ब्लॉग छत्तीसगढ़

14 April, 2010

माओ के पोतो, तुम कायर-बटमार हो... : दीपक शर्मा

पिछले दिनों बस्तर के चिंतलनार में हुई भयानक घटना की खबर इंटरनेट अखबार में पढ़ी तब से अब तक रह-रह यह विचार दिल को कुरेदते हैं कि जिन परिजनों को अपने प्रिय को खोने का दुख हुआ होगा उन पर क्या बीत रही होगी। उनके आंखों के आंसू सूखेंगे या नहीं। वस्तुत: यह घटना सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा करती है कि नक्सलवाद नाम के इस उपद्रव को क्या आंदोलन या क्रांति मान लिया जाए? और इनके तथाकथित वैचारिक दलालों से भी ये जानने का समय है कि क्या आप इस वीभत्स कायराना हरकत पर कुछ कहेंगे या सिर्फ मौन हो कर इंतजार करेंगे कि किसी तरह फिर सत्ता की कोई गलती हाथ लग जाए जिस पर हाईकोर्ट तक डंका बजाया जाए। 
यह प्रकृति का नियम है कि आप जिससे लड़ते है, धीरे-धीरे आप उसी तरह हो जाते है इसलिए अगर मुकाबला बटमारों और कायर-कपटी लोगों से हो तो बगैर छल-कपट आप उससे जीत नहीं सकते। इतनी भारी संख्या में जवान इसलिए शहीद हुए क्योकि वो लड़ाई संवैधानिक तरीके से लड़ रहे है, कोई बेकसूर न मारा जाए इस बात का ध्यान रखकर नीतियां बनाई गई हैं, इसी का फायदा खुद को क्रांतिकारी कहने वाले ये बटमार उठा रहे है, जिन्होने बंदूक को जैसे आखिरी शस्त्र मान लिया हो। इन्हे यह जरूर याद रहे कि लोकतंत्र लाख लचीला हो मगर उसके लचीलेपन की भी एक सीमा है, इसलिए जिस दिन यह सीमा टूटेगी और हवाई-हमले जैसे अनेक तरीके उपयोग में लाए जाएंगे तब किसी पत्थर या झाड़ी के पीछे ये कथित क्रांतिकारी छुपते और अपनी जान बचाते नजर आएंगे। 
ये कैसी क्रांति है, जिसे लाने के लिए ये अराजक उन्मादी मासूम बच्चो का गला रेत रहे हैं। जिन बच्चो को स्कूल में बारहखड़ी पढऩा चाहिए वो एंबुश बिछा रहे है। जिस जवान के कंधों पर घर और समाज की जिम्मेदारी होनी चाहिए वो कंधे बंदूक लिए घूम रहे हैं। लोगों के हिस्से से उनका उजाला छीना जा रहा है और ये सारे काम कनपटी पर बंदूक रखकर कराए जा रहे हैं। जवानों के खून से बस्तर को लाल किया जा रहा है। क्या ये जवान उसी आम-जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते जिनके हक कि लड़ाई का कथित दम ये कायर भरते है। क्या जंगल के अंदर और जंगल के बाहर रहने वाले आम-जनता में भी इन फिरौतीखोरों को फर्क दिखता है? 
76 जवानों की शहादत, सचमुच दिल को दुखाने वाली है...मगर यह नक्सलियों की वीरता का सबूत नहीं है, यह कोई साहस नहीं है, यह सिर्फ मुंह बिचकाने वाली बात है। मै यहां तक कहूंगा कि ये कायर है और इनकी कायरता का सबूत है इनके कंधों पर लटकी बंदूक, इन्हे पता है कि इनकी सारी तानाशाही सिर्फ और सिर्फ बंदूक के बल पर चल सकती है मगर, इन्हे शायद पता नहीं इसी बंदूक की दम पर गरजने वाले लिट्टे का इसी बंदूक ने क्या हाल किया। जो लिट्टे का अतीत है वही इनका भविष्य है। 
लोकतंत्र  का लचीलापन इसलिए होना चाहिए कि कोई बेगुनाह अन्याय का शिकार न हो मगर, जब इसी लचीलेपन का कुछ मक्कार फ़ायदा उठाने लगे तब मेरा मानना है कि लोकतंत्र को बचाने के लिए अगर तानाशाह भी होना पड़े और इन जैसे सिरफिरों के सफाए के लिए कड़े कदम भी उठाए जाने से परहेज नहीं किया जाना चाहिए। लोकतंत्र के वो सारे हिस्से जो उसकी विशेषता हैं उसको उसकी कमजोरी बनने से रोकना लोकतंत्र को बचाये रखने के लिए अत्यंत  आवश्यक दिखता है। खुद को क्रांतिकारी कहने वाले लोगों को यह भी पता होना चाहिए कि क्रांति व्यवस्था बदलने का नाम है और यह विशुद्ध रूप से उसे बदलने के लिए अपनाए गए तरीकों पर निर्भर करती है। आज आप बंदूक और संगठन के दम पर सत्ता और ताकत अपने हाथ मे लेंगे, कल कोई दूजा प्यादा बड़ा संगठन और बंदूक लेकर आपको बाहर फेंक देगा और अंततोगत्वा हर चीज का फैसला वहा सिर्फ बंदूक से होगा। 
इन तथाकथित क्रांतिकारियों का यह समाज कितना वीभत्स हो सकता है इसकी कल्पना तक असंभव सी दिखती है। इसलिए यह आवश्यक है लोकतंत्र खुद बंदूक उठा ले और बंदूक से दुनिया बदलने वालों को यह दिखा दे कि बंदूक के बल पर न कभी कुछ बदला है न ही कुछ बदलेगा। किसी हत्यारे को लोकतंत्र यह छूट नहीं दे सकता कि जाइए हमारा भरोसा तो बंदूक में नहीं है इसलिए आप खुलेआम लोगों का गला काटते फिऱें। मेरी पूरी सिफारिश है कि लोकतंत्र को भी तलवार चलाना आना चाहिए, जरूरी नहीं कि इसका उपयोग कर किसी पर आक्रमण करना है मगर, इसलिए जरुरी है कि जब कोई सिरफिरा तलवार लेकर आपको चुनौती दे तब लोकतंत्र और निर्दोष जनता की रक्षा के लिए आप इसका उपयोग करने में समर्थ हों । 
माओ और लेनिन का दम भरने वाले उनके पोतों को ये पता होना चाहिए कि माओ और लेनिन के अच्छे होने से इनके अच्छे और बुरे होने में कोई फ़र्क नहीं पड़ता। तुम्हारे अच्छे अतीत से तुम्हारा कलंकित वर्तमान नहीं धुलता और वर्तमान चीख- चीख कर यह कह रहा है कि तुम एक कायर बटमारों का संगठन हो जो फिरौती खाने और लोगों के खून से होली खेलने का आदी हो गया है। 
नक्सलवाद जैसी विकराल और जटिल समस्या पर कांग्रेस की राजनीतिक कबड्डी अत्यंत निराश करने वाली है। नेता देश के सबसे मौकापरस्त लोग होते है यह बात इन्होने कल उपद्रव करके सिद्ध किया। आज नौटंकी करने वाली कांग्रेस को यह याद नहीं आता कि इस पार्टी ने सलवा- जुडूम जैसे मुद्दे पर तटस्थ रहने का निर्णय लिया था (?) तब ये चिल्लपों सुनाई नहीं देती थी। दर-असल एक कुर्सी बचाने में लगा है तो दूजा कुर्सी हथियाने में। और इस बीच जवान-निरीह आदिवासी पिसे जा रहे हैं। इनका विरोध बस इतना है कि उसे कुर्सी से उतारो और हमें कुर्सी में बिठा दो। आज लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि तंत्र बनाया तो जनता के इस्तेमाल के लिए गया मगर, आज जनता ही इस तंत्र के हाथों इस्तेमाल हो रही है। ऐसी ही खामियों के चलते नक्सलवाद जैसा अराजक उपद्रव यहां अपनी जगह बना पाता है। इसलिए एक तरफ़ तो यह जरूरी है कि नक्सलवाद जैसे अराजक उपद्रव को हथियार के दम पर ही सही मगर, माकूल जवाब दिया जाए और उन्हे याद दिलाया जाए कि लोकतंत्र इतना कमजोर नहीं कि कोई उन्मादी इसे बंदूक कि नोंक पर खत्म कर देगा। साथ ही दूसरी तरफ लोकतंत्र की सारी खामियों को चुन-चुन कर ठीक किया जाए और जरूरत पड़े तो संविधान के सारे पन्ने खंगाले जाएं और तंत्र के ढांचे मसलन न्याय, मीडिया इत्यादि को समय की मांग के अनुरूप सुधारा जाए। जनता भी चौकन्नी होकर यह देखे कि नक्सलवाद जैसे मुद्दे पर राजनीति नहीं हो और अगर कोई ऐसा करे तो जनता को अपने सारे पुराने जूते इन कुर्सी के जोंकों पर अर्पण करने से भी गुरेज नहीं करना चाहिए। 
इस भयानक घटना में जिन्होने अपने परिजन खोए उनका दुख मेरे ये शब्द दूर नहीं कर सकते फिर भी शब्द के सहारे वह रखने कि कोशिश कर रहा हूं जो शायद उनको दिलासा दे। प्रेम शब्द नहीं है वह शब्द से कहीं आगे की बात है मगर अभिव्यक्ति शब्द से ही होती है। उन अमर जवानों को विनम्र श्रद्धांजलि। इस आशा के साथ कि अपने हक के पैसे के लिए कम से कम इन जवानों के परिवार वालों को घूस ना देनी पड़े?
संयुक्त अरब अमीरात
दीपक शर्मा छत्तीसगढ के राजिम नगर के पास एक गांव के मूल निवासी है वर्तमान मे संयुक्त अरब अमीरात के सीमेंट प्लांट मे कार्यरत है. इनका "विप्लव" नाम से एक ब्लाग था जिसे इन्होने डिलीट कर दिया. दीपक भाई बहुसक्रिय हिन्दी ब्लागर थे. दीपक भाई आजकल छत्तीसगढ के मुद्दो पर पैनी नजर रखते है और क्षेत्रीय समाचार पत्रो के सम्पादकीय पन्ने पर इनके विचार आलेख प्रमुखता से प्रकाशित होते है. मेरे जैसे छत्तीसगढ के अतिसक्रिय हिन्दी ब्लागरो को दीपक भाई से सीख लेनी चाहिये. ..... संजीव तिवारी

8 comments:

  1. शायद कुछ दिलासा मिले...

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  2. शहिदों को श्रृद्धांजलि!!

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  3. विश्लेषण सटीक है ।

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  4. प्रिय दीपक जी
    ये आपका...मेरा और राज्य का पक्ष है / आक्रोश है / चिंतायें हैं ! क्या हम निहत्थे हैं ? नहीं ना ! हथियारबंद जत्थों की मुठभेड़ों में मृत्यु की दुखदाई कल्पना के इतर उस जनता का क्या जिसके पास दो पाटों के बीच पिसने के अतिरिक्त कोई विकल्प भी नहीं है !
    प्रिय भाई मृत्यु का इस तरह से आना अत्यंत खेदजनक है फिर चाहे वह सुरक्षा बलों की हो , निरीह जनता की हो या अन्य किसी की ! तो क्यों ना दूसरे पक्ष को भी सुना और जाना जाये ! संवाद किया जाये...दुनिया के हित में संवाद से बेहतर कोई विकल्प नहीं !
    मैं अपनी बात कुछ इस तरह से कहूं की सुरक्षा बलों और नक्सलवादियों के पास प्राण लेने और देने के दो विकल्प तथा सामर्थ्य है पर जनता...उसके पास केवल प्राण देने के अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग शेष है क्या ?
    संभव है मेरी सोच गलत हो पर मुझे संवाद हथियारों से अधिक प्रिय है !


    @संजीव भाई
    दीपक जी के विचारों को पढवाने के लिए आपका आभार ! कोई गलत बात कह दी हो तो एडवांस में क्षमा याचना !

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  5. दीपक शर्मा जी से पूरी सहमति। अगर जनता नक्सली का साथ देती है तो वह भी कायर-बटमार है।

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  6. JI BILKUL SAHMAT HAI DEEPAK BHAI SE....

    KUNWAR JI,

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  7. शहिदों को श्रृद्धांजलि!संजीव भाई
    दीपक जी के विचारों को पढवाने के लिए आपका आभार .

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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