ब्लॉग छत्तीसगढ़

25 March, 2010

कैसे बनाते है आदिवासी पारंम्परिक मंद (दारू/शराब)

बैगा आदिवासियों के द्वारा महुआ को सडा कर उसे आसवित कर बनाई जा रही देसी दारू 

बैगा आदिवासियों के गांव मे हमारे कैमरे को देख बच्चो की खुशी 
अभी हम कुछ दिनों तक इनके मुस्‍कुराहटों पे निसार होते हुए  घने जंगल के बीच बसे गांवों  में व्‍यस्‍त रहेंगें, मोबाईल फोन के कवरेज में रहे तो संपर्क में रहेंगें, नहीं तो लम्‍बी छुट्टी.
संजीव तिवारी

11 comments:

  1. आज लगाए हस हमर काम के पोस्ट,
    लेकिन जनकारी अधुरा हे,
    बने चुवाए के तरीका जानतेन
    अउ हंडिया-वड़िया लातेस बिसा के
    त हमुं हा टिराई मारतेन बाड़ा मा।:)

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  3. ललित जी, टिराई मारबे ते एकात खोँची हमरो मन बर बचा के राखबे ।

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  4. स्टैप बाई स्टैप समझाते तो काम आता..बना कर देखते. :)

    -

    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

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  5. या तो युवराज की बात
    या उड़न जी का आग्रह

    कुछ भी मानें हमारा ध्यान रखिएगा :-)

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  6. पाबला जी, लाइन लम्बी हो रही है। हमारा भी ख्याल रखिएगा...

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  7. hmm, apan line me nai lagenge.....
    kynki apan ko maloom hai, apna hissa alag se rakha hi jayega aapke dwara
    ;)

    vaise kaha pahuch gaye hain aap?

    is daure ki to puri ek shrrinkhla chalaani chahiye aapko

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  8. मुस्कुराहटों पे निसार होना ही तो जीना है ।

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  9. संजीव भाइ बस्‍तर की सुरमयी यादों मे ले जाने के लिए आपको धन्‍यवाद,,मैंने भी उन वादियों में सरकारी नौकरी के आरंभिक साल बिताये हैं,,

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  10. संजीव जी,

    'पहली धार का' हमें भी चखाना मत भूलना।

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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