कोहा पथरा झन मारबे रे टूरा
मोर बारी के आमा ह फरे लटा लट ।
गरमी के भभका म जम्मो सागे नंदा गे
आमा अथान संग, बासी तिरो सटा सट ।
हमर भाखा के मेछा टेंवा गे, अब
छत्तीसगढी म चेटिंग तुम करौ फटा फट ।
अक्कल के पइदल मैं निकल गेंव सडक म
तिपै भोंमरा रे तरूआ जरै चटा चट ।
अट्ठन्नी चवन्नी तैं गिनत रहिबे गोई
एड सेंस के पईसा नई मिलै फटा फट ।
पेट बिकाली के चिंता म संगी
बिलाग लिखई तो बंद होही कटा कट ।
पागा बांधे बांधे टूरा मन निंगे, मूडी ढांके ढांके टूरी ।
कईसे मैं लिखौं नवां पोस्ट गोरी, इही हे मोर मजबूरी ।।
(टोटल ठट्ठा है, लईका मन गर्मी के छुट्टी में धर में सकलाया है, ताश में रूपिया पइसा अउ चींपो गदही खेल रहा है, संगे संग रंग रंग के गाना बना रहा है, मोला कम्पोटर में बईठे देख कर । हा हा हा ..............)
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बहुत बढ़िया
ReplyDeleteआपकी कविता की खुशी मे मेरी ओर से एक
ReplyDeleteते अठन्नी चुअन्नी एसई गिनत रहियो
ब्लागिंग मे एड सेंस के पैसा मिलत नैया
ब्लागिंग मे एसई फोकट मे घिसत रहियो
कम्प्यूटर मे रात और दिन मरत रहियो
कम्पोटर की बजाय चींपो गदही का आउट पुट बेहतर है!
ReplyDeleteओ सब तो ठीक हे भैय्या ये कोन गोरी ल कहात हव कि "कईसे मैं लिखौं नवा पोस्ट गोरी", बोलौ बताव जरा।
ReplyDeleteमजा मजा म सहीच्च हे एकदम!!
सही है !! एकदम सही हे तिवारी जी !
ReplyDeleteइहा उहा ले दौडत आयी
भुख लगे ता बासी खाइ!!
रेड मटकी का जुड वाटर रोज पियो लू खतम हो जाही !!
का करबे भैया
ReplyDeleteछत्तीसगढ़ के गरमी ला
छत्तीसगढ़ियाच् ह सहिथे
बाहिर के मन का सहि पाहीं
वो मन तो एसी में रहिथे
एडसेंस कभू डराथे
ReplyDeleteकभू वो ह बलाथे
मैं ह पथरा के
खेत के मेड़ मा
भंईसा के पूछी ल पकड़के
बइठे हों गोड़ ल जोराके
:)