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2009/09/12

हबीब तनवीर की कविता 'रामनाथ'

रामनाथ नें जीवन पाया साठ साल या इकसठ साल
रामनाथ नें जीवन में कपड़े पहने कुल छह सौ गज़
पगड़ी पॉंच, जूते पंद्रह
रामनाथ नें अपने जीवन में कुल सौ मन चावल खाया
सब्‍जी दस मन,
फाके किए अनगिनत, शराब पी दो सौ बोतल
अजी पूजा की दो हज़ार बार
रामनाथ नें जीवन में धरती नापी
कुल जुमला पैंसठ हज़ार मील
सोया पंद्रह साल.

उसके जीवन में आसीं, बीबी के सिवा, कुल पाँच औरतें
एक के साथ पचास की उम्र में प्‍यार किया
और प्‍यार किया नौ साल
सत्‍तर फुट कटवाये बाल और सत्रह फुट नाख़ून
रूपया कमाया दा हज़ार या ग्‍यारह हज़ार
कुछ रूपया मित्रों को दिया, कुछ मंदिर को
और छोड़ा कुल आठ रूपये उन्‍नीस पैसे का क़र्ज ...
... बस, यह गिनती रामनाथ का जीवन है

इसमें शामिल नहीं चिता की लकड़ी, तेल, कफ़न,
तेरहीं का भोजन
रामनाथ बहुत हँसमुख था
उसने पाया एक संतुष्‍ट-सुखी जीवन
चोरी कभी नहीं की-कभी कभार कह दिया अलबत्‍ता
बीबी से झूठ
एक च्‍यूँटी भी नहीं मारी-
गाली दी दो-तीन महीने में एक आध
बच्‍चे छोड़े सात
भूल चुके हैं गॉंव के सब लोग अब उसकी हर बात.

हबीब तनवीर

(वर्तमान साहित्‍य के सितम्‍बर 09 के अंक में प्रकाशित सत्‍यदेव त्रिपाठी जी के आलेख से साभार)
हबीब तनवीर जी पर आरंभ में एक पोस्‍ट - क्‍या नशेबो फराज थे तनवीर, जिन्‍दगी आपने गुजार ही दी.
इस लेख में उल्‍लेखित गोविन्‍दराम निर्मलकर पर आरंभ में एक पोस्‍ट - लोक कला के ध्वज वाहक.
इस लेख में उल्‍लेखित रामचन्‍द्र देशमुख पर आरंभ में एक पोस्‍ट - अंचल की पहिचान के पर्याय.

12 (टिप्पणी):

संजय तिवारी ’संजू’ said...

Thanks

Aflatoon said...

हबीब तनवीर साहब की सृजनात्मकता का यह पक्ष भी कितना मजबूत है । आभार ।

Udan Tashtari said...

आभार इस प्रस्तुति का.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

इस दुनिया में ज्यादातर लोग रामनाथ ही हो जाते हैं। कविता के प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

pragya said...

हबीब तनवीर इतने बड़े कवि थे नहीं मालूम था ... ऐसे दर्द तो जानती थी पर ये लेखा जोखा आँख भर गया .

Anil Pusadkar said...

ज़िंदगी को बहुत करीब से देखते और दिखाते थे तनवीर साहब्।

पारूल said...

कैसा गज़ब हिसाब है छोटी छोटी बातों का /एक अदद जीवन का

जी.के. अवधिया said...

तनवीर जी की कविता पढ़वाने के लिए धन्यवाद!

Dipti said...

मुझे नहीं पता था कि हबीब तनवीर कविता भी लिखते थे। आपकी इस पोस्ट से जाना...

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

आभार.. हैपी ब्लॉगिंग

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

चित्रगुप्त क्या कहते हैं? कहां गये होंगे रामनाथ। मुद्दे की बात वह है!

अजय साहू said...

संजीव भाई, हबीब तनवीर जैसी बहुमुखी प्रतिभा के धनी इंसान के कवि पक्ष को उभारने वाली शानदार कविता के लिए बधाई एवं धन्‍यवाद आपके गुरतुर गोठ , और हबीब तनवीर की कविता वाले दोनों लेख तो मेरे कंप्‍यूटर पर सही दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सलवा जुडुम वाला लेख फिर से सही दिखाई नहीं दे रहा है, समय निकाल कर मेरी समस्‍या का समाधान कीजिएगा,,,,

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मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल