ब्लॉग छत्तीसगढ़

30 July, 2009

आखिर क्‍या खास है देवी के आलूगुण्‍डे में .....

आफिस से निकलते ही एक मित्र का फोन आया, लगभग चार साल बाद उसने मुझे याद किया था. उसने पूछा कहां हो मैंनें कहा 'अपनी नगरी में, घर जाने के लिये निकल गया हूं. बोल बहुत दिनों बाद याद किया, तू कहां है. ' 'किस रोड से जा रहे हो.' मित्र नें मेरे प्रश्‍न का जवाब दिये बिना पूछा. मैनें कहा 'क्‍यूं बताउं भई, कोई रिवाल्‍वर लेके खडा है क्‍या, मुझे उडाने..........' बातें लम्‍बी चली. मित्र नें कहा 'नेहरू नगर चौंक आवो मै भिलाई आया हूं.'



चौंक में पहुचकर मित्र को पहले ढूंढा, उसके आदत के अनुसार वहां कतार से लगे खाने-पीने की चीजों की गुमटियों में मैनें नजर दौडाई. 'सेक्‍टर 7 का मशहूर देवी आलूगुण्‍डा' के बोर्ड को देखकर समझ गया कि दोस्‍त जरूर यहां होगा. कल्‍याण कालेज के दिनों में हम सेक्‍टर सेवन के देवी आलूगुण्‍डा के लिये देर तक खडे रहते और छीना झपटी के बाद एकाध आलूगुण्‍डा खाकर ही घर जाते थे. पर दोस्‍त वहां नहीं था. अब हमने मोबाईल लगाया. दोस्‍त नें कहा 'तुम्‍हारे सामने जो होटल दिख रही है 'ग्रॉंड ढिल्‍लन' उसके पांचवे माले में आवो, लिफ्ट के बाजू में मैं तुम्‍हारा इंतजार कर रहा हूं.' हमने कहा कि 'अबे नीचे आ, यहां आलुगुण्‍डा खाते हैं, यहीं बैठकर बातें करेंगें.' पर उसने कहा 'प्‍लीज'.

उसके प्‍लीज के कारण हम चले तो गये उपर काफी बातें हुई देर तक हमने पुरानी यादों को जिया पर देवी के गुमटी में आलूगुण्‍डा खाते हुए जो मजा आता वह यहां पांच सितारा रेस्‍टारेंट में कहा.

4 comments:

  1. दोस्त के साथ पुरानी यादें दोहराना हमेशा ही अच्छा लगता है।

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  2. दोस्त के साथ पुरानी यादें दोहराना हमेशा ही अच्छा लगता है।

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  3. :)
    beete huye kuchh pal hamesha yadgar rah jate hain...

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  4. ऐसी ही कितनी गुमटियों से बचपन की यादें जुड़ी होती हैं..पांच सितारा में न वो स्वाद-न वो बात

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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