ब्लॉग छत्तीसगढ़

17 August, 2009

तू आ भी जा

छलिया
तूने छला है मुझे
बार बार मेरी आंखों में
अंतस तक भींग जाने का स्‍वप्‍न दिखाकर
दूर कहीं क्षितिज में
खो गया है.

और मैं
तेरा बाट जोहती
अंजुरी में बुझ चुके
त्‍यौहारों का दीप जलाती
ठेठरी खुरमी और लाई बतासा लिये
दरकते खेतों में
अपलक निहारते
खड़ी हूं.

मेरे आंखों से टपकते अश्रु
और बदन से टपके श्रमसीकर से
मैं अपने खेतों की
प्‍यास नहीं बुझा पाउंगी.

तू आ तो
मेरे खुशियों में
पानी फेरने के लिए ही सही.

संजीव तिवारी

4 comments:

  1. संजीव भाई बहुत सुंदर, दिल को छूती कविता है।

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  2. आपकी काव्य यात्रा से पूरा परिचय अभी होना बाकी है, इस कविता के लिए यही कहूँगा कि इसे मौलिक संवेदना के साथ ही लिखा जा सकता है. बधाई भाई.

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  3. bahut sunder sanjeev ji .. bahut hi sunder .

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  4. तू आ ,
    मेरी खुशियों पे
    पानी फेरने के लिए ही सही !
    सुंदर भाव हैं !शुभ

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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