ब्लॉग छत्तीसगढ़

20 April, 2008

अट्ठन्‍नी चवन्नी तैं गिनत रहिबे गोई, एड सेंस के पईसा नई मिलै फटा फट

कोहा पथरा झन मारबे रे टूरा

मोर बारी के आमा ह फरे लटा लट ।


गरमी के भभका म जम्‍मो सागे नंदा गे

आमा अथान संग, बासी तिरो सटा सट ।


हमर भाखा के मेछा टेंवा गे, अब

छत्‍तीसगढी म चेटिंग तुम करौ फटा फट ।


अक्‍कल के पइदल मैं निकल गेंव सडक म

तिपै भोंमरा रे तरूआ जरै चटा चट ।


अट्ठन्‍नी चवन्‍नी तैं गिनत रहिबे गोई

एड सेंस के पईसा नई मिलै फटा फट ।


पेट बिकाली के चिंता म संगी

बिलाग लिखई तो बंद होही कटा कट ।


पागा बांधे बांधे टूरा मन निंगे, मूडी ढांके ढांके टूरी ।

कईसे मैं लिखौं नवां पोस्‍ट गोरी, इही हे मोर मजबूरी ।।


(टोटल ठट्ठा है, लईका मन गर्मी के छुट्टी में धर में सकलाया है, ताश में रूपिया पइसा अउ चींपो गदही खेल रहा है, संगे संग रंग रंग के गाना बना रहा है, मोला कम्पोटर में बईठे देख कर । हा हा हा ..............)


8 comments:

  1. बहुत बढ़िया

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  2. आपकी कविता की खुशी मे मेरी ओर से एक

    ते अठन्नी चुअन्नी एसई गिनत रहियो
    ब्लागिंग मे एड सेंस के पैसा मिलत नैया
    ब्लागिंग मे एसई फोकट मे घिसत रहियो
    कम्प्यूटर मे रात और दिन मरत रहियो

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  3. कम्पोटर की बजाय चींपो गदही का आउट पुट बेहतर है!

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  4. ओ सब तो ठीक हे भैय्या ये कोन गोरी ल कहात हव कि "कईसे मैं लिखौं नवा पोस्ट गोरी", बोलौ बताव जरा।

    मजा मजा म सहीच्च हे एकदम!!

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  5. सही है !! एकदम सही हे तिवारी जी !

    इहा उहा ले दौडत आयी
    भुख लगे ता बासी खाइ!!

    रेड मटकी का जुड वाटर रोज पियो लू खतम हो जाही !!

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  6. का करबे भैया

    छत्तीसगढ़ के गरमी ला
    छत्तीसगढ़ियाच् ह सहिथे
    बाहिर के मन का सहि पाहीं
    वो मन तो एसी में रहिथे

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  7. एडसेंस कभू डराथे
    कभू वो ह बलाथे
    मैं ह पथरा के
    खेत के मेड़ मा
    भंईसा के पूछी ल पकड़के
    बइठे हों गोड़ ल जोराके

    :)

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  8. जउँहर होगे.........हा हा हा

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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