ब्लॉग छत्तीसगढ़

14 October, 2007

चंदा उसका नाम था




(संत कवि पवन दीवान, भू.पू.- सांसद, विधयक, मंत्री म.प्र., वर्तमान- अध्‍यक्ष छ.ग.गौ सोवा आयोग, प्रसिद्ध भागवत कथाकार व छत्‍तीसगढी भाषा के मूर्धन्‍य साहित्‍यकार की यह बहुचर्चित रचना है, इसे मैं आदरणीय डा.परदेशी राम वर्मा की पत्रिका अकासदिया से साभार प्रकाशित कर रहा हूं)


एक थी लडकी मेरे गॉंव में चंदा उसका नाम था
वह थी कली अछूती लेकिन हर भौंरा बदनाम था ।


महानदी सी लहराती थी
जैसे उसकी चाल में
पवन हठीला ज्‍यों थिरका हो
नौकाओं की पाल में
प्रश्‍न चिन्‍ह सी लचक कमर में आगे पूर्ण विराम था
वह थी बनवासिन सीता-सी बिछडा उसका राम था ।


उसकी गागर की लहरों से
सागर भी शरमाता था
गोरी पिण्‍डलियों को धोने
पनघट तक आ जाता था
वह नदिया थी हर प्‍यासे को छलना उसका काम था
वह ढाला करती थी लेकिन खाली रहता जाम था ।


गीत गूँजता अमरायी में
चरवाहे की तान से
छंद-पंक्ति-सी वह बलखाती
आंगन में अभिमान से
उमर दिवस की घटने लगती चढता आता घाम था
उसका सपना देहरी पर बेसुध करता आराम था ।


वह रूकती थी हाथ जोडकर
मलयानिल रूक जाता था
तुलसी की मंजरियों का
बोझिल मस्‍तक झुक जाता था
उसके चरणों में अर्पित सूरज का नम्र प्रणाम था
स्‍वप्निल चिंतन में उतराता मेरा दिवस तमाम था ।


बडे प्‍यार से उस बेटी को
पाला था मॉं-बाप ने
ऑंगन की तुलसी उखाड दी
जाने किस अभिशाप ने
उसका दर्द बांटने वाले पिंजरे में विश्राम था
गौरैया के अरमानों का वह आखिरी सलाम था ।


उसकी खोज में बाग का पंछी
बना हुआ बनजारा है
जब से वह ससुराज गई
मेरा गांव कुँवारा है उसका प्‍यार लूटने वाला हर प्रयत्‍न नाकाम था
मुझे स्‍मरण दहला देता है उस अंतिम शाम का ।

6 comments:

  1. बहुत आभार इस पेशकश का. मन प्रसन्न हुआ.

    ReplyDelete
  2. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति .पवन दीवान जी के व्यक्तित्व क्रातित्व से जबलपुर का वासी होने के नाते मै अच्छी तरह से परिचित हूँ वे बहुत अच्छे कवि और विचारक है | भविष्य मे इसी तरह से उनकी अन्य रचनाए भी प्रकाशित करते रहिए | उत्तम प्रस्तुति के लिए आपको धन्यवाद |

    ReplyDelete
  3. बहुत खूब!! आभार आरंभ का जो यह कविता एक बार फ़िर पढ़ने मिली, इस कविता को पवन दीवान जी के मुंह से सुनना एक अलग ही अनुभव दे जाता है और यह अनुभव एक स्थानीय कवि सम्मेलन में कई बरस पहले मै ले चुका हूं!!

    पवन दीवान जी की सबसे अद्भुत कविता है "राख" जो कि छत्तीसगढ़ी में है।

    मुआफ़ी चाहूंगा उस पत्रिका का नाम अकासदिया है या फ़िर अगासदिया?

    ReplyDelete
  4. ajay sahu,shillong14 October, 2007 17:32

    BAHUT HI MARMIK KAVITA HAI..YAH..BAIRAGI..NE..AAPNE AARAMBHIK JIWAN KI SACHHAI PIRO DI HAI. JIWAN KI KAHANI KAHI HAI..
    PARDESHI RAM VERMA KE UPANYAS " PRASTHAN" KI KATHA ME EK PATRA KAMAL..KA JIKRA HAI..
    YE WAHI..HAI..

    ReplyDelete
  5. पूज्य दीवान जी जब मंत्री थे इन्दौर आते थे.
    अदभुत व्यक्तित्व के धनी हैं वे.
    राजनीति ऐसे व्यक्तियों को न जाने क्यों ख़ारिज कर देती है...या यूँ कहूँ ...शुचिता वाले व्यक्ति को राज रास नहीं आता.

    ReplyDelete
  6. संजीव जी यह कविता मैने कल ही पढी थी मगर टिप्पणी नही दे पाई थी...सर्वप्रथम तो मै पवन दीवान जी को नमन करती हूँ फ़िर आप को क्यों कि आपने हमें उनकी एक खूबसूरत कविता से अवगत करवाया है...बहुत-बहुत बधाई

    सुनीता(शानू)

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

Popular Posts