ब्लॉग छत्तीसगढ़

17 July, 2008

एक माटी प्रेमी का स्‍क्रैप

आरकुट में मेरे एक मित्र का जन्‍म भूमि के माटी प्रेम से सराबोर एक स्‍क्रैप आया । भाई नें उस स्‍क्रैप में 1975 में एक प्रसिद्ध छत्‍तीसगढी साहित्‍यकार की कविता को आरकुट के सहारे हमें लिख भेजा । रचना बहुत ही प्रेरणास्‍पद व संग्रहणीय है इस कारण हमने उसे अपने छत्‍तीसगढी ब्‍लाग में पब्लिश किया है ।

आपसे अनुरोध है कि इसे देखें एवं कमेंट उसी ब्‍लाग में देकर उनका उत्‍साह बढावें । लिंक - गुरतुर गोठ

5 comments:

  1. bahutan badhiya hai.... maati ka prem sarvopari!

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  2. kya! khub hain............
    bhauk ho gaya. bahut-2 badhai....

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  3. ऊपर सभी ने रोमनागरी का प्रयोग किया - लगा कोई खास बात है!
    रचना देखते हैं।

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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