सिर्फ पत्थर को पूजना
पत्थर से मारना
पत्थर हो जाना
और, पत्थर पर नाम खुदवाना

चीखोगे, चिल्लाओगे नही सुनने वाले
समझाना चाहोगे नहीं बूझने वाले
चुपचाप चलोगे नहीं गुनने वाले
हाँ, पागल कहकर पत्थर जरूर मारेंगे

तुम चाहते हो
आदमी, आदमी बना रहे
मेरी मानो ! बैठ जाओ कहीं भी
पत्थर होकर।

माँ का जीवन

माँ का जीवन
रात सारी माँ की
आँखों में कटती है
जाने कब कंस
काली कोठरी मे आ धमके।

सुबह बच्चे को स्कूल भेजते वक्त
मुँह पे आ जाता है कलेजा
देखकर भयानक कलजुगी वाचाल चेहरा
गूंगे अखबारों का।

मन को मथते
माथे को कुरेदते
घुमड़ती रहती है पूरे दिन
चिंताओं की भीड़
कि मेरा नयनाभिराम
किसी से लड़ तो नहीं
रहा होगा ?
और मेरी कोमलांगी सीता ?
हाय राम !
पता नहीं कब कहाँ
क्या घट जाए
बढ़ रहे हैं दिन - ब - दिन
रक्तबीज से यहां
दशानन - दुशासन।
जैसे - तैसे आती है
ढलान पर शाम
सुनकर घण्टी की आवाज
जब दरवाजा खोलती है माँ
देखते ही
अपनी ऑखों के तारे को
सीने से लगा
पा लेती है गोद में
भरपूर सतयुग।

न जाने दिन भर में
इस तरह
कितने जुग जी लेती है माँ।

जंगल

बचपन में
जंगल का नाम सुनकर
कांपता था मैं।

किताबों में पढ़ी थी मैने
सुना भी था
जंगल में शेर, चीते, भालू रहते हैं
जो बड़े क्रूर और हिंसक होते है।

अब सिर्फ मैं ही नहीं
दुनिया कांपती है जंगल के नाम से
सुना है
शेर, चीते, भालू नहीं रहे अब
वहां इंसानों का डेरा है।

कहानी

एक राजा
एक रानी

एक का भाई मंत्री
एक का कोतवाल
खजाने का पूरा माल
काले से काला
लहू से लाल
जिनके रक्षक
यक्ष सवाल

बच्चे!
बढ़कर एक एक से
बड़े कमाल के
कोई हमाल से
कोई दलाल से
नमक हलाल से

सबके सब
झखमार
बटमार
लठमार।।


धर्मेन्‍द्र निर्मल की छत्‍तीसगढ़ी गज़लें

कौड़ी घलो जादा हे मोल बोल हाँस के

कौड़ी घलो जादा हे मोल बोल हाँस के।
एकलउता चारा हे मनखे के फाँस के।।

टोर देथे सीत घलो पथरा के गरब ला।
बइठ के बिहिनिया ले फूल उपर हाँस के।।

सबे जगा काम नइ आय, सस्तर अउ सास्तर।
बिगर हाँक फूँक बड़े काम होथे हाँस के।।

हाँसी बिन जिनगी के, सान नहीं मान नहीं।
पेड़ जइसे बिरथा न फूलय फरय बाँस के।।

दुनिया म एकेच ठन चिन्हा बेवहार हँ।
घुनहा धन तन अउ भरोसा नइहे साँस के।।

कोन ल कहन अपन संगी

दुवारी के नाम पलेट कस, हाल हवय परमारथ के।
कोन ल कहि अपन संगी, संग हावय इहाँ सुवारथ के।।

छोटे बड़े दूनो ल चाही, अपन अपन बढ़वार ठसन।
अपने अपन बीच घलो, जंग हावय इहाँ सुवारथ के।।

भूखे पेट कमावत हे अउ पेट भरे मेछरावथे।।
एक पेट एक भूख कई, रंग हावय इहाँ सुवारथ के।।

सभयता संसकीरति के हम, गुनगान आगर करथन।
घिरलउ ओन्हा म घलो तन, नंग हवय इहाँ सुवारथ के।।

उप्पर जान हरू फूलपान, खाल्हे जान मान भारी।
उप्पर वाले घलो देख, दंग हवय इहाँ सुवारथ के।।

अब तो जग के करता धरता, बन बइठे हे रूपइया।
दया मया इमान धरम, चंग हावय इहाँ सुवारथ के।।

कहाँ गरीबन के पाँव उसल जाही

कहाँ गरीबन के पाँव उसल जाही।
पाँवे संग सरी छाँव उसल जाही।।

कोन हवय जीव ले जाँगर कमइया।
अमीर मन के तो नाँव उसल जाही।।

गाहीच कइसे कुहु कोइली सुछंद ।
जब कऊँवेच के काँव उसल जाही।।

कइसे के काला उछरही भुईंए हँ ।
जब कमइयेच के ठाँव उसल जाही।।

कते साहर कोन गाँव नइ बसे हे।
साहरे कहाँ जब गाँव उसल जाही।।

दुनिया म जम्मो पूरा ककरो

अपन रद्दा खुदे बनाथे खोजे मिलय नहीं किताब।
मया पीरा म हीरा पीरा के होवय नहीं हिसाब।।

नानुक जिनगी ल झगरा करके झन कर खुवार अइसे।
मया करे बर कभू समे दुबारा मिलय नही जनाब।।

लहुट नइ सकबे आके सुरता दूर गजब ले जाथे।
काकर संग गोठियाबे अकेल्ला मिलय नही जवाब।।

मया सींचे म मया पनपथे काम दगा हँ नइ आवय।
काँटा हे तभो बंबरी म कभू फूलय नही गुलाब।।

जतका हे ततके के खुसी म मजा हे जिनगानी के ।
जग म जम्मो कभू पूरा ककरो होवय नही खुवाब।।

कमाल होगे राजा

परजा के नारी ल छूवत मत्था ल ताड़ गे।
कमाल होगे राजा तोर हत्था हँ माड़ गे।।

पाँच साल के बिसरे आज घरोघर घुसरथस।
कमाल होगे राजा तोर नत्ता हँ बाड़ गे।।

अकाल म कोठी खुले बाढ़ म धोए बंगला।
कमाल होगे राजा तोर छत्ता हँ बाड़ गे।।

परजा के पिरा गे मुँहू फारे मँहगई ले।
कमाल होगे राजा तोर भत्ता हँ बाड़ गे।।

कुकुर खाय बिदेसी चारा परजा बर पैरा।
कमाल होगे राजा तोर सत्ता हँ बाड़ गे।।

3 comments:

  1. अद्भुत और लाजवाब रचनाएँ, आपके संग आपके लेखनी ला प्रणाम।

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  3. धर्मेन्‍द्र निर्मल जी की हिन्‍दी कवितायें बहुत प्रभावकारी है। ।
    निर्मल जी को उनके छत्तीसगढ़ी गजल संग्रह ‘कोजन का होही’ के प्रकाशन पर हार्दिक शुभकामनायें!
    सार्थक प्रस्तुतिकरण हेतु आपका आभार!

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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