संजीव तिवारी की कलम घसीटी

22 March, 2013

पिछले दिनों भिलाई के स्‍वामी श्री स्‍वरूपानंन्द सरस्‍वती महाविद्यालय में लाईनेक्स इंडिपेन्डेंट वर्क स्टेशन विषय पर एक कार्यशाला आयोजित किया गया था जिसमें विषय विशेषज्ञों के द्वारा लाइनेक्सं के अनुप्रयोग संबंधी वक्तव्य दिये गए.

प्राचार्य डॉ.(श्रीमती) हंसा शुक्ला ने बताया कि कार्यशाला के आयोजन का मुख्य उद्धेश्य महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं को साफ्टवेयर की एक ऐसी तकनीक से अवगत कराना था जिसमें कि वे पूर्णतः स्वतंत्र वातावरण में कार्य कर सकें। कार्यशाला में उपस्थित मुख्य वक्ता क्षितिज सिंघई (निदेशक, इन्फोसाल्यूशन) ने लाईनेक्स तकनीक की बारीकियों तथा लाईनेक्स में काम करने की तरीकों और उपयोग में आने वाली भाषाओं के संबंध में छात्र-छात्राओं को जानकारी दी। उन्‍होंनें छात्र-छात्राओं को लाईनेक्स में कार्य करना भी सिखाया व लाईनेक्स से संबंधित सर्टिफिकेशन कोर्स के महत्व को भी बताया। रेड हैड के सचिन नायक जो कि विषय विशेषज्ञ के रूप में कार्यशाला में उपस्थित थे। उन्होंने लाईनेक्स और विन्डोज के अंतर को छात्र-छात्राओं को समझाया व बतलाया कि कम्‍प्‍यूटर के क्षेत्र में एकाधिकार को समाप्त करने में लाईनेक्स ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इस समाचार से मुझे खुशी हुई कि अब धीरे धीरे लाईनेक्‍स के प्रति नई पीढ़ी की रूचि बढ़ रही है। प्राप्‍त जानकारी के अनुसार यह कार्यक्रम महाविद्यालय स्‍तर का था एवं इसमें व्‍याख्‍याता व छात्र छात्राओं नें भाग लिया, आगे इन्‍हीं छात्र छात्राओं को माईक्रोसाफ्ट से लोहा लेना है। 
शुभकामनायें ...

21 March, 2013


खासकर फेसबुक व ट्विटर पर लोग रोमन में हिन्‍दी संदेश लिखते हैं जिसे पढ़ने के लिए दिमाग को काफी मशक्‍कत करनी होती है। इसके समाधान के लिए गूगल बाबा नें एक एप्‍स विकसित किया है जो ऐसे साथियों के लिए बड़े काम की है। गूगल के हिन्दी इनपुट एप्स (Google app with Hindi Input) से आपका मोबाईल या टैब हिंदी शब्द टाइप करने के लिए सक्षम बनता है। इस एप्‍स से आपके मोबाईल की बोर्ड से अंग्रेजी अक्षरों में टाईप करने से देवनागरी लिपि प्रस्‍तुत होती है, यह लिप्यांतरण समर्थक है। इसमें आप जैसे ही अंग्रेजी अक्षरों को टाईप करते जाते हैं शब्‍द देवनागरी में बदलते जाते है। यह हिन्‍दी देवनागरी के साथ ही तेलुगु, मलयालम, तमिल, बंगला, उर्दू और मराठी लिप्यंतरण उपकरण प्रदान करता है।

जब आप हिन्‍दी में लिखना चाहें तो स्‍पेस बार के बाजू में दिये लैग्‍वेज की को क्लिक करें, अब रोमन टाईप करने से हिन्‍दी टाईप होने लगेगा। जब आप अंग्रेजी में टाईप करना चाहें हों तो स्‍पेस बार में लिखे अंग्रेजी को दबा दे अंग्रेजी टायपिंग चालू हो जावेगा।
  
यह एप्‍स 2.2 Android या उच्च संस्करण वाले किसी भी Android डिवाइस पर एक डिफ़ॉल्ट कुंजीपटल के रूप में स्थापित किया जा सकता है और यह Google Play स्टोर से फ्री डाउनलोड किया जा सकता है। डाउनलोड करने के उपरांत आपको अपने मोबाईल या टैब में  - सेटिंग - लोकेट एण्‍ड टैक्‍स्‍ट - यहॉं आपको गूगल इनपुट नजर आयेगा इसे एक्टिवेट कर लीजिये, हो गया काम. अब आनंद लेवे,  रोमन में लिखे और हिन्‍दी पायें. 


छत्‍तीसगढ़ उच्‍च न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधिपति माननीय श्री न्यायमूर्ति यतीन्द्र सिंह जी के पदभार ग्रहण करते ही छत्‍तीसगढ़ के न्‍यायालयीन कार्यो में तेजी से कसावट आई है एवं मुख्‍य न्‍यायाधिपति माननीय श्री न्यायमूर्ति यतीन्द्र सिंह जी नें व्‍यापक जन हित में आवश्‍यक न्‍यायिक एवं प्रशासनिक फेरबदल किये हैं।

इसी कड़ी में उन्‍होंनें सर्वप्रथम छत्‍तीसगढ़ उच्‍च न्‍यायालय के न्‍याय निर्णयों को आनलाईन करने का महत्‍वपूर्ण कार्य करवाया है। इस वेबसाईट में उन्‍होंनें आरएसएस फीड के द्वारा महत्‍वपूर्ण निर्णय / ए.एफ.आर. एवं प्रशासनिक सूचनायें प्रस्‍तुत करवा कर इसे त्‍वरित व सर्वसुलभ कर दिया है। हिन्‍दी भाषा प्रेमियों के लिए अति प्रशन्‍नता की बात है कि अब उच्‍च न्‍यायालय के वेबसाईट में हिन्‍दी भाषा का भी विकल्‍प जुड़ गया है।

वर्षों से उच्‍च न्‍यायालय के इस वेबसाईट का उपयोग मात्र वाद सूची देखने के लिए ही हो पा रहा था किन्‍तु अब यह देश के अन्‍य न्‍यायालयों के बेवसाईटों जैसी उपयोगी हो गई है।

आप भी देखें ...

14 March, 2013

साथियों, भंडारपुर निवासी श्री नूतन प्रसाद शर्मा द्वारा लिखित व प्रकाशित छत्‍तीसगढ़ी महाकाव्‍य “ गरीबा” का प्रथम पांत “चरोटा पांत” गुरतुर गोठ के सुधी पाठकों के लिए प्रस्‍तुत कर रहा हूं। इसके बाद अन्य पांतों को यहॉं क्रमश: प्रस्‍तुत करूंगा। यह महाकाव्य दस पांतों में विभक्त हैं। जो “चरोटा पांत” से लेकर “राहेर पांत” तक है। यह महाकाव्य कुल 463 पृष्ट का है।

आरंभ से लेकर अंत तक “गरीबा महाकाव्य” की लेखन शैली काव्यात्मक है मगर “गरीबा महाकाव्य” के पठन के साथ दृश्य नजर के समक्ष उपस्थित हो जाता है। ऐसा अनुभव होता है कि “गरीबा महाकाव्य“ काव्यात्मक के साथ कथानात्मक भी है। ऐसा लगता है कि लेखक ने एक काव्य की रचना करने के साथ यह भी ध्यान रखा कि कहानी समान चले अर्थात गरीबा महाकाव्य को पढ़ने के साथ - साथ उसकी कहानी भी समक्ष आने लगती है। “गरीबा महाकाव्य” दस पांतों में विभक्त है पर हर पांत कहानी को जोड़ती हुई चली जाती है। "गरीबा महाकाव्य" की इस खासियत को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि छत्तीसगढ़ी के लुप्त होते शब्दों को भी बचाने का पूरा - पूरा प्रयास किया गया है। अर्थात “गरीबा महाकाव्य” में छत्तीसगढ़ी के वे शब्द जो अब लुप्त होने के कगार पर है उसे बचा लिया गया है।

“गरीबा महाकाव्य” में लेखक ने छत्तीसगढ़ी जनजीवन, सामाजिक परिवेश, सांस्कृतिक, साहित्यिक पक्ष का समावेश किया है। इससे छत्तीसगढ़ के जीवन शैली का जीवंत तस्वीर सामने आ जाती है। निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ के जनजीवन को यथा संभव जैसे छत्तीसगढ़ के लोग है रखने का प्रयास किया है वहीं पूरे महाकाव्य को छत्तीसगढ़ी में लिखकर छत्तीसगढ़ी साहित्य को समृद्धिशाली बना दिया गया है। मेरा पाठकों से अनुरोध है कि इस उल्‍लेखनीय व महत्‍वपूर्ण साहित्य को अवश्य पढ़ें एवं छत्‍तीसगढ़ी साहित्‍य का आनंद लेवें।

सुरेश सर्वेद
सांई मंदिर के पीछे, तुलसीपुर,
राजनांदगांव [छत्तीसगढ़]
मोबाईल - 94241 - 11060

Nutan Prasad
महाकाव्‍य लेखक नूतन प्रसाद शर्मा के जीवन परिचय

नाम - नूतन प्रसाद शर्मा
जन्म - 20-10 - 1945 ; बीस अक्टूबर उन्नीस सौ पैंतालीस
पिता - स्वर्गीय पंडित माखन प्रसाद शर्मा
माता - स्वर्गीया श्रीमती नरमद शर्मा
पत्नी - श्रीमती हीरा शर्मा
जन्म स्थान व पता - भंडारपुर करेला, पोष्ट – ढारा, व्हाया - डोंगरगढ, जिला - राजनांदगांव; छत्तीसगढ़
प्रकाशित कृतियां - छत्तीसगढ़ी गरीबा महाकाव्य, सपने देखिये व्यंग्य संग्रह
लेखन, प्रकाशन एवं प्रसारण - वर्ष 1970 से सतत व्यंग्य, लघुकथायें, गीत इत्यादि विधाओं पर लेखन व देश के प्रतिष्ठित अनेक पत्र प्रत्रिकाओं में अनेक रचनाओं के प्रकाशन के साथ आकाशवाणी रायपुर से अनेक रचनाओं का प्रसारण;
संप्रति - सेवानिवृत प्रधान पाठक
आगामी प्रकाशन - व्यंग्य संग्रह

साथियों एक बार पढ़ कर देखें एवं संभव हो तो उसी पोर्टल के कमेंट बाक्‍स में कमेंट कर हमारा उत्‍साहवर्धन करें - गरीबा : महाकाव्य (पहिली पांत : चरोटा पांत)

05 March, 2013

5 मार्च जनकवि कोदूराम दलित जयंती पर विशेष .....

(नई दुनिया 4 मार्च1968 में प्रकाशित लेख, नई दुनिया से साभार)

जिसका कमलीवाला था वह स्वयं भी अपने कमलीवाले की तरह ही काला था तन से, मन से नहीं.....| काव्य-साधना के श्याम रंग थे छत्तीसगढ़ी के वयोवृद्धकवि कोदूराम जी “दलित” | उनके ‘काले की महिमा’ ने तो छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में धूम मचा दी थी | ...गोरे गालों पर काला तिल खूब दमकता....उनका यह कटाक्ष जाने कितनी लावण्यमयियों के मुखड़े पर लाज की लाली बिखेर देता था..... नव-जवान झूम उठते थे.....एक समां बँध जाता था उनकी इस कविता से | आज बरबस ही उनकी स्मृति आती है तो स्मृत हो आते हैं उनके पीड़ा भरे वे शब्द, एक स्वप्न की तरह उनका वह झुर्रीदार चेहरा उभर उठता है स्मृति के आकाश पर.....| वे हाथ में थैली लिए बुझे-बुझे से चले आ रहे थे | मेहता निवास (दुर्ग) के निकट ही वे मुझे मिल गये | मैंने कुशल-क्षेम पूछी तो बरबस ही उनकी आँखें द्रवित हो आई....कहने लगे ज्ञान सिंह बहुत कमजोर हो गया हूँ | चंद्रजी व वोरा जी ने मिलकर सिविल सर्जन को दिखाया है...अब अच्छा हो जाऊंगा....| अस्पताल में दवा नहीं है | डॉक्टर लिख देते हैं , प्रायवेट मेडिकल स्टोर्स से दवा खरीदना पड़ता है.... इंजेक्शन लग रहे हैं , ताकत बिल्कुल नहीं है शरीर में और यह कहते-कहते उनका कंठ अवरुद्ध हो आया | मौत की काली परछाई वे देख रहे थे | एकदम निराश , एकदम शिथिल शून्य | मैंने कहा दलित जी आप आराम अधिक करें |ईश्वर सब ठीक कर देगा | आप शीघ्र ही स्वस्थ हो जाएंगे | इंजेक्शन लग रहे हैं न.....तो, ताकत भी आ जायेगी....| उनकी निराश आँखें क्षण भर मुझे देखती रहीं | फिर उन्होंने कहा जिसमें एक साहित्यकार की मर्मांतक पीड़ा कराह रही थी | कहने लगे ज्ञानसिंह आधा तो कवि सम्मेलन करा - करा कर लोगों ने मार डाला मुझको | रात भर चाय पिला-पिलाकर कविता सुनते हैं.....| खाने को दिया तो ठीक है नहीं तो सुनाओ कविता जाग-जाग कर आधी रात तक और 21) लो और घर जाओ | कहने लगे ये पी. आर. ओ. संतोष शुकुल कराते हैं न सरकारी कवि सम्मेलन उसमें तो कोई चाय तक को नहीं पूछता....|

सोचता हूँ तो ये सब चेहरे एक-एक कर स्मृत हो आते हैं.....महाकवि निराला....मैथली शरण गुप्त....माखनलाल चतुर्वेदी....मुक्तिबोध इन्होंने हमें क्या नहीं दिया और क्या दिया हमने उन्हें बदले उसके....| वह इलाहाबाद की माटी हो या दिल्ली की या छत्तीसगढ़ की ...माटी सबकी प्यारी है.... है तो भारत की ही माटी... और इस संदर्भ में याद हो आयी हैं वे पंक्तियाँ जाने क्यों....तन का दिया,प्राण की बाती ...दीपक जलता रहा रात भर | हाँ हमारे दलित जी भी जलते रहे दीपक की तरह....और भूखी और जलती सदी का छत्तीसगढ़ी का कवि दलित भी खो गया पीड़ा के बियाबानों में....| दलित जी सचमुच दलित ही थे शायद जिनका शोषण किया गया | तब वे काफी अस्वस्थ थे | एक कवि गोष्ठी में उनकी अस्वस्थता का समाचार मुझे मिला तब मैंने कहा भाई सब मिलकर कुछ करो.....कुछ और नहीं तो उनका सार्वजनिक अभिनंदन ही कर दो....मेरी आवाज को शून्य आकाश निगल गया...और बात आई गई हो गई | नियति को कुछ और ही मंजूर था....| उनकी हार्दिक इच्छा थी कि उनका एक संग्रह छप जाता परन्तु उनकी यह इच्छा उस समय बड़ी ही कठिनाई से पूरी हो पाई जब व्यक्ति की कोई इच्छा शेष नहीं रह जाती है | एक ओर मौत के लम्बे और ठंडे हाथ आगे बढ़ रहे थे उनकी ओर और दूसरी ओर छप रहा था उनका काव्य-संग्रह | कैसी विडम्बना थी वह | अपना जीवन जिसने माँ भारती के चरणों में समर्पित कर दिया उसे अंतिम समय में क्या मिला.....गहन नैराश्य....पीड़ा और मुद्रा राक्षस का आर्तनाद... | सोचता हूँ मेरे छत्तीसगढ़ की धरती सरस्वती पुत्रों को जन्म देती आई है ....क्या उसे उसके पुत्रों की कराह भी सुनाई नहीं देती | जिस धरती की खुशी उसकी खुशी थी ... जिस धरती का दु:ख उसका दु:ख था ....उस धरती के लोगों ने क्या दिया उसे.... और एक पश्चाताप की अग्नि में मैं जलने लगता हूँ.... चाहता हूँ इस प्रसंग से हट जाऊँ.....चाहता मोड़ दूँ एक पुष्ट कविता की तरह ......लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाता हूँ .... और एक कवि का... नहीं-नहीं .....एक व्यक्ति का एक सर्वहारे का झुर्रीदार चेहरा आँखों में झूल उठता है |…नहीं-नहीं , कवि तो युग-दृष्टा होता है....वह सर्वहारा कैसे हो सकता है | वह अजर-अमर है .....छत्तीसगढ़ की माटी में जब तक सोंधी-सोंधी महक उठेगी ,जब तक चाँद और चकोर है, अमराइयों में जब तक काली कोयल गायेगी....चातक जब तक स्वाती की एक बूँद को तरसेगा , तब तक वह अजर-अमर है ....उसके झुर्रीदार चेहरे पर जाने कितने प्रश्न-चिन्ह अंकित थे....और वे छत्तीसगढ़ की माटी में आज भी प्रश्न-चिन्ह बन कर अंकित हैं ....शायद सदा अंकित रहेंगे |

आज भी जब दुर्ग के उन गली –कूचों से गुजरता हूँ तो आते-जाते यह ख्याल आता है कि शायद दलित जी इस ओर से आते होंगे | पाँच-कंडील चौराहे पर पहुँचकर ठिठक जाता हूँ....तस्वीरों की यही दुकान है जहाँ उनकी खास बैठक होती थी ....यही वह स्थान है जहाँ वे घंटों बैठे खोये-खोये से जाने क्या सोचा करते थे | मेरे कानों पर फिर उनके शब्द गूँज उठे हैं....आप बहुत अच्छा लिख रहे हो......शिक्षक वाली कविता बहुत सुंदर है.....बिना कफन मत निकले लाशें सरस्वती के बेटों की...हँसी खुशी मत लुटे किसी भी लक्ष्मी के अब ओठों की....आपका आशीर्वाद है दलित जी ....मैं कहता हूँ | ...आज फिर बरबस ही हृदय भर आया है | जीवन संघर्षों से जूझते हुये भी एक शिक्षक ने छत्तीसगढ़ी बोली में जो कवितायें लिखी हैं उनमें न केवल लोकपरक अनुभूतियों का जीता-जागता चित्रण है बल्कि उनमें छत्तीसगढ़ की धरती का प्यार है.... सोंधी-सोंधी महक है |यहाँ की लोक-संस्कृति व अलबेले लोक चित्र हैं जिनके माध्यम से वे सदा अजर-अमर रहेंगे | आज उनकी प्रथम जयंती की पावन बेला में सरस्वती के इस वरद् पुत्र को अपने श्रद्धा के सुमन अर्पित करते हैं |

-ज्ञानसिंहठाकुर 
(नई दुनिया 4 मार्च1968 में प्रकाशित लेख, नई दुनिया से साभार)

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