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11 August, 2007

इस तुच्‍छ विजय पर इतना अभिमान


कलिंग विजय के उपरांत सम्राट अशोक अपनी सफलतम विजय यात्राओं के कारण अहंकार से परिपूर्ण हो गया था. और चाटुकारों की दिन रात प्रशंसा और चारण सुन सुनकर, वह अपने आप को बहुत बुद्धिमान, सर्वशक्तिमान व सफल सम्राट मानने लगा था ।

एक बार राजधानी पाटलीपुत्र में बौद्धभिक्षु आचार्य उपगुप्त का आगमन हुआ. चांदनी रात में सम्राट उनसे मिलने गये. आचार्य का अभिवादन करते हुए अशोक का दंभ विद्यमान था, उन्‍होंने कहा- विश्‍व का सर्वशक्तिमान शासक सम्राट अशोक आपको प्रणाम करता है ।

आचार्य विद्वान थे उनसे कुछ छुपा नहीं था और फिर सम्राट अशोक के कथन में छिपे अहंकार तो स्पष्ट परिलक्षित था । आचार्य ने उनके शब्दों में छिपे दंभ को पहचान लिया । उन्होंने शांतिपूर्वक आसमान की ओर ताकते हुए सम्राट अशोक से कहा - राजन ! वह आकाशगंगा देख रहे हैं ? क्या आप जानते हैं, इसमें छोटे-छोटे दिखने वाले अनगिनत तारों में से कुछ तारों का आकार हमें दिखाई पड़ने वाले सूर्य से भी हजारों गुना बड़ा है ।

अशोक ने सहमति से सिर हिलाया । आचार्य ने कहा- और तुम यह भी मानते हो ना कि जिस राज्य पर तुमने विजय प्राप्त की, वह तो इस पृथ्वी का बहुत छोटा सा टुकड़ा मात्र है । . . . तो फिर इस तुच्‍छ विजय पर इतना अभिमान किस बात का ?

कहते हैं इस घटना नें अशोक को अपनी तुच्छता का अहसास कराया और उसने राज्य विजय व नरसंहार की जगह धम्म विजय व भगवान बुद्ध को अपनाने का संकल्प लिया.

(बौद्धधर्मावलंबियों से सुनी कथा, संकलन - संजीव तिवारी)

4 comments:

  1. अच्छा लगा यह कथा पढ़ कर. आभार.

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  2. बहुत अच्छा लगा। आभार! इसे फ़िर से एक बार पढ़वाने के लिये।

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  3. शुक्रिया इसे पढ़वाने के लिए!!

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  4. Bahut hee badhiya katha..Prastut karne ke liye dhanyawaad.

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आपकी टिप्पणियों का स्वागत है. (टिप्पणियों के प्रकाशित होने में कुछ समय लग सकता है.) -संजीव तिवारी, दुर्ग (छ.ग.)

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